
शिवसेना में बगावत का इतिहास: 50 साल में पांच बार टूटा ठाकरे का कुनबा
शिवसेना ने 1970 के दशक से अब तक कई बड़ी टूट देखी हैं। भुजबल, राणे, राज ठाकरे और शिंदे के बाद अब 2026 में फिर बगावत की अटकलें तेज हैं।
महाराष्ट्र की राजनीति में शिवसेना हमेशा एक प्रभावशाली ताकत रही है, लेकिन यह पार्टी जितनी अपनी आक्रामक राजनीति और क्षेत्रीय पहचान के लिए जानी जाती है, उतनी ही आंतरिक बगावतों और टूट के लिए भी चर्चा में रही है। अब शिवसेना से शिवसेना (यूबीटी) बन चुकी उद्धव ठाकरे की पार्टी एक बार फिर टूट के मुहाने पर खड़ी नजर आ रही है।
रिपोर्ट्स के मुताबिक, पार्टी के छह लोकसभा सांसद उद्धव ठाकरे का साथ छोड़कर महाराष्ट्र के उपमुख्यमंत्री एकनाथ शिंदे के नेतृत्व वाले शिवसेना गुट में शामिल हो सकते हैं। यदि ऐसा होता है तो यह 2022 में हुई सबसे बड़ी बगावत के बाद उद्धव ठाकरे के लिए एक और बड़ा झटका होगा।हालांकि, यह पहली बार नहीं है जब शिवसेना ने आंतरिक विद्रोह का सामना किया हो। पार्टी के इतिहास पर नजर डालें तो 1970 के दशक से लेकर अब तक कई बड़े नेता संगठन से अलग हो चुके हैं।
70 के दशक में पहली बड़ी दरार
शिवसेना में पहली बड़ी टूट 1970 के दशक में देखने को मिली थी। कहा जाता है कि पार्टी संस्थापक बाल ठाकरे और मुंबई के नेता बंदू शिंगरे के बीच मतभेद गहरा गए थे। इसके बाद शिंगरे ने अलग होकर ‘प्रति शिवसेना’ नाम से एक नया संगठन बनाया।हालांकि, यह प्रयोग ज्यादा सफल नहीं रहा और नई पार्टी महाराष्ट्र की राजनीति में कोई बड़ा प्रभाव नहीं छोड़ सकी।
1991: जब छगन भुजबल ने किया विद्रोह
दिसंबर 1991 में शिवसेना को पहला बड़ा राजनीतिक झटका लगा। उस समय पार्टी की कमान बाल ठाकरे के हाथों में थी और छगन भुजबल महाराष्ट्र विधानसभा में नेता प्रतिपक्ष थे।भुजबल ने पार्टी नेतृत्व के खिलाफ मोर्चा खोल दिया और दावा किया कि उनके साथ 18 विधायक हैं। उस समय विधानसभा में शिवसेना के कुल 52 विधायक थे।
हालांकि, मीडिया रिपोर्ट्स के अनुसार केवल छह विधायकों ने ही विधानसभा अध्यक्ष को समर्थन पत्र सौंपा था। इसके बाद इस गुट को ‘शिवसेना (बी)’ के रूप में पहचान मिली। बाद में भुजबल और उनके समर्थकों ने कांग्रेस का दामन थाम लिया।यह बगावत इसलिए भी महत्वपूर्ण मानी जाती है क्योंकि पहली बार पार्टी के किसी बड़े और प्रभावशाली नेता ने बाल ठाकरे के नेतृत्व को खुली चुनौती दी थी।
2005: नारायण राणे का विद्रोह
करीब 14 साल बाद शिवसेना को एक और बड़े झटके का सामना करना पड़ा। इस बार पार्टी के वरिष्ठ नेता और पूर्व मुख्यमंत्री नारायण राणे ने बगावत का रास्ता चुना।राणे 1999 में कुछ महीनों के लिए महाराष्ट्र के मुख्यमंत्री रहे थे। माना जाता है कि बाल ठाकरे द्वारा उद्धव ठाकरे को अपना राजनीतिक उत्तराधिकारी बनाने की कोशिशों से राणे नाराज थे।
जुलाई 2005 में उन्होंने शिवसेना छोड़कर कांग्रेस का दामन थाम लिया। राणे ने दावा किया था कि उन्हें 42 विधायकों का समर्थन हासिल है, जबकि उस समय शिवसेना के पास 63 विधायक थे।हालांकि, यह दावा कभी साबित नहीं हो पाया और केवल कुछ नेताओं ने ही खुलकर उनका साथ दिया। फिर भी राणे के जाने से खासकर कोंकण क्षेत्र में शिवसेना को राजनीतिक नुकसान उठाना पड़ा। बाद में राणे भाजपा में शामिल हो गए।
2006: राज ठाकरे ने बनाई अलग राह
नारायण राणे के जाने के अगले ही साल शिवसेना को एक और बड़ा झटका लगा, जब बाल ठाकरे के भतीजे राज ठाकरे ने पार्टी छोड़ दी।राज ठाकरे को लंबे समय तक बाल ठाकरे का राजनीतिक उत्तराधिकारी माना जाता था, लेकिन अंततः नेतृत्व की कमान उद्धव ठाकरे के हाथों में चली गई।इसके बाद 2006 में राज ठाकरे ने अलग होकर महाराष्ट्र नवनिर्माण सेना (मनसे) की स्थापना की।हालांकि, उनके साथ बड़ी संख्या में विधायक नहीं गए, लेकिन संगठनात्मक स्तर पर शिवसेना को नुकसान हुआ। मनसे ने 2009 के विधानसभा चुनाव में 13 सीटें जीतकर अपनी ताकत दिखाई थी, हालांकि बाद के वर्षों में पार्टी का प्रभाव सीमित होता गया।
2022: सबसे बड़ी बगावत, जब पार्टी का नाम और चुनाव चिह्न भी चला गया
शिवसेना के इतिहास की सबसे बड़ी टूट 2022 में हुई।एकनाथ शिंदे के नेतृत्व में पार्टी के 55 में से 40 विधायक उद्धव ठाकरे से अलग हो गए। इसके चलते महाविकास अघाड़ी सरकार गिर गई और उद्धव ठाकरे को मुख्यमंत्री पद छोड़ना पड़ा।बाद में चुनाव आयोग ने शिवसेना का नाम और उसका पारंपरिक चुनाव चिह्न शिंदे गुट को सौंप दिया। उद्धव ठाकरे के गुट को ‘शिवसेना (यूबीटी)’ नाम और ‘मशाल’ चुनाव चिह्न के साथ नई राजनीतिक पहचान बनानी पड़ी।यह विभाजन न केवल संगठनात्मक बल्कि भावनात्मक और राजनीतिक रूप से भी शिवसेना के इतिहास का सबसे बड़ा संकट माना जाता है।
2026: क्या फिर टूटेगी शिवसेना (यूबीटी)?
अब 2026 में शिवसेना (यूबीटी) एक बार फिर संकट में दिखाई दे रही है।रिपोर्ट्स में दावा किया जा रहा है कि पार्टी के छह सांसदों ने लोकसभा अध्यक्ष ओम बिरला को समर्थन पत्र सौंप दिया है और वे जल्द ही एकनाथ शिंदे गुट के साथ जाने का ऐलान कर सकते हैं।यदि ऐसा होता है तो लोकसभा में शिवसेना (यूबीटी) की ताकत घटकर केवल तीन सांसदों तक सिमट सकती है।इससे पहले भी ऐसी अटकलें लगाई जाती रही हैं कि पार्टी के कुछ विधायक और नेता भविष्य में पाला बदल सकते हैं। ऐसे में उद्धव ठाकरे के सामने संगठन को एकजुट रखने की चुनौती पहले से कहीं अधिक बड़ी नजर आ रही है।
लगातार टूटों से जूझती रही है शिवसेना
पिछले पांच दशकों का इतिहास बताता है कि शिवसेना ने कई बार बगावत और टूट का सामना किया है। बंदू शिंगरे, छगन भुजबल, नारायण राणे, राज ठाकरे और एकनाथ शिंदे जैसे नेताओं ने अलग राह चुनी और हर बार पार्टी की राजनीति पर गहरा असर पड़ा।
अब निगाहें इस बात पर टिकी हैं कि क्या 2026 में संभावित सांसदों की बगावत शिवसेना (यूबीटी) के लिए एक और बड़े राजनीतिक झटके में बदलती है, या उद्धव ठाकरे इस संकट को टालने में सफल रहते हैं।

