कर्नाटक में डी के शिवकुमार की ताजपोशी से पहले गुटबाजी तेज, खड़गे और राहुल के सामने सिद्धारमैया ने अड़ाई टांग
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कर्नाटक में डी के शिवकुमार की ताजपोशी से पहले गुटबाजी तेज, खड़गे और राहुल के सामने सिद्धारमैया ने अड़ाई टांग

कर्नाटक की राजनीति में सत्ता हस्तांतरण का दौर शुरू हो गया है। मुख्यमंत्री सिद्धारमैया आसानी से इस्तीफा देने और डीके शिवकुमार के लिए रास्ता साफ करने पर सहमत हो गए हैं, जिसने कांग्रेस आलाकमान को भी चौंका दिया है। हालांकि, नए मंत्रिमंडल के गठन को लेकर पेंच फंस गया है।


कर्नाटक कांग्रेस में लंबे समय से चल रही अंदरूनी खींचतान अब अपने अंतिम पड़ाव पर पहुंच गई है। मुख्यमंत्री सिद्धारमैया ने आखिरकार अपने पद से हटने का मन बना लिया है ताकि राज्य के कद्दावर नेता डीके शिवकुमार के मुख्यमंत्री बनने का रास्ता साफ हो सके। सिद्धारमैया ने जिस तेजी और बिना किसी बगावत के इस फैसले को स्वीकार किया, उससे खुद कांग्रेस आलाकमान भी हैरान है। लेकिन इस स्मूथ ट्रांजिशन (शांतिपूर्ण बदलाव) के बाद अब असली सिरदर्द नए मंत्रिमंडल के गठन को लेकर शुरू हो गया है। नए मंत्रियों की लिस्ट को लेकर शुक्रवार (29 मई) को दिल्ली में दिनभर चली मैराथन बैठकें किसी अंतिम नतीजे पर पहुंचे बिना समाप्त हो गईं।

दिल्ली में राहुल और खड़गे की अलग-अलग बैठकें

शुक्रवार को निवर्तमान मुख्यमंत्री सिद्धारमैया और भावी मुख्यमंत्री डीके शिवकुमार दोनों दिल्ली में थे। कांग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खड़गे और लोकसभा में विपक्ष के नेता राहुल गांधी ने दोनों नेताओं के साथ अलग-अलग और लंबी बातचीत की। इस बैठक का मुख्य उद्देश्य नए मंत्रिमंडल के चेहरों पर आम सहमति बनाना और आगामी राज्यसभा तथा विधान परिषद (Legislative Council) चुनावों के लिए उम्मीदवारों के नाम तय करना था।

देर शाम तक पार्टी के अंदरूनी सूत्रों से मिली जानकारी के मुताबिक, बातचीत कई मुद्दों पर आकर अटक गई है। सिद्धारमैया अपने वफादार विधायकों के लिए नए मंत्रिमंडल में बड़ी हिस्सेदारी मांग रहे हैं, जिसे देने में डीके शिवकुमार और आलाकमान थोड़े झिझक रहे हैं। इन मतभेदों के बीच केवल एक ही बात की पुष्टि हो सकी है, जो खुद डीके शिवकुमार ने की। उन्होंने बताया कि शनिवार (30 मई) शाम 4 बजे बेंगलुरु में कांग्रेस विधायक दल (CLP) की बैठक बुलाई गई है, जहां औपचारिक रूप से नए नेता (मुख्यमंत्री) का चुनाव किया जाएगा।

क्या है कर्नाटक के लिए राहुल गांधी का 'केरल मॉडल'?

पार्टी के वरिष्ठ सूत्रों का कहना है कि राहुल गांधी कर्नाटक में 'केरल ब्लूप्रिंट' या केरल मॉडल को दोहराना चाहते हैं। इस मॉडल के पीछे दो मुख्य उद्देश्य हैं:

एक साथ शपथ ग्रहण: आलाकमान चाहता है कि न केवल सत्ता का हस्तांतरण सुचारू रूप से दिखे, बल्कि नए मुख्यमंत्री के साथ पूरा मंत्रिमंडल एक साथ शपथ ले, ताकि सरकार तुरंत बिना किसी देरी के काम पर लौट सके। केरल में भी मुख्यमंत्री और पूरे कैबिनेट ने एक साथ शपथ ली थी।

युवा और अनुभव का मिश्रण: राहुल गांधी की जिद है कि डीके शिवकुमार की नई कैबिनेट में कुछ पुराने और अनुभवी चेहरों को बरकरार रखते हुए एक बड़ा हिस्सा नए और युवा चेहरों को दिया जाए।

चार डिप्टी सीएम की मांग पर अड़े सिद्धारमैया?

मीडिया में इस बात को लेकर भी कयासों का बाजार गर्म है कि नए मंत्रिमंडल में कितने उपमुख्यमंत्री (Deputy CM) होंगे। चर्चा है कि सिद्धारमैया ने शिवकुमार को घेरने के लिए अपने खेमे के चार वफादार नेताओं को डिप्टी सीएम बनाने की मांग रख दी है।

हालांकि, सूत्रों का कहना है कि आलाकमान केवल दो डिप्टी सीएम बनाने के पक्ष में है। ये दो पद राज्य के दो सबसे बड़े और राजनीतिक रूप से महत्वपूर्ण समुदायों— लिंगायत और दलित को दिए जा सकते हैं।

लिंगायत चेहरा: अगर सिद्धारमैया की बात मानी जाती है, तो राज्य में पार्टी का बड़ा लिंगायत चेहरा माने जाने वाले एम.बी. पाटिल को डिप्टी सीएम बनाया जा सकता है।

दलित चेहरा: वरिष्ठ दलित नेता और पूर्व गृह मंत्री जी. परमेश्वर को दोबारा डिप्टी सीएम का पद मिल सकता है, जो वह 2018-19 में भी संभाल चुके हैं। लेकिन खबरें यह भी हैं कि परमेश्वर अब शिवकुमार के मातहत डिप्टी सीएम के रूप में काम करने के इच्छुक नहीं हैं। अगर वह इस रुख पर अड़े रहते हैं, तो पार्टी को किसी अन्य दलित चेहरे की तलाश करनी होगी।

सिद्धारमैया खेमे को ज्यादा सीटें क्यों हैं जरूरी?

कर्नाटक का यह मामला काफी हद तक केरल में वीडी सतीशन के मुख्यमंत्री बनने जैसा है। केरल में सतीशन मुख्यमंत्री बने थे, लेकिन उनके मंत्रिमंडल में 12 में से 8 मंत्री केसी वेणुगोपाल खेमे के थे। कर्नाटक में भी स्थिति कुछ ऐसी ही बन रही है।

भले ही आलाकमान डीके शिवकुमार को मुख्यमंत्री की कुर्सी सौंप रहा है, लेकिन कर्नाटक के दो-तिहाई (Nearly 2/3rd) कांग्रेस विधायक आज भी सिद्धारमैया के साथ खड़े हैं। इसके अलावा, राहुल गांधी भी चाहते हैं कि नए कैबिनेट में अल्पसंख्यकों, पिछड़े वर्गों और दलितों (AHINDA सोशल गठबंधन) को पूरा प्रतिनिधित्व मिले, जिसके सबसे बड़े नेता सिद्धारमैया ही हैं। इसलिए सिद्धारमैया के वफादारों को नजरअंदाज करना शिवकुमार और आलाकमान दोनों के लिए नामुमकिन है।

कड़े अनुशासन और गोपनीयता के बीच आज फैसला

कर्नाटक कैबिनेट में अधिकतम 34 मंत्री हो सकते हैं। खड़गे और राहुल गांधी का मानना है कि कुछ शुरुआती पदों को छोड़कर पूरी कैबिनेट को एक साथ भर दिया जाना चाहिए ताकि तीनों प्रमुख गुटों (सिद्धारमैया गुट, शिवकुमार गुट और खुद खड़गे गुट) के नेताओं को संतुष्ट किया जा सके।

सूत्रों के मुताबिक, अगर शनिवार शाम तक दोनों नेताओं के बीच पूरी सहमति नहीं बनती है, तो आलाकमान 12 से 15 मुख्य मंत्रियों की एक शॉर्ट लिस्ट को मंजूरी दे सकता है, जो रविवार (31 मई) को नए सीएम के साथ शपथ ले सकते हैं। बाकी के पदों को बाद में कैबिनेट विस्तार के जरिए भरा जाएगा। फिलहाल, आलाकमान ने दोनों नेताओं को मीडिया में कोई भी बयान देने से सख्त मना किया है। सिद्धारमैया भले ही चुपचाप कुर्सी छोड़ रहे हैं, लेकिन सरकार पर अपना नियंत्रण बनाए रखने के लिए वह कैबिनेट में अपने लोगों की फौज खड़ी करना चाहते हैं, जिससे वे शिवकुमार पर लगाम कस सकें। अब देखना होगा कि आलाकमान इस खींचतान को कैसे संभालता है।

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