भारत को मिली पहली निजी गोल्ड माइन, क्या अब घटेगा अरबों का गोल्ड इंपोर्ट?
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भारत को मिली पहली निजी गोल्ड माइन, क्या अब घटेगा अरबों का गोल्ड इंपोर्ट?

आंध्र प्रदेश में आजादी के बाद भारत की पहली निजी सोने की खान शुरू हुई। जोन्नागिरी गोल्ड प्रोजेक्ट से घरेलू स्वर्ण उत्पादन बढ़ेगा और आयात पर निर्भरता घटाने में मदद मिल सकती है।


दुनिया के सबसे बड़े स्वर्ण उपभोक्ता देशों में शामिल होने के बावजूद भारत लंबे समय से अपनी जरूरत का अधिकांश सोना विदेशों से आयात करता रहा है। अब यह स्थिति बदलने की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम उठाया गया है। आंध्र प्रदेश में जोन्नागिरी गोल्ड प्रोजेक्ट (Jonnagiri Gold Project) के शुरू होने के साथ ही देश को आजादी के बाद पहली निजी स्वर्ण खान (Private Gold Mine) मिल गई है।

आंध्र प्रदेश के मुख्यमंत्री एन. चंद्रबाबू नायडू ने 24 जून को इस परियोजना का उद्घाटन किया। इसे देश के खनन क्षेत्र के लिए एक ऐतिहासिक उपलब्धि माना जा रहा है। यह परियोजना न केवल घरेलू स्वर्ण उत्पादन बढ़ाने में मदद करेगी, बल्कि भारत की आयात पर निर्भरता कम करने की दिशा में भी अहम भूमिका निभा सकती है।

कर्नूल में स्थित है जोन्नागिरी गोल्ड प्रोजेक्ट

यह परियोजना आंध्र प्रदेश के कर्नूल जिले के तुग्गली मंडल में स्थित है। परियोजना के महत्व को देखते हुए आंध्र प्रदेश सरकार ने हाल ही में जोन्नागिरी गांव का नाम बदलकर 'स्वर्णगिरि' कर दिया।उद्घाटन समारोह के दौरान मुख्यमंत्री नायडू ने परियोजना का शुभारंभ करने के साथ इसके दूसरे विस्तार चरण की आधारशिला भी रखी। साथ ही उन्होंने सोने वाले अयस्क (Gold Ore) से लदे भारी वाहनों को प्रसंस्करण इकाई के लिए रवाना किया।

इस अवसर पर परियोजना विकसित करने वाली कंपनी ने खान से निकाले गए सोने से तैयार आंध्र प्रदेश का स्वर्ण मानचित्र मुख्यमंत्री को भेंट कर इस उपलब्धि को प्रतीकात्मक रूप से चिह्नित किया।

क्यों महत्वपूर्ण है यह परियोजना?

जोन्नागिरी गोल्ड प्रोजेक्ट का महत्व भारत के स्वर्ण खनन इतिहास से समझा जा सकता है।वर्ष 2001 में कर्नाटक की प्रसिद्ध कोलार गोल्ड फील्ड्स (KGF) के बंद होने के बाद देश में केवल सरकारी स्वामित्व वाली हुट्टी गोल्ड माइंस ही संचालित रह गई थी। इसके बाद भारत अपनी बढ़ती मांग को पूरा करने के लिए बड़े पैमाने पर सोने का आयात करता रहा।

भारत हर वर्ष सोने के आयात पर अरबों डॉलर का विदेशी मुद्रा भंडार खर्च करता है। ऐसे समय में जब अंतरराष्ट्रीय बाजार में सोने की कीमतें रिकॉर्ड स्तर पर हैं, घरेलू उत्पादन बढ़ाने वाली यह परियोजना काफी अहम मानी जा रही है।हालांकि, इस खान से होने वाला उत्पादन फिलहाल भारत के आयात बिल में बहुत बड़ा बदलाव नहीं लाएगा, लेकिन यह देश की स्वर्ण खनन क्षमता बढ़ाने की दिशा में एक महत्वपूर्ण शुरुआत है।

परियोजना की प्रमुख विशेषताएं

जोन्नागिरी गोल्ड प्रोजेक्ट लगभग 600 हेक्टेयर क्षेत्र में फैला हुआ है, जिसमें कर्नूल जिले के तीन गांव शामिल हैं।इस परियोजना में कुल 405 करोड़ रुपये का निवेश किया गया है।खनन क्षेत्र में अब तक लगभग 13.1 टन प्रमाणित स्वर्ण भंडार की पुष्टि हो चुकी है। वहीं, जारी भू-वैज्ञानिक सर्वेक्षणों के अनुसार पूरे खनिज क्षेत्र में लगभग 42.5 टन तक सोने के भंडार होने की संभावना है।पूर्ण क्षमता पर पहुंचने के बाद यह खान अगले 15 वर्षों तक हर वर्ष लगभग एक टन परिष्कृत (Refined) सोने का उत्पादन करेगी।कंपनी के अनुसार यहां उत्पादित पूरा सोना सीधे आंध्र प्रदेश के ज्वैलर्स को उपलब्ध कराया जाएगा।

तमिलनाडु की कंपनी की अहम भूमिका

इस परियोजना का एक दिलचस्प पहलू यह भी है कि इसे विकसित करने वाली जियो मैसूर सर्विसेज इंडिया प्राइवेट लिमिटेड के प्रमुख निवेशकों में चेन्नई स्थित ट्रिवेणी अर्थमूवर्स एंड इंफ्रा प्राइवेट लिमिटेड शामिल है।खनन क्षेत्र में ट्रिवेणी कोई नई कंपनी नहीं है। कंपनी को कई दशकों का अनुभव है और वह दुनिया के पांच देशों में 12 प्रकार के खनिजों से जुड़े 70 से अधिक खनन प्रोजेक्ट्स का संचालन कर रही है।

भारत और विदेशों में मजबूत खनन नेटवर्क

भारत में ट्रिवेणी झारखंड के एनटीपीसी समर्थित पाकरी बरवाडीह कोयला ब्लॉक सहित कई कोयला खदानों का संचालन करती है। इसके अलावा कंपनी ओडिशा और क्योंझर में लौह अयस्क तथा मैंगनीज खनन में भी सक्रिय है।ओडिशा के कलिंगनगर स्थित ब्रह्मणी रिवर पेलेट्स परियोजना में कंपनी की भागीदारी है, जहां 230 किलोमीटर लंबी स्लरी पाइपलाइन संचालित की जाती है। यह इकाई टाटा स्टील, पोस्को, मित्सुबिशी और ग्लेनकोर जैसी वैश्विक कंपनियों को सेवाएं देती है।

भारत के बाहर ट्रिवेणी इंडोनेशिया के ईस्ट कालीमंतन और साउथ कालीमंतन में कोयला खनन करती है। इसके अलावा कंपनी ने डेमोक्रेटिक रिपब्लिक ऑफ कांगो में भी कई परियोजनाएं पूरी की हैं।जोन्नागिरी परियोजना के माध्यम से कंपनी ने अब सोने के खनन क्षेत्र में भी अपनी मजबूत उपस्थिति दर्ज करा दी है।

आंध्र प्रदेश के निवेश अभियान को मिलेगी मजबूती

मुख्यमंत्री चंद्रबाबू नायडू ने इस परियोजना को राज्य के विकास का 'स्वर्णिम अध्याय' बताया।उन्होंने कहा कि कर्नूल आने वाले वर्षों में खनन और औद्योगिक गतिविधियों का बड़ा केंद्र बन सकता है। यह परियोजना राज्य में निवेश आकर्षित करने की उनकी व्यापक रणनीति का भी हिस्सा है।परियोजना से स्थानीय स्तर पर रोजगार के नए अवसर भी पैदा हुए हैं। आसपास के क्षेत्रों की महिलाओं और युवाओं को आधुनिक सिम्युलेटर आधारित प्रशिक्षण देकर भारी खनन मशीनों के संचालन के लिए तैयार किया जा रहा है।

प्रतिस्पर्धा के बीच सहयोग का उदाहरण

जोन्नागिरी गोल्ड प्रोजेक्ट भारत के निवेश परिदृश्य की एक दिलचस्प तस्वीर भी पेश करता है।हाल के वर्षों में आंध्र प्रदेश को ऐसा राज्य माना गया है, जहां कई ऐसे निवेश पहुंचे जिन्हें कुछ विशेषज्ञ तमिलनाडु में जाने की संभावना मानते थे। लेकिन विडंबना यह है कि आंध्र प्रदेश की सबसे महत्वपूर्ण औद्योगिक परियोजनाओं में से एक को साकार करने में चेन्नई की कंपनी की निर्णायक भूमिका रही है।यह उदाहरण बताता है कि भले ही राज्य निवेश आकर्षित करने के लिए आपस में प्रतिस्पर्धा करें, लेकिन उद्योग, पूंजी और कारोबारी साझेदारियां अक्सर राजनीतिक और क्षेत्रीय सीमाओं से ऊपर उठकर काम करती हैं।

जोन्नागिरी गोल्ड प्रोजेक्ट केवल एक नई सोने की खान नहीं है, बल्कि यह भारत के खनन क्षेत्र में निजी निवेश, घरेलू स्वर्ण उत्पादन और औद्योगिक विकास की दिशा में एक महत्वपूर्ण उपलब्धि है।यदि भविष्य में देश में इसी तरह की और स्वर्ण परियोजनाएं विकसित होती हैं, तो भारत धीरे-धीरे सोने के आयात पर अपनी निर्भरता कम कर सकता है। साथ ही यह परियोजना रोजगार, निवेश और क्षेत्रीय आर्थिक विकास के नए अवसर भी पैदा करेगी।

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