
भगवंत मान का बड़ा चुनावी दांव, आस्था के संकट के बीच महिलाओं पर भरोसा
अकाल तख्त से बढ़ते विवाद और बेअदबी कानून पर घिरी AAP ने चुनाव से पहले महिला सम्मान योजना लॉन्च की है। अब नजर इस पर है कि आस्था या कल्याण, मतदाता किसे चुनेंगे।
पंजाब में विधानसभा चुनाव में अभी करीब आठ महीने का समय बाकी है, लेकिन मुख्यमंत्री भगवंत मान की सरकार पहले से ही कई राजनीतिक और धार्मिक चुनौतियों का सामना कर रही है। एक ओर अकाल तख्त के साथ उनका टकराव लगातार गहराता जा रहा है, तो दूसरी ओर आम आदमी पार्टी (AAP) महिलाओं को साधने के लिए अपनी सबसे बड़ी चुनावी गारंटी को लागू करने जा रही है। ऐसे में सबसे बड़ा सवाल यह है कि क्या महिला मतदाताओं का समर्थन धार्मिक विवादों से पैदा हुए राजनीतिक नुकसान की भरपाई कर पाएगा?
चुनाव से पहले महिलाओं के लिए बड़ी योजना
बुधवार (1 जुलाई) को मुख्यमंत्री भगवंत मान मुख्यमंत्री मावां धियां सत्कार योजना की शुरुआत करने जा रहे हैं। सरकार का दावा है कि इस योजना का लाभ 18 वर्ष से अधिक आयु की राज्य की लगभग 97 प्रतिशत महिलाओं को मिलेगा, जो पंजाब के कुल मतदाताओं का करीब 45 प्रतिशत हिस्सा हैं।योजना के तहत सामान्य वर्ग की महिलाओं को हर महीने 1,000 रुपये की आर्थिक सहायता दी जाएगी, जबकि दलित महिलाओं को 1,500 रुपये प्रति माह मिलेंगे।
यह योजना वर्ष 2022 के विधानसभा चुनाव के दौरान AAP द्वारा किए गए प्रमुख चुनावी वादों में शामिल थी। हालांकि, इसे चुनाव से महज आठ महीने पहले लागू करने का फैसला राजनीतिक दृष्टि से बेहद महत्वपूर्ण माना जा रहा है। खास बात यह भी है कि सरकार का लक्ष्य जहां 98 लाख महिलाओं तक योजना पहुंचाने का है, वहीं अब तक केवल 39 लाख महिलाओं का ही पंजीकरण हो सका है।
अकाल तख्त से बढ़ता टकराव
पिछले कुछ सप्ताह से मुख्यमंत्री भगवंत मान और अकाल तख्त के बीच विवाद लगातार बढ़ता जा रहा है। विवाद की शुरुआत उस कथित वीडियो से हुई, जिसमें मान पर सिख गुरुओं का अपमान करने का आरोप लगाया गया।मुख्यमंत्री ने इन आरोपों को सिरे से खारिज करते हुए वीडियो को फर्जी बताया है। हालांकि, अकाल तख्त का दावा है कि फोरेंसिक जांच में यह पुष्टि हुई है कि वीडियो में दिखाई देने वाला व्यक्ति वास्तव में भगवंत मान ही हैं।
इसी कथित घटना के आधार पर अकाल तख्त ने मान को 'गुरु दोखी' (गुरु का विश्वासघाती) और 'पंथ विरोधी' घोषित कर दिया। इतना ही नहीं, अकाल तख्त ने उनके सामाजिक बहिष्कार का भी आह्वान किया है।सिख बहुल पंजाब में, खासकर चुनावी वर्ष में, ऐसे आरोप मुख्यमंत्री और आम आदमी पार्टी दोनों के लिए गंभीर राजनीतिक चुनौती माने जा रहे हैं। यह स्थिति इसलिए भी अधिक संवेदनशील है क्योंकि 2022 के चुनाव में AAP ने बेअदबी की घटनाओं पर सख्त कार्रवाई करने का वादा किया था और उसी मुद्दे को प्रमुख चुनावी एजेंडा बनाया था।
नए कानून से बढ़ीं मुश्किलें
मुख्यमंत्री मान और उनकी सरकार की मुश्किलें केवल अकाल तख्त के साथ टकराव तक सीमित नहीं हैं। इस वर्ष 13 अप्रैल को पंजाब विधानसभा से पारित जागत जोत श्री गुरु ग्रंथ साहिब सत्कार (संशोधन) अधिनियम भी अब सरकार के लिए बड़ा विवाद बन गया है। सरकार का उद्देश्य इस कानून के जरिए सिख समुदाय के बीच अपना समर्थन मजबूत करना था, लेकिन इसका उल्टा असर देखने को मिला। अकाल तख्त ने इस कानून पर गंभीर आपत्ति जताते हुए इसे सिख धार्मिक मामलों में दखल के रूप में देखा।यही कारण है कि 117 सदस्यीय पंजाब विधानसभा के 88 सिख विधायकों—जिनमें आठ मंत्री और विधानसभा अध्यक्ष कुलतार सिंह संधवां भी शामिल हैं, लेकिन मुख्यमंत्री भगवंत मान नहीं—को अकाल तख्त के समक्ष उपस्थित होकर यह स्पष्ट करने के लिए बुलाया गया कि उन्होंने इस कानून का समर्थन क्यों किया।वहीं, विधानसभा के 28 गैर-सिख विधायकों से इस विषय पर लिखित जवाब मांगा गया।
अकाल तख्त के सामने विधायकों की पेशी
अकाल तख्त के समक्ष हुई सुनवाई को आम आदमी पार्टी के लिए बेहद असहज और राजनीतिक रूप से नुकसानदेह माना जा रहा है। इस पूरी कार्यवाही का अधिकांश हिस्सा पंजाब के विभिन्न समाचार चैनलों और केबल नेटवर्क पर लाइव प्रसारित किया गया, जिससे पूरे राज्य की नजरें इस सुनवाई पर टिकी रहीं।
सुनवाई के दौरान अकाल तख्त के जत्थेदार ज्ञानी कुलदीप सिंह गर्गज्ज ने AAP के कई वरिष्ठ मंत्रियों और विधायकों से कानून के विभिन्न प्रावधानों पर विस्तार से सवाल किए। इनमें वित्त मंत्री हरपाल सिंह चीमा, कृषि मंत्री गुरमीत सिंह खुदियां, जगरूप सिंह, इंदरबीर सिंह निज्जर और कुलवंत सिंह जैसे नेता शामिल थे।
पूछताछ के दौरान यह स्पष्ट हो गया कि विवाद केवल इस कानून तक सीमित नहीं था, बल्कि सरकार द्वारा इसे बिना किसी व्यापक धार्मिक परामर्श के विधानसभा से पारित कराने के तरीके पर भी गंभीर आपत्तियां थीं। अकाल तख्त का मानना था कि सिख आस्था से सीधे जुड़े इतने महत्वपूर्ण विषय पर न तो अकाल तख्त से सलाह ली गई और न ही शिरोमणि गुरुद्वारा प्रबंधक कमेटी (SGPC) से कोई चर्चा की गई।
नेहरू-तारा सिंह समझौते का हवाला
इस विवाद के केंद्र में वर्ष 1959 का नेहरू-तारा सिंह समझौता भी आ गया। तत्कालीन प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू और अकाली नेता मास्टर तारा सिंह के बीच हुए इस समझौते के तहत यह परंपरा स्थापित हुई थी कि सरकारें सिख धार्मिक मामलों और गुरुद्वारों के प्रबंधन में हस्तक्षेप नहीं करेंगी।साथ ही यह भी तय किया गया था कि यदि सिख धर्म या गुरुद्वारों से जुड़े किसी कानून में बदलाव या नया कानून लाना हो तो उससे पहले अकाल तख्त, शिरोमणि गुरुद्वारा प्रबंधक कमेटी और अन्य संबंधित पक्षों से विस्तृत विचार-विमर्श किया जाएगा।
हालांकि, आम आदमी पार्टी के नेताओं का तर्क है कि उनकी सरकार ने इस समझौते का उल्लंघन नहीं किया क्योंकि 1959 का समझौता मुख्य रूप से सिख गुरुद्वारा अधिनियम और SGPC के कामकाज तक सीमित था। लेकिन अकाल तख्त का मानना है कि नया कानून इस परंपरा की भावना के खिलाफ है और धार्मिक मामलों में सरकार के अनावश्यक हस्तक्षेप का उदाहरण है।
विपक्ष ने साधा सरकार पर निशाना
पंजाब विधानसभा में विपक्ष के नेता प्रताप सिंह बाजवा ने सरकार पर तीखा हमला बोलते हुए कहा कि जब 13 अप्रैल को यह विधेयक विधानसभा में पेश किया गया था, तब सभी विपक्षी दलों ने इसका विरोध किया था।उन्होंने कहा कि विपक्ष ने सरकार से स्पष्ट रूप से आग्रह किया था कि कानून पारित करने से पहले अकाल तख्त और SGPC से चर्चा की जाए, लेकिन मुख्यमंत्री भगवंत मान और विधानसभा अध्यक्ष ने किसी की सलाह नहीं मानी।
बाजवा के अनुसार, अकाल तख्त सिख समुदाय की सर्वोच्च धार्मिक संस्था है और बेअदबी जैसे संवेदनशील विषय पर उससे सलाह न लेना स्वयं उस संस्था का अपमान है।उन्होंने यह भी आरोप लगाया कि अकाल तख्त के सामने हुई सुनवाई के दौरान AAP नेताओं ने अपनी गलती स्वीकार करने के बजाय अनभिज्ञता जताई और कई मामलों में जत्थेदार को गुमराह करने की कोशिश की।
कानून पढ़े बिना ही कर दिया समर्थन
सुनवाई के दौरान सबसे चौंकाने वाली बात यह सामने आई कि सत्तारूढ़ दल के अधिकांश विधायक स्वयं उस कानून के प्रावधानों से पूरी तरह परिचित नहीं थे, जिसके पक्ष में उन्होंने विधानसभा में मतदान किया था।जब कानून की विभिन्न धाराओं के बारे में उनसे सवाल पूछे गए तो कई विधायकों ने स्वीकार किया कि उन्हें संबंधित प्रावधानों की जानकारी नहीं थी। कुछ ने माना कि उन्होंने विधेयक को पढ़े बिना ही उसके पक्ष में मतदान कर दिया था, जबकि कुछ नेताओं की व्याख्या कानून के वास्तविक प्रावधानों से बिल्कुल अलग थी।इस घटनाक्रम ने सरकार की कार्यप्रणाली और विधायी प्रक्रिया पर भी गंभीर सवाल खड़े कर दिए।
सरकार को एक महीने की मोहलत
अकाल तख्त ने अब पंजाब सरकार को इस कानून में आवश्यक संशोधन करने के लिए एक महीने का समय दिया है।जत्थेदार और SGPC इस अवधि के दौरान कानून में जिन बदलावों की जरूरत समझते हैं, उनके सुझाव विधानसभा अध्यक्ष कुलतार सिंह संधवां को सौंपेंगे। इसके बाद संधवां इन सुझावों को सरकार तक पहुंचाएंगे ताकि संशोधित विधेयक तैयार किया जा सके।हालांकि, राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि केवल कानून में संशोधन कर देने से मुख्यमंत्री भगवंत मान की मुश्किलें पूरी तरह खत्म नहीं होंगी।
राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि यह पूरा विवाद केवल कानून में संशोधन तक सीमित नहीं रहेगा। उनका कहना है कि सरकार ने जिस जल्दबाजी में बेअदबी विरोधी कानून को तैयार कर विधानसभा से पारित कराया, वही उसकी सबसे बड़ी राजनीतिक भूल साबित हो सकती है।
गुरु नानक देव विश्वविद्यालय के पूर्व प्रोफेसर और राजनीतिक विश्लेषक जगरूप सिंह सेखों का कहना है कि आम आदमी पार्टी ने राजनीतिक लाभ की उम्मीद में बिना पर्याप्त तैयारी और व्यापक सहमति के यह कानून लागू करने की कोशिश की। लेकिन अब जब अकाल तख्त स्वयं इस मामले में हस्तक्षेप कर चुका है और मुख्यमंत्री भगवंत मान को पहले ही 'गुरु दोखी' तथा 'पंथ विरोधी' घोषित किया जा चुका है, तब मुख्यमंत्री के लिए राजनीतिक जोखिम कई गुना बढ़ गए हैं।
क्या कानून की जद में आ सकते हैं मुख्यमंत्री?
सेखों का कहना है कि मुख्यमंत्री भगवंत मान और अकाल तख्त के बीच लगातार बढ़ते टकराव ने स्थिति को और जटिल बना दिया है। उनके मुताबिक मुख्यमंत्री द्वारा बार-बार अकाल तख्त के जत्थेदार पर शिरोमणि अकाली दल के इशारों पर काम करने का आरोप लगाना भी राजनीतिक रूप से उचित नहीं माना जा रहा।
उन्होंने सवाल उठाया कि यदि भविष्य में अकाल तख्त, SGPC या कोई अन्य पक्ष इसी नए कानून के तहत मुख्यमंत्री पर ही बेअदबी का मामला दर्ज करने की मांग कर दे तो क्या होगा? क्योंकि इस कानून में बेअदबी के दोषी पाए जाने पर न्यूनतम सात वर्ष से लेकर आजीवन कारावास तक की सजा का प्रावधान है।उनके अनुसार, यही संभावना इस पूरे विवाद को मुख्यमंत्री और उनकी सरकार के लिए और अधिक संवेदनशील बना देती है।
महिला सम्मान योजना के पीछे राजनीतिक संदेश
राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि ऐसे समय में मुख्यमंत्री मावां धियां सत्कार योजना की शुरुआत महज एक कल्याणकारी योजना नहीं, बल्कि स्पष्ट रूप से राजनीतिक महत्व भी रखती है।सेखों का कहना है कि पंजाब पहले से ही बढ़ते कर्ज के बोझ से जूझ रहा है। दूसरी ओर, सरकारी आंकड़े बताते हैं कि योजना के लिए तय किए गए संभावित लाभार्थियों में से आधी से भी कम महिलाओं का अब तक पंजीकरण हो पाया है। इसके बावजूद सरकार का चुनाव से ठीक पहले इस योजना को लागू करना यह संकेत देता है कि आम आदमी पार्टी धार्मिक विवादों से होने वाले संभावित राजनीतिक नुकसान की भरपाई सामाजिक कल्याण योजनाओं के जरिए करना चाहती है।
2027 चुनाव से पहले नया राजनीतिक समीकरण
विश्लेषकों का मानना है कि फिलहाल यह कहना जल्दबाजी होगी कि मुख्यमंत्री भगवंत मान की यह रणनीति कितनी सफल होगी। हालांकि इतना तय माना जा रहा है कि आगामी विधानसभा चुनाव केवल विकास और शासन के मुद्दों तक सीमित नहीं रहेंगे।एक ओर धार्मिक भावनाओं से जुड़े विवाद और अकाल तख्त के साथ सरकार का टकराव रहेगा, तो दूसरी ओर महिलाओं और अन्य वर्गों के लिए घोषित कल्याणकारी योजनाएं चुनावी विमर्श का बड़ा हिस्सा बनेंगी।
यही वजह है कि 2027 का पंजाब विधानसभा चुनाव पहले की अपेक्षा कहीं अधिक जटिल और बहुआयामी होता दिखाई दे रहा है। आने वाले महीनों में यह साफ होगा कि मतदाता धार्मिक मुद्दों को अधिक महत्व देते हैं या फिर आर्थिक सहायता और सामाजिक कल्याण योजनाएं उनके मतदान के फैसले को प्रभावित करती हैं।इन दोनों मुद्दों के बीच संतुलन साधना ही आम आदमी पार्टी और मुख्यमंत्री भगवंत मान के सामने सबसे बड़ी राजनीतिक चुनौती होगी।

