नंदीग्राम की ज़मीन पर अब भगवा लहर, भूमि आंदोलन के केंद्र से हिंदुत्व के गढ़ तक
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नंदीग्राम की ज़मीन पर अब भगवा लहर, भूमि आंदोलन के केंद्र से हिंदुत्व के गढ़ तक

नंदीग्राम, जो कभी साझा भूमि आंदोलन का केंद्र था, अब पश्चिम बंगाल में हिंदुत्व और ध्रुवीकरण की राजनीति का सबसे बड़ा प्रयोगशाला बन चुका है। यहाँ भाजपा नेता शुभेंदु अधिकारी 'सनातन धर्म' की रक्षा के नाम पर हिंदू वोट बैंक को एकजुट करने में लगे हैं।


पश्चिम बंगाल के पूर्व मेदिनीपुर जिले का नंदीग्राम क्षेत्र कभी अपने ऐतिहासिक भूमि रक्षा आंदोलन (2007) के लिए जाना जाता था, जिसने राज्य की 34 साल पुरानी वामपंथी सत्ता को उखाड़ फेंका था। लेकिन आज, लगभग दो दशक बाद, नंदीग्राम की पहचान पूरी तरह बदल चुकी है। उत्तर में टेंगुआ मोड़ से लेकर दक्षिण-पूर्व में तेखाली ब्रिज तक, अब भगवा झंडों का समंदर दिखाई देता है, जिन पर भगवान राम और हनुमान की तस्वीरें अंकित हैं। इन झंडों के बीच कहीं-कहीं पीले झंडे भी दिखते हैं जिन पर नीले रंग से 'जॉय बांग्ला' लिखा है।

यह बदलाव महज संयोग नहीं है। पांच साल पहले जब शुभेंदु अधिकारी ने मुख्यमंत्री ममता बनर्जी को एक कड़े चुनावी मुकाबले में हराया था, तब से नंदीग्राम उस आक्रामक हिंदुत्व मॉडल का 'प्रोटोटाइप' बन गया है जिसे भाजपा पूरे बंगाल में लागू करना चाहती है।

हिंदू एकता का आह्वान और धार्मिक प्रतीकों की राजनीति

नंदीग्राम के ग्रामीण इलाकों में शुभेंदु अधिकारी और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के बैनर लगे हैं, जिनके साथ राम और हनुमान की छवियां 'हिंदू ऐक्य' (हिंदू एकता) का आह्वान करती हैं। रामनवमी बीत जाने के कई हफ्तों बाद भी ये पोस्टर और बैनर वहीं टिके हुए हैं, जो धर्म और राजनीति के गहरे मेल को दर्शाते हैं।

2007 के भूमि आंदोलन ने नंदीग्राम को सांप्रदायिक एकता के प्रतीक के रूप में स्थापित किया था, लेकिन आज की राजनीति विभाजनों पर आधारित है। भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी (सीपीएम) के स्थानीय नेता शेख सद्दाम हुसैन कहते हैं, "नंदीग्राम आंदोलन कभी भाईचारे की मिसाल था, लेकिन यह चुनाव बंटवारे की प्रतियोगिता बन गया है। तृणमूल कांग्रेस (TMC) भगवान जगन्नाथ के नाम पर वोट मांग रही है, तो भाजपा राम के नाम पर।"

पश्चिम बंगाल सरकार ने दीघा में 250 करोड़ रुपये की लागत से जगन्नाथ मंदिर बनवाया है। टीएमसी अपने प्रचार में इसे बार-बार उछाल रही है ताकि वह भाजपा के हिंदुत्व का मुकाबला एक ऐसे देवता के साथ कर सके जिससे बंगाली समाज अधिक जुड़ाव महसूस करता है।

अधिकारी परिवार का वर्चस्व बनाम 'भूमिपुत्र' का दांव

नंदीग्राम की राजनीति का दूसरा ध्रुव 'अधिकारी परिवार' का दबदबा है। शुभेंदु अधिकारी के पिता शिशिर अधिकारी दशकों तक कांग्रेस और टीएमसी में रहने के बाद 2021 में भाजपा में शामिल हो गए थे। शुभेंदु के भाई दिव्येंदु और सौमेंदु भी सांसद रह चुके हैं। इस परिवार के वर्चस्व को चुनौती देने के लिए टीएमसी ने पवित्र कार को मैदान में उतारा है। पवित्र कार कभी शुभेंदु के बेहद करीबी सहयोगी हुआ करते थे, लेकिन अब वह उन्हें 'अहंकारी' और 'विकास विरोधी' बताते हुए खुद को 'भूमिपुत्र' के रूप में पेश कर रहे हैं।

पवित्र कार का दावा है कि शुभेंदु ने नंदीग्राम के लिए कुछ नहीं किया। उन्होंने वादा किया है कि अगर वह जीतते हैं, तो हल्दी नदी पर पुल, मछुआरों के लिए कोल्ड स्टोरेज और एक मेडिकल कॉलेज बनवाएंगे।

शुभेंदु अधिकारी: 'सनातनी' हितों के रक्षक

दूसरी ओर, शुभेंदु अधिकारी खुद को 'सनातनियों' के रक्षक के रूप में पेश करते हैं। अपनी रैलियों में वह अक्सर वोटों के ध्रुवीकरण का गणित समझाते हैं। वह दावा करते हैं कि मदरसा क्षेत्रों के बूथों पर उन्हें नाममात्र के वोट मिलते हैं, जबकि हिंदू बहुल इलाकों में उनका वर्चस्व है। वह खुलेआम कहते हैं, "अगर मदरसों में मुझे एक भी वोट नहीं मिलता, तो तिलक लगाने वालों और गले में तुलसी की माला पहनने वालों को यह सुनिश्चित करना चाहिए कि टीएमसी उनके बूथ पर जीरो पर रहे। हिंदुओं को एकजुट होना होगा।"

नंदीग्राम की लगभग एक चौथाई आबादी (2011 की जनगणना के अनुसार 34.04%) मुस्लिम है। ऐतिहासिक रूप से यहाँ दोनों समुदायों के बीच बहुत कम घर्षण रहा है, लेकिन वर्तमान माहौल बदला हुआ महसूस होता है। स्थानीय निवासियों का कहना है कि पहले त्योहार साझा होते थे, लेकिन अब सब कुछ बंटा हुआ लगता है।

मतदाता सूची और जनसांख्यिकीय चिंताएं

राजनीतिक ध्रुवीकरण के बीच मतदाता सूची में संशोधन का मुद्दा भी गरमाया हुआ है। 'स्पेशल इंटेंसिव रिविजन' के आंकड़ों से पता चलता है कि मतदाता सूची से हटाए गए नामों में अल्पसंख्यकों की संख्या असंतुलित रूप से अधिक है। एक अध्ययन के अनुसार, हटाए गए 2,826 नामों में से लगभग 2,700 नाम मुसलमानों के हैं। यह आंकड़ा 95 से 96 प्रतिशत बैठता है, जो जनसांख्यिकीय भेदभाव की ओर इशारा करता है।

साझा संस्कृति की धुंधली होती उम्मीदें

तमाम राजनीतिक कड़वाहट के बावजूद, नंदीग्राम के कुछ कोनों में अभी भी पुरानी एकता की झलक मिलती है। तेखाली ब्रिज के पास एक चाय की दुकान पर हिंदू और मुस्लिम पुरुष साथ बैठकर राजनीति पर चर्चा करते हैं। स्थानीय निवासी समीर मैती कहते हैं, "हम सालों से यहाँ साथ रहे हैं। इस तरह का विभाजन अच्छा नहीं है।" उनके साथ बैठे अन्य लोग भी सिर हिलाकर सहमति जताते हैं।

विशेषज्ञों का मानना है कि टीएमसी के लिए नंदीग्राम की राह कठिन है क्योंकि यहाँ शुभेंदु अधिकारी का मजबूत संगठनात्मक ढांचा है। हालांकि, स्थानीय वफादारी और ध्रुवीकरण के प्रति जनता की प्रतिक्रिया चुनावी परिणाम को किसी भी दिशा में मोड़ सकती है।

नंदीग्राम आज भी मुख्य रूप से एक कृषि प्रधान क्षेत्र है, जहाँ किसानों की समस्याएं और बेरोजगारी जैसे मुद्दे आज भी बरकरार हैं। बस स्टैंड पर दुकान चलाने वाले शेख इमांतुल्लाह कहते हैं, "नेता शायद ही विकास या आजीविका की बात करते हैं। सारा ध्यान धर्म और विचारधारा पर है।"

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