
दो बार निष्कासन से लेकर बंगाल के नेता प्रतिपक्ष तक: आखिर कौन हैं ऋतब्रत बनर्जी?
ऋतब्रत बनर्जी की किस्मत ने इतनी तेजी से करवट ली है कि खुद TMC के बड़े नेता हैरान हैं। अप्रैल में हुए विधानसभा चुनावों में तृणमूल कांग्रेस के टिकट पर 80 विधायकों ने जीत दर्ज की थी।
पश्चिम बंगाल की राजनीति में इस समय एक ऐसा तूफान आया है जिसने मुख्यमंत्री ममता बनर्जी और तृणमूल कांग्रेस (TMC) के शीर्ष नेतृत्व की रातों की नींद उड़ा दी है। राजनीतिक गलियारों में इस समय एक ही नाम की गूंज है— ऋतब्रत बनर्जी। 47 वर्षीय ऋतब्रत बनर्जी ने हाल ही में उलुबेरिया पूर्व निर्वाचन क्षेत्र से अपना पहला विधानसभा चुनाव जीता था। लेकिन आज उन्हें कई राजनीतिक विश्लेषक "बंगाल का एकनाथ शिंदे" कह रहे हैं। ठीक उसी तरह, जैसे महाराष्ट्र में शिवसेना के नेता एकनाथ शिंदे ने पार्टी को तोड़कर उद्धव ठाकरे को दरकिनार कर दिया था, कुछ वैसा ही खेल अब बंगाल में ममता बनर्जी के साथ होता दिख रहा है।
निष्कासन के बाद पलटी किस्मत: बने नेता प्रतिपक्ष
ऋतब्रत बनर्जी की किस्मत ने इतनी तेजी से करवट ली है कि खुद TMC के बड़े नेता हैरान हैं। अप्रैल में हुए विधानसभा चुनावों में तृणमूल कांग्रेस के टिकट पर 80 विधायकों ने जीत दर्ज की थी। हाल ही में पार्टी विरोधी गतिविधियों के आरोप में ऋतब्रत बनर्जी और एक अन्य विधायक संदीपन साहा को टीएमसी से निष्कासित कर दिया गया था। लेकिन इस निष्कासन के बाद जो हुआ, उसकी कल्पना किसी ने नहीं की थी।
बुधवार (2 जून) को टीएमसी के 80 में से 58 बागी विधायकों ने एक बैठक की। इन विधायकों ने ममता बनर्जी द्वारा तय किए गए नेता शोभनदेव चट्टोपाध्याय को पूरी तरह खारिज कर दिया और उनकी जगह ऋतब्रत बनर्जी को विधानसभा में अपना नेता (Leader of Opposition) चुन लिया। यानी लगभग तीन-चौथाई विधायकों का समर्थन अब ऋतब्रत के पास है।
फर्जी दस्तखत का भंडाफोड़ और अभिषेक बनर्जी पर निशाना
इस पूरे विवाद की शुरुआत तब हुई जब ऋतब्रत बनर्जी और संदीपन साहा ने 'व्हिसलब्लोअर' (सच्चाई सामने लाने वाले) की भूमिका निभाई। उन्होंने विधानसभा अध्यक्ष (Speaker) रथेंद्र बोस को पत्र लिखकर बताया कि शोभनदेव चट्टोपाध्याय को नेता प्रतिपक्ष बनाने के लिए टीएमसी के जिस पत्र को सौंपा गया है, उसमें 14 विधायकों के हस्ताक्षर पूरी तरह फर्जी हैं। इस बात की पुष्टि बाद में मुख्यमंत्री सुवेंदु अधिकारी ने भी की।
एक प्रेस कॉन्फ्रेंस के दौरान ऋतब्रत बनर्जी ने साफ कहा कि वे और उनके समर्थक विधायक ही विधानसभा में "असली और मुख्य" विपक्ष हैं। उन्होंने ममता बनर्जी को एक चौंकाने वाली सलाह देते हुए कहा कि अब समय आ गया है जब ममता बनर्जी को विधायी दल का 'मुख्य सलाहकार' बन जाना चाहिए और कमान नए हाथों में सौंपनी चाहिए। हालांकि, ऋतब्रत ने यह भी साफ किया कि उनकी इस 'असली टीएमसी' का ममता के भतीजे अभिषेक बनर्जी से कोई लेना-देना नहीं है। गौरतलब है कि बंगाल चुनाव में तृणमूल कांग्रेस की करारी हार के लिए बड़े पैमाने पर अभिषेक बनर्जी को ही जिम्मेदार ठहराया जा रहा है। अब कयास लगाए जा रहे हैं कि आने वाले दिनों में कई और असंतुष्ट विधायक इस बागी गुट में शामिल हो सकते हैं।
क्या छिन जाएगा टीएमसी का चुनाव चिह्न?
राजनीतिक विश्लेषकों के बीच अब सबसे बड़ी उत्सुकता इस बात को लेकर है कि क्या ऋतब्रत बनर्जी और उनका गुट महाराष्ट्र के एकनाथ शिंदे और अजीत पवार की राह पर चलेगा? जिस तरह शिंदे ने शिवसेना और अजीत पवार ने अपने चाचा शरद पवार से एनसीपी (NCP) का नाम और चुनाव चिह्न छीन लिया था, क्या उसी तरह ऋतब्रत भी टीएमसी के 'घास-फूल' (Grass-Flower) निशान पर अपना कब्जा जमा लेंगे? 58 विधायकों के समर्थन के साथ उनके पास तकनीकी रूप से यह ताकत आ चुकी है।
कौन हैं ऋतब्रत बनर्जी? कम्युनिस्ट से बागी नेता तक का सफर
कोलकाता में जन्मे और पले-बढ़े ऋतब्रत बनर्जी को कभी वामपंथी (Left) खेमे का 'यंग तुर्क' यानी एक तेज-तर्रार युवा नेता माना जाता था। उन्होंने 1990 के दशक के उत्तरार्ध में कोलकाता के आशुतोष कॉलेज में छात्र संघ के महासचिव के रूप में अपनी राजनीतिक यात्रा शुरू की थी। इसके बाद वे 2008 से 2016 के बीच माकपा (CPI-M) के छात्र संगठन एसएफआई (SFI) के अखिल भारतीय महासचिव भी रहे।
साल 2014 में, महज 35 वर्ष की उम्र में, सीपीआईएम ने उन्हें राज्यसभा भेजा। वे पश्चिम बंगाल के पूर्व मुख्यमंत्री बुद्धदेव भट्टाचार्य और माकपा के पूर्व महासचिव सीताराम येचुरी के बेहद करीबी माने जाते थे। हालांकि, 2017 में कम्युनिस्ट पार्टी ने भी उन्हें पार्टी विरोधी गतिविधियों के आरोप में बाहर निकाल दिया था। उन पर आरोप था कि कम्युनिस्ट विचारधारा के विपरीत उनका लाइफस्टाइल बेहद आलीशान और विलासितापूर्ण था, जिसे लेकर पार्टी के भीतर काफी शिकायतें थीं।
2020 में थामा था टीएमसी का हाथ
माकपा से निकाले जाने के बाद कुछ साल वे निर्दलीय रहे और फिर 2020 में वे ममता बनर्जी की टीएमसी में शामिल हो गए। टीएमसी ने उन्हें 2024 में दूसरी बार राज्यसभा भेजा। इस साल उनका राज्यसभा का कार्यकाल समाप्त हुआ, जिसके बाद उन्होंने विधानसभा चुनाव लड़ा और शानदार जीत हासिल की। सूत्रों का कहना है कि अगर इस चुनाव में टीएमसी की सरकार बनती, तो ऋतब्रत को कैबिनेट मंत्री का पद मिलना तय था।
2020 से 2026 के बीच उन्होंने टीएमसी के मजदूर संगठन INTTUC के प्रदेश अध्यक्ष के रूप में भी काम किया। दिलचस्प बात यह है कि कभी ममता बनर्जी के पहले कार्यकाल (2013) के दौरान दिल्ली में तत्कालीन राज्य वित्त मंत्री अमित मित्रा पर हुए हमले के सिलसिले में ऋतब्रत को दिल्ली पुलिस ने गिरफ्तार भी किया था। लेकिन आज समय बदल चुका है, और वही ऋतब्रत अब ममता बनर्जी के राजनीतिक साम्राज्य के लिए सबसे बड़ा खतरा बनकर उभरे हैं।

