सोनिया का गले लगाना और राहुल से 90 मिनट की बैठक, क्या सच में होने वाला है TMC और कांग्रेस का विलय?
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सोनिया का गले लगाना और राहुल से 90 मिनट की बैठक, क्या सच में होने वाला है TMC और कांग्रेस का विलय?

पिछले कुछ दिनों में दिल्ली के भीतर ममता बनर्जी और कांग्रेस के बीच नजदीकियां साफ देखी गई हैं। 8 जून को हुई 'इंडिया' गठबंधन की बैठक में पूर्व कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी ने ममता बनर्जी को गले लगाया।


पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री और तृणमूल कांग्रेस (TMC) की प्रमुख ममता बनर्जी इस समय अपने राजनीतिक जीवन के सबसे बड़े तूफानों में से एक का सामना कर रही हैं। एक तरफ जहां उनकी अपनी ही पार्टी के सांसदों (MPs) और विधायकों (MLAs) ने उनके खिलाफ बगावत का बिगुल फूंक दिया है, वहीं दूसरी तरफ दिल्ली के सियासी गलियारों में एक नई चर्चा ने जोर पकड़ लिया है। चर्चा यह है कि क्या ममता बनर्जी अपनी पार्टी टीएमसी का विलय (Merger) कांग्रेस में करने जा रही हैं?

पिछले तीन सालों से विपक्षी 'इंडिया' (INDIA) गठबंधन के भीतर कांग्रेस के नेतृत्व को लगातार चुनौती देने वाली ममता बनर्जी के रुख में अचानक आया यह बदलाव हर किसी को हैरान कर रहा है। साल 1997 में कांग्रेस छोड़कर अपनी अलग पार्टी बनाने वाली ममता आज बंगाल में अपने राजनीतिक अस्तित्व को बचाने की लड़ाई लड़ रही हैं। इसी बीच कांग्रेस के प्रति उनके बदलते व्यवहार ने इन अफवाहों को हवा दे दी है।

दिल्ली में बढ़ी नजदीकियां और सोनिया गांधी का साथ

पिछले कुछ दिनों में दिल्ली के भीतर ममता बनर्जी और कांग्रेस के 'प्रथम परिवार' (गांधी परिवार) के बीच नजदीकियां साफ देखी गई हैं। 8 जून को हुई 'इंडिया' गठबंधन की बैठक में पूर्व कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी ने ममता बनर्जी को गले लगाया। इतना ही नहीं, जब बैठक के दौरान गठबंधन के कुछ अन्य नेताओं ने कांग्रेस पर निशाना साधना शुरू किया, तो ममता बनर्जी उन गिने-चुने नेताओं में से थीं, जो कांग्रेस के बचाव में खुलकर खड़ी हुईं।

इसके ठीक एक दिन बाद, ममता बनर्जी सीधे सोनिया गांधी के आवास 10, जनपथ पहुंचीं। खबरों के मुताबिक, दोनों नेताओं के बीच हुई इस मुलाकात में भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) के खिलाफ मिलकर लड़ने और आपसी सहयोग बढ़ाने पर लंबी चर्चा हुई।

राहुल गांधी और अभिषेक बनर्जी की 90 मिनट की मुलाकात

राजनीतिक हलकों में हलचल तब और बढ़ गई जब बुधवार (10 जून) को ममता बनर्जी के भतीजे और टीएमसी के अघोषित नंबर-2 नेता अभिषेक बनर्जी कांग्रेस नेता राहुल गांधी से मिलने पहुंचे। बंगाल में पार्टी की चुनावी हार और उसके बाद मचे आंतरिक घमासान के बाद से ही अभिषेक बनर्जी पार्टी के बागियों के निशाने पर रहे हैं।

अभिषेक बनर्जी और राहुल गांधी के बीच यह मुलाकात करीब 90 मिनट यानी डेढ़ घंटे तक चली। दोनों पार्टियों के सूत्रों के मुताबिक, इस बैठक का मुख्य एजेंडा भी भाजपा के खिलाफ एक "एकजुट लड़ाई" तैयार करना था।

जब बुधवार दोपहर ममता बनर्जी दिल्ली से कोलकाता के लिए रवाना हुईं, तब तक यह अफवाह पूरी तरह फैल चुकी थी कि बनर्जी परिवार ने गांधी परिवार के सामने टीएमसी के कांग्रेस में विलय का प्रस्ताव रखा है। कुछ मीडिया रिपोर्ट्स में तो यहाँ तक दावा किया गया कि अगर यह विलय होता है, तो ममता बनर्जी को कांग्रेस का राष्ट्रीय उपाध्यक्ष बनाया जा सकता है, जबकि अभिषेक बनर्जी को पार्टी में महासचिव का पद दिया जा सकता है। अफवाहें यह भी हैं कि अभिषेक ने राहुल गांधी के सामने शर्त रखी है कि विलय के बाद कांग्रेस ममता बनर्जी को राज्यसभा भेजे।

क्या वाकई भविष्य में होगा विलय?

जब यह खबरें कोलकाता पहुंचीं, तो पश्चिम बंगाल प्रदेश कांग्रेस कमेटी के वरिष्ठ प्रवक्ता चंदन घोष चौधरी ने इन अफवाहों को और बल दे दिया। उन्होंने एक इंटरव्यू में स्वीकार किया कि:

"टीएमसी का कांग्रेस में विलय का प्रस्ताव सामने आया है, लेकिन अभी तक इस पर कोई आधिकारिक या अंतिम फैसला नहीं लिया गया है।"

चौधरी ने यह भी दावा किया कि इस प्रस्ताव को आगे बढ़ाने से पहले बंगाल कांग्रेस के नेताओं से भी सलाह-मशविरा किया गया था और पार्टी के भीतर इस पर विचार-विमर्श चल रहा है। कई नेताओं का मानना है कि कांग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खड़गे द्वारा 11 जून को बुलाई गई कांग्रेस महासचिवों और राज्य प्रभारियों की आपातकालीन बैठक में इस मुद्दे पर चर्चा हो सकती है।

हालांकि, दिल्ली में बैठे कांग्रेस के शीर्ष नेताओं का कहना है कि यह जानकारी पूरी तरह सच नहीं है। गांधी परिवार के एक करीबी नेता ने नाम न छापने की शर्त पर बताया, "हाँ, टीएमसी के कांग्रेस में विलय की संभावना पर बात जरूर हुई है, लेकिन यह भविष्य की योजना है। फिलहाल बातचीत केवल गठबंधन को मजबूत करने, भाजपा के खिलाफ मिलकर लड़ने और ममता बनर्जी को कांग्रेस आलाकमान की ओर से पूरा समर्थन देने तक सीमित है।"

"दीदी की तरफ से आया प्रस्ताव"

राहुल गांधी के करीबी माने जाने वाले कांग्रेस के एक वरिष्ठ सांसद ने इस पूरे घटनाक्रम पर चुटकी लेते हुए कहा कि विलय का यह प्रस्ताव किसी और की तरफ से नहीं, बल्कि खुद ममता बनर्जी की ओर से आया है।

उन्होंने इसे वक्त का फेर बताते हुए कहा, "एक महीने पहले तक ममता बनर्जी बंगाल में कांग्रेस के अस्तित्व को स्वीकार करने के लिए भी तैयार नहीं थीं। आज हमारी लीडरशिप बड़ा दिल दिखा रही है और उन्हें गठबंधन से लेकर विलय तक के विकल्प दे रही है। अब ममता और उनके बचे हुए वफादार खुद चाहते हैं कि टीएमसी का कांग्रेस में विलय हो जाए।"

पार्टी के अंदरूनी सूत्रों का कहना है कि फिलहाल गांधी और बनर्जी परिवार के बीच बातचीत का मुख्य उद्देश्य पुराने मतभेदों को भुलाकर एक बेहतर रणनीति के साथ काम करना है।

अधीर रंजन चौधरी का रुख और टीएमसी की चुप्पी

ममता बनर्जी के सबसे बड़े आलोचकों में से एक और बंगाल कांग्रेस के कद्दावर नेता अधीर रंजन चौधरी ने इस तरह के किसी भी आधिकारिक प्रस्ताव की जानकारी होने से इनकार किया है। उन्होंने कहा, "मैं बंगाल इकाई का हिस्सा हूँ और मैंने इस विलय के बारे में कुछ नहीं सुना। हो सकता है कि यह सिर्फ एक अफवाह हो।" हालांकि, उन्होंने सोनिया गांधी की तारीफ करते हुए कहा कि ममता बनर्जी द्वारा कई बार कांग्रेस को अपमानित किए जाने के बाद भी सोनिया गांधी बड़ा दिल दिखाकर उनके प्रति एकजुटता प्रकट कर रही हैं।

दूसरी तरफ, तृणमूल कांग्रेस (TMC) ने इस पूरे मुद्दे पर आधिकारिक रूप से चुप्पी साध रखी है। टीएमसी के सूत्रों का कहना है कि दिल्ली में हुई बैठकें विपक्ष के नियमित समन्वय का हिस्सा थीं, न कि किसी विलय की औपचारिक बातचीत।

कानूनी पेंच: क्या यह विलय संभव है?

राजनीतिक चर्चाओं से इतर, कानूनी विशेषज्ञों का मानना है कि मौजूदा परिस्थितियों में इस विलय की बातें करना बेमानी है। लोकसभा के पूर्व महासचिव पीडीटी अचारी के अनुसार, भारतीय संविधान की 10वीं अनुसूची (दल-बदल विरोधी कानून) के तहत किसी भी पार्टी के विलय के लिए दो बेहद जरूरी शर्तें पूरी होनी चाहिए:

विधायकों/सांसदों का बहुमत: मूल पार्टी के कम से कम दो-तिहाई (2/3) निर्वाचित सदस्यों (विधायकों या सांसदों) को इस विलय के लिए राजी होना होगा।

मूल पार्टी की मंजूरी: पार्टी के संगठनात्मक ढांचे को भी इस विलय को मंजूरी देनी होगी।

यदि ममता बनर्जी खुद विलय करना चाहती हैं, लेकिन उनके पास अपनी पार्टी के दो-तिहाई विधायकों या सांसदों का समर्थन नहीं है, तो यह विलय कानूनी रूप से अवैध माना जाएगा। ऐसी स्थिति में जो भी सांसद या विधायक विलय का हिस्सा बनेंगे, उनकी सदस्यता रद्द हो सकती है।

सुप्रीम कोर्ट के एक वरिष्ठ वकील और कांग्रेस सांसद ने इस अफवाह को कल्पना मात्र बताते हुए कहा, "ममता बनर्जी भले ही पार्टी की मुख्य नेता हैं, लेकिन खबरों के मुताबिक, आज उनके पास अपने दो-तिहाई विधायकों या सांसदों का समर्थन नहीं है। यही स्थिति बागी गुट की भी है; वे भी अलग होकर एनडीए में शामिल नहीं हो सकते क्योंकि वे मूल पार्टी नहीं हैं।"

उन्होंने साफ किया कि यह विलय तभी संभव है जब या तो ममता बनर्जी के पास शून्य (0) विधायक-सांसद बचें (यानी वे अकेले रह जाएं) या फिर सारे बागी नेता वापस आकर ममता बनर्जी के फैसले को स्वीकार कर लें।

फिलहाल, पश्चिम बंगाल की राजनीति एक बेहद संवेदनशील मोड़ पर है। ममता बनर्जी के सामने अपनी पार्टी को टूटने से बचाने की बड़ी चुनौती है। क्या वे वाकई अपनी स्वतंत्र राजनीतिक पहचान को छोड़कर वापस कांग्रेस की छतरी के नीचे जाएंगी, या फिर यह दिल्ली में खुद को मजबूत दिखाने की एक रणनीतिक चाल है? आने वाले कुछ दिन बंगाल और देश की राजनीति की नई दिशा तय करेंगे।

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