
कांग्रेस से टकराव, TMC का उदय और अब असंतोष की आहट, पूरी कहानी
कांग्रेस से अलग होकर बनी टीएमसी में अब अंदरूनी असंतोष की चर्चाएं तेज हैं। राजनीतिक गलियारों में सवाल उठ रहे हैं कि क्या पार्टी नए संकट के दौर में प्रवेश कर रही है।
पश्चिम बंगाल की राजनीति में तृणमूल कांग्रेस (टीएमसी) को लेकर इन दिनों असंतोष और अंदरूनी खींचतान की चर्चाएं तेज हैं। पार्टी के भीतर मतभेदों और संभावित बगावत की खबरों ने राजनीतिक गलियारों में हलचल बढ़ा दी है। दिलचस्प बात यह है कि जिस पार्टी का जन्म ही एक राजनीतिक विद्रोह से हुआ था, आज उसी के भीतर असहमति और असंतोष की चर्चा हो रही है।
कांग्रेस से शुरू हुआ ममता का राजनीतिक सफर
Mamata Banerjee का राजनीतिक सफर छात्र जीवन से शुरू हुआ। छात्र राजनीति में सक्रिय रहने के बाद उन्होंने कांग्रेस का दामन थामा और जल्द ही पश्चिम बंगाल की राजनीति में एक प्रभावशाली नेता के रूप में उभरीं।वर्ष 1984 में वह पहली बार कांग्रेस के टिकट पर लोकसभा पहुंचीं। उस दौर में पश्चिम बंगाल में वाम मोर्चे का दबदबा था और ममता बनर्जी खुद को उसके सबसे मुखर विरोधी नेताओं में स्थापित कर रही थीं।
वाम विरोध से बढ़ी कांग्रेस नेतृत्व से दूरी
1990 के दशक की शुरुआत में ममता बनर्जी और कांग्रेस नेतृत्व के बीच मतभेद बढ़ने लगे। ममता का मानना था कि पश्चिम बंगाल में वामपंथी राजनीति के खिलाफ उनके आंदोलन को पार्टी नेतृत्व से अपेक्षित समर्थन नहीं मिल रहा है।राजनीतिक विश्लेषकों के अनुसार उस समय राष्ट्रीय स्तर पर कांग्रेस को संसद में वामपंथी दलों के सहयोग की जरूरत पड़ती थी, जबकि ममता बनर्जी पश्चिम बंगाल में वाम मोर्चे के खिलाफ अधिक आक्रामक रुख चाहती थीं। यही मतभेद आगे चलकर टकराव में बदल गया।
1998 में हुई टीएमसी की स्थापना
कांग्रेस नेतृत्व को खुली चुनौती देने के बाद 1997 में ममता बनर्जी को पार्टी से बाहर का रास्ता दिखाया गया। इसके बाद उन्होंने अपने समर्थक नेताओं के साथ नई राजनीतिक शुरुआत की।1 जनवरी 1998 को अखिल भारतीय तृणमूल कांग्रेस (टीएमसी) की स्थापना हुई। पार्टी का उद्देश्य पश्चिम बंगाल में कांग्रेस और वामपंथी राजनीति दोनों के विकल्प के रूप में खुद को स्थापित करना था।
34 साल पुराने वाम शासन का किया अंत
टीएमसी ने अगले एक दशक में खुद को बंगाल की सबसे बड़ी विपक्षी ताकत के रूप में स्थापित कर लिया। आखिरकार 2011 के विधानसभा चुनाव में कांग्रेस के साथ गठबंधन कर पार्टी ने वाम मोर्चे के 34 वर्षों के शासन का अंत कर दिया।उस चुनाव में गठबंधन को 227 सीटें मिलीं, जिनमें अकेले टीएमसी के खाते में 187 सीटें आईं। इसके बाद 2016 और 2021 के विधानसभा चुनावों में भी पार्टी ने सत्ता बरकरार रखी और ममता बनर्जी बंगाल की सबसे प्रभावशाली नेता बनकर उभरीं।
एक नजर में ममता बनर्जी का राजनीतिक सफर
1977-83: छात्र राजनीति में सक्रिय, पश्चिम बंगाल छात्र परिषद की कार्यसमिति सदस्य रहीं।
1979-80: पश्चिम बंगाल कांग्रेस (आई) की महासचिव बनीं और ट्रेड यूनियन गतिविधियों में सक्रिय रहीं।
1983-88: इंडियन नेशनल ट्रेड यूनियन कांग्रेस (महिला शाखा) की सचिव रहीं।
1984: पहली बार कांग्रेस के टिकट पर लोकसभा सांसद चुनी गईं।
1998: कांग्रेस से अलग होकर तृणमूल कांग्रेस की स्थापना की।
1999: एनडीए के साथ गठबंधन कर चुनाव लड़ा और पहली बार केंद्रीय रेल मंत्री बनीं।
2001: एनडीए से अलग होकर कांग्रेस के साथ गठबंधन किया, टीएमसी बंगाल की प्रमुख विपक्षी पार्टी बनी।
2011: वाम मोर्चे के 34 साल पुराने शासन का अंत कर पहली बार पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री बनीं।
2016 और 2021: लगातार दो और विधानसभा चुनाव जीतकर सत्ता बरकरार रखी।
अब क्यों हो रही है अंदरूनी कलह की चर्चा?
हाल के महीनों में टीएमसी के भीतर असंतोष की खबरों ने जोर पकड़ा है। पार्टी बैठकों में कुछ नेताओं की अनुपस्थिति, संगठनात्मक फैसलों पर सवाल, स्थानीय स्तर पर विरोध के स्वर और कुछ नेताओं के खिलाफ अनुशासनात्मक कार्रवाई ने इन चर्चाओं को और हवा दी है।राजनीतिक गलियारों में यह भी चर्चा है कि पार्टी के भीतर विभिन्न गुट सक्रिय हैं और कुछ नेता नेतृत्व शैली तथा संगठनात्मक फैसलों को लेकर असहज हैं। हालांकि पार्टी की ओर से लगातार एकजुटता का दावा किया जाता रहा है।इसी बीच कुछ सांसदों और वरिष्ठ नेताओं की नाराजगी से जुड़ी खबरों ने भी अटकलों को जन्म दिया है। हालांकि इन दावों की आधिकारिक पुष्टि होना अभी बाकी है।
क्या इतिहास खुद को दोहरा रहा है?
राजनीतिक पर्यवेक्षक मानते हैं कि टीएमसी का इतिहास ही असहमति और विद्रोह से शुरू हुआ था। ऐसे में जब पार्टी के भीतर असंतोष की चर्चाएं सामने आती हैं, तो स्वाभाविक रूप से अतीत की घटनाओं से तुलना होने लगती है।हालांकि मौजूदा स्थिति और 1990 के दशक की परिस्थितियां पूरी तरह अलग हैं। आज टीएमसी पश्चिम बंगाल की सत्तारूढ़ पार्टी है और राज्य की सबसे बड़ी राजनीतिक ताकत भी।फिर भी सवाल बना हुआ है कि क्या ये सिर्फ सामान्य राजनीतिक असहमति है या फिर पार्टी के भीतर किसी बड़े बदलाव की आहट?

