
काबा-मदीना गाने वाली सायनी घोष भी बागियों की लिस्ट में शामिल, ममता बनर्जी की बढ़ी मुश्किलें
TMC के भीतर से आ रही खबरों के मुताबिक, सायनी घोष पिछले काफी समय से टीएमसी के शीर्ष नेतृत्व की कार्यप्रणाली से नाराज चल रही थीं। उनके करीबी सूत्रों का कहना है कि सायनी को लगने लगा था कि तृणमूल कांग्रेस के भीतर अब उनका कोई राजनीतिक भविष्य नहीं बचा है।
पश्चिम बंगाल की राजनीति और तृणमूल कांग्रेस (TMC) के आंतरिक इतिहास में बुधवार 10 जून 2026 का दिन सबसे बड़े राजनीतिक भूचाल के तौर पर याद किया जाएगा। पार्टी सुप्रीमो और मुख्यमंत्री ममता बनर्जी को एक के बाद एक मिल रहे तगड़े झटकों के बीच अब जादवपुर लोकसभा सीट से पार्टी की कद्दावर सांसद सायनी घोष ने भी बगावत का झंडा बुलंद कर दिया है। सूत्रों से मिली पक्की जानकारी के अनुसार, सायनी घोष ने टीएमसी के बागी धड़े की अगुवाई कर रही सांसद काकोली घोष दस्तिदार से संपर्क साधा है और औपचारिक रूप से इस अलग हुए (Breakaway) गुट को अपना समर्थन दे दिया है। सायनी ने बागी गुट का समर्थन करने वाले कानूनी और राजनीतिक दस्तावेजों पर अपने हस्ताक्षर भी कर दिए हैं।
यह घटनाक्रम ऐसे समय में सामने आया है जब ममता बनर्जी और पार्टी के राष्ट्रीय महासचिव अभिषेक बनर्जी अपने सांसदों और विधायकों को एकजुट रखने के लिए एंटी-डिफेक्शन लॉ (दल-बदल विरोधी कानून) की धमकियां दे रहे हैं। सायनी घोष का बागी खेमे में जाना इसलिए भी बेहद गंभीर है क्योंकि उन्हें हाल ही में तृणमूल कांग्रेस की महिला विंग (All India Trinamool Mahila Congress) का अध्यक्ष बनाया गया था। वह पार्टी का एक बेहद लोकप्रिय और युवा चेहरा मानी जाती रही हैं।
सायनी घोष की नाराजगी की असली वजह: "मुश्किल वक्त में पार्टी ने अकेला छोड़ा"
पार्टी के भीतर से आ रही खबरों के मुताबिक, सायनी घोष पिछले काफी समय से टीएमसी के शीर्ष नेतृत्व की कार्यप्रणाली से नाराज चल रही थीं। उनके करीबी सूत्रों का कहना है कि सायनी को लगने लगा था कि तृणमूल कांग्रेस के भीतर अब उनका कोई राजनीतिक भविष्य नहीं बचा है। उनकी सबसे बड़ी शिकायत यह थी कि पिछले चुनाव प्रचार के दौरान जब विपक्षी दलों और उपद्रवियों द्वारा उन पर तीखे हमले किए गए और उन्हें निशाना बनाया गया, तब टीएमसी के किसी भी बड़े नेता या संगठन ने उनके पक्ष में स्टैंड नहीं लिया।
सायनी ने अपने करीबियों से दर्द साझा करते हुए कहा कि उस बेहद कठिन और तनावपूर्ण दौर में उन्होंने खुद को पार्टी के भीतर बिल्कुल अलग-थलग और अकेला महसूस किया। इतना ही नहीं, संकट को सुलझाने या उनकी सुरक्षा बढ़ाने के बजाय पार्टी हाईकमान ने उन्हें अपना चुनाव प्रचार अभियान बीच में ही छोटा (Cut Short) करने का तुगलकी फरमान सुना दिया था। इसी अपमान और नजरअंदाजी ने सायनी को ममता बनर्जी के आधिकारिक खेमे से दूर कर दिया और उन्होंने काकोली दस्तिदार के बागी गुट में शामिल होने का मन बना लिया।
घंटों के भीतर लगा दूसरा बड़ा झटका
सायनी घोष की बगावत की खबर दिल्ली और कोलकाता के राजनीतिक कॉरिडोर्स में तब फैली, जब टीएमसी को लगे एक और घाव की स्याही अभी सूखी भी नहीं थी। बुधवार दोपहर ठीक 1 बजे, टीएमसी की वरिष्ठ राज्यसभा सांसद और पूर्व महिला कांग्रेस अध्यक्ष सुष्मिता देव ने संसद की सदस्यता और पार्टी से इस्तीफा दे दिया था। सुष्मिता देव ने उपराष्ट्रपति और राज्यसभा के सभापति सी पी राधाकृष्णन से मुलाकात कर अपना इस्तीफा सौंपा था।
देखा जाए तो पिछले एक हफ्ते के भीतर संसद से इस्तीफा देने वाली सुष्मिता देव दूसरी बड़ी सांसद हैं। उनसे पहले राज्यसभा सांसद सुखेंदु शेखर राय ने भी दिल्ली में ममता बनर्जी और अभिषेक बनर्जी की 'इंडिया' (INDIA) ब्लॉक की बैठक से ठीक पहले पार्टी के भीतर मचे अंधाधुंध भ्रष्टाचार का हवाला देते हुए इस्तीफा दे दिया था। बैक-टू-बैक हुए इन बड़े बदलावों ने राष्ट्रीय स्तर पर संदेश दे दिया है कि टीएमसी के संसदीय दल में ममता बनर्जी की पकड़ अब ढीली हो चुकी है।
काकोली घोष दस्तिदार का बागी गुट हुआ और शक्तिशाली
इस पूरी बगावत का केंद्र बिंदु सांसद काकोली घोष दस्तिदार बनी हुई हैं। दो दिन पहले यानी सोमवार को काकोली ने एक सनसनीखेज दावा किया था कि तृणमूल कांग्रेस के लगभग 20 लोकसभा और राज्यसभा सांसद उनके संपर्क में हैं और यह पूरा बागी गुट केंद्र की भारतीय जनता पार्टी (BJP) के नेतृत्व वाले राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन (NDA) को समर्थन देने की तैयारी कर रहा है।
शुरुआत में टीएमसी के आधिकारिक प्रवक्ताओं ने काकोली के इस दावे को हवा-हवाई और कोरी बकवास बताया था। लेकिन बुधवार को जिस तरह पहले सुष्मिता देव का इस्तीफा हुआ और उसके तुरंत बाद सायनी घोष ने काकोली दस्तिदार के गुट में जाकर दस्तावेजों पर साइन किए, उसने काकोली के '20 सांसदों' वाले दावे में दम पैदा कर दिया है। राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि टीएमसी के इस बागी गुट का दायरा इतनी तेजी से बढ़ रहा है कि यह बहुत जल्द दिल्ली में एक अलग गुट के तौर पर मान्यता की मांग कर सकता है, जिससे ममता बनर्जी की पार्टी संसद में पूरी तरह कमजोर हो जाएगी।
ममता बनर्जी के सामने वजूद बचाने का संकट
लगातार तीन बार पश्चिम बंगाल की सत्ता पर प्रचंड बहुमत से काबिज होने वाली ममता बनर्जी ने कभी नहीं सोचा होगा कि उनके तीसरे कार्यकाल के उत्तरार्ध में उनकी पार्टी इस कदर बिखर जाएगी। एक तरफ जहां पश्चिम बंगाल विधानसभा के भीतर ऋतब्रत बनर्जी 58 विधायकों के समर्थन का दावा करके नेता प्रतिपक्ष की कुर्सी मांग रहे हैं, वहीं दिल्ली के संसद भवन में काकोली दस्तिदार ने सांसदों की फौज खड़ी कर दी है।
भ्रष्टाचार के गंभीर आरोपों, प्रशासनिक विफलताओं और केंद्रीय एजेंसियों की लगातार हो रही जांच के बीच अपनों का यह साथ छोड़ना टीएमसी के अंत की शुरुआत माना जा रहा है। अब सबकी नजरें इस बात पर टिकी हैं कि क्या ममता बनर्जी इस बगावत को कुचलने के लिए कोई सख्त कदम उठाएंगी, या फिर सायनी घोष और सुष्मिता देव की तरह बाकी बचे बागी सांसद भी एक-एक करके इस डूबते जहाज से छलांग लगा देंगे।

