
सीमा पर फंसे प्रवासी, भारत-बांग्लादेश के बीच पहचान विवाद ने बढ़ाई टेंशन
अवैध बांग्लादेशी प्रवासियों की वापसी को लेकर भारत और बांग्लादेश के बीच नागरिकता सत्यापन पर विवाद गहरा गया है, जिससे डिपोर्टेशन प्रक्रिया प्रभावित हो रही है।
भारत द्वारा कथित अवैध बांग्लादेशी प्रवासियों को वापस भेजने की मुहिम तेज किए जाने के बीच सीमा पर कई गतिरोध सामने आए हैं। इन घटनाओं ने एक अहम तथ्य को उजागर किया है कि दोनों देशों के सहयोग के बिना बड़े पैमाने पर निर्वासन (डिपोर्टेशन) की प्रक्रिया आसानी से पूरी नहीं हो सकती।
विवाद का केंद्र नागरिकता सत्यापन है। भारत का कहना है कि वह ऐसे बांग्लादेशी नागरिकों की पहचान कर रहा है जो बिना वैध दस्तावेजों के भारत में रह रहे हैं, जबकि बांग्लादेश का आग्रह है कि किसी भी व्यक्ति को वापस लेने से पहले यह प्रमाणित किया जाना चाहिए कि वह वास्तव में उसका नागरिक है।
नो-मैन्स लैंड में फंसे लोग
पश्चिम बंगाल के नदिया जिले के करीमपुर सेक्टर में कई लोगों का भविष्य अनिश्चित बना हुआ है, क्योंकि अधिकारी यह तय करने की कोशिश कर रहे हैं कि उन्हें सीमा पार भेजा जा सकता है या नहीं।उत्तरी बंगाल में एक अन्य मामले में 10 सदस्यीय परिवार को कई दिनों तक नो-मैन्स लैंड में रहना पड़ा। आरोप है कि बांग्लादेशी सीमा सुरक्षा बल ने उन्हें प्रवेश देने से इनकार कर दिया था।इसी तरह के हालात असम में भी देखने को मिले हैं।
15 जून को मिली जानकारी के अनुसार, असम के मनकाचर सेक्टर में भारत-बांग्लादेश सीमा के नो-मैन्स लैंड में नौ कथित बांग्लादेशी नागरिक फंसे रहे। उनकी नागरिकता को लेकर सीमा सुरक्षा बल (बीएसएफ) और बॉर्डर गार्ड बांग्लादेश (बीजीबी) के बीच सहमति नहीं बन पाई।वहीं बांग्लादेशी मीडिया के मुताबिक, कुश्तिया सीमा क्षेत्र के पास 12 लोगों का एक समूह, जिसमें महिलाएं और बच्चे भी शामिल थे, लगातार तीसरे दिन नो-मैन्स लैंड में फंसा रहा क्योंकि बीजीबी ने नागरिकता सत्यापन के बिना उन्हें स्वीकार करने से इनकार कर दिया।
बीएसएफ और बीजीबी के बीच हुई चर्चा
पिछले सप्ताह बीएसएफ और बीजीबी के बीच हुई बैठक में यह मुद्दा प्रमुखता से उठा। दोनों पक्षों ने सीमा प्रबंधन, अवैध प्रवासन और कथित पुशबैक की घटनाओं को लेकर अपनी-अपनी चिंताएं साझा कीं।बांग्लादेश लंबे समय से इस बात का विरोध करता रहा है कि बिना पर्याप्त जांच-पड़ताल के लोगों को उसकी सीमा में भेजने की कोशिश की जा रही है।
बांग्लादेश के गृह मंत्री सलाहुद्दीन अहमद ने कहा, "हमारे बीजीबी जवान सीमा पर पूरी तरह सतर्क हैं। किसी भी अवैध घुसपैठ या जबरन प्रवेश की कोशिश का कड़ा प्रतिरोध किया जाएगा। बीजीबी अधिकारियों ने भारतीय पक्ष से कहा कि किसी व्यक्ति की नागरिकता का निर्धारण केवल दूसरा देश नहीं कर सकता और प्रत्यावर्तन (रिपैट्रिएशन) दोनों देशों के बीच स्थापित प्रक्रिया के तहत ही होना चाहिए।
हजारों सत्यापन अनुरोध लंबित
सूत्रों के अनुसार, भारत ने बांग्लादेश को हजारों ऐसे मामलों की सूची भेजी है जिनमें संदिग्ध बांग्लादेशी नागरिकों की पहचान की पुष्टि मांगी गई है।यह प्रक्रिया कई महीनों तक चल सकती है, जिससे हिरासत में रखे गए लोगों की स्थिति अनिश्चित बनी रहती है।भारतीय अधिकारियों का कहना है कि समस्या केवल अवैध प्रवासियों की पहचान तक सीमित नहीं है। यदि भारत किसी व्यक्ति को बांग्लादेशी नागरिक मान भी ले, तब भी उसकी वापसी तभी संभव है जब बांग्लादेश उसे स्वीकार करे।
विशेषज्ञों के अनुसार, किसी भी देश में निर्वासन प्रक्रिया तभी पूरी हो सकती है जब संबंधित व्यक्ति को स्वीकार करने वाला देश उसकी नागरिकता को मान्यता दे।
दावों और हकीकत के बीच अंतर
भारतीय जनता पार्टी लंबे समय से पश्चिम बंगाल और असम में अवैध बांग्लादेशी घुसपैठ का मुद्दा उठाती रही है। नागरिकता, सीमा सुरक्षा और सरकारी योजनाओं के लाभ जैसे मुद्दों के साथ यह विषय अक्सर चुनावी राजनीति का केंद्र रहा है।पश्चिम बंगाल में सत्ता में आने के बाद भाजपा सरकार ने कथित अवैध प्रवासियों के खिलाफ अभियान शुरू किया था।
सरकार का दावा है कि सत्ता संभालने के बाद से लगभग 4,800 कथित अवैध प्रवासियों को बांग्लादेश भेजा जा चुका है, जबकि 836 लोग अब भी होल्डिंग सेंटरों में रखे गए हैं और उनकी वापसी की प्रक्रिया जारी है।हालांकि हालिया घटनाओं ने दिखाया है कि केवल पहचान और हिरासत पर्याप्त नहीं है। अंतिम रूप से निर्वासन तभी संभव है जब बांग्लादेश संबंधित व्यक्ति को अपना नागरिक मानते हुए स्वीकार करे।
नागरिकता विवाद बने बड़ी बाधा
प्रवासन विशेषज्ञों का कहना है कि दुनिया भर में निर्वासन मामलों में नागरिकता को लेकर विवाद आम बात है।दक्षिण एशिया में प्रवासन और सीमा प्रशासन का अध्ययन करने वाली शोधकर्ता सुचरिता सेनगुप्ता कहती हैं, "कोई भी देश यह तय नहीं कर सकता कि दूसरे देश का नागरिक कौन है। संबंधित देश को यह संतुष्ट होना चाहिए कि लौटाया जा रहा व्यक्ति वास्तव में उसका नागरिक है।"
यही दृष्टिकोण का अंतर वर्तमान विवाद की जड़ है। भारत के लिए मुख्य सवाल यह है कि क्या व्यक्ति अवैध रूप से बांग्लादेश से भारत आया है, जबकि बांग्लादेश के लिए सबसे महत्वपूर्ण प्रश्न यह है कि क्या उसके नागरिक होने के पर्याप्त प्रमाण मौजूद हैं।
सीमा विवादों का मानवीय पहलू
इन विवादों का सबसे बड़ा असर उन लोगों पर पड़ता है जो दोनों देशों के बीच फंस जाते हैं। कई मामलों में लोगों को कई दिनों तक सीमा क्षेत्र में रहना पड़ा, जबकि अधिकारी उनकी पहचान तय करने या निर्वासन पर सहमति बनाने की कोशिश करते रहे। कुछ मामलों में स्थानीय प्रशासन और सीमा बलों ने अस्थायी भोजन और आश्रय की व्यवस्था भी की।
मानवाधिकार कार्यकर्ताओं का कहना है कि नागरिकता विवाद लंबे समय तक चलने पर लोग कानूनी अनिश्चितता में फंस जाते हैं, खासकर तब जब उनके दस्तावेज अधूरे या विवादित हों।सूत्रों के मुताबिक, संयुक्त राष्ट्र भी सीमा पर कथित पुशबैक से जुड़ी रिपोर्टों पर नजर बनाए हुए है। मानवाधिकार संगठनों ने भी अपील की है कि किसी भी निर्वासन अभियान में कानूनी प्रक्रिया और मानवाधिकारों का पूरा सम्मान किया जाए।
दोनों देश अपने-अपने रुख पर कायम
हाल की बैठकों में न तो भारत और न ही बांग्लादेश ने अपने रुख में किसी बदलाव के संकेत दिए हैं।भारत अवैध प्रवासन पर सख्ती जारी रखना चाहता है और उम्मीद करता है कि पड़ोसी देश अपने नागरिकों को वापस स्वीकार करें।वहीं बांग्लादेश का कहना है कि नागरिकता सत्यापन के बिना किसी भी व्यक्ति को सीमा पार स्वीकार नहीं किया जा सकता।
इस पूरे विवाद ने स्पष्ट कर दिया है कि अवैध प्रवासन के खिलाफ अभियान केवल घरेलू कार्रवाई का विषय नहीं है, बल्कि यह भारत-बांग्लादेश सहयोग और कूटनीतिक समन्वय की भी बड़ी परीक्षा बन चुका है।
यदि नागरिकता सत्यापन और प्रत्यावर्तन की प्रक्रिया में देरी जारी रहती है, तो सैकड़ों लोगों की वापसी और बड़े पैमाने पर निर्वासन अभियान की गति पर गंभीर असर पड़ सकता है।

