
कर्नाटक में येदियुरप्पा की विरासत पर संकट, क्या बदलेगा प्रदेश नेतृत्व?
कर्नाटक भाजपा में बीवाई विजयेंद्र के नेतृत्व पर सवाल उठ रहे हैं। गुटबाजी और संगठनात्मक चुनौतियों के बीच पार्टी बड़े नेतृत्व बदलाव पर विचार कर रही है।
कर्नाटक में भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) की राजनीति लंबे समय तक बीएस येदियुरप्पा के इर्द-गिर्द घूमती रही। उन्हें राज्य में भाजपा को जमीनी स्तर से खड़ा करने और दक्षिण भारत में पार्टी का पहला मजबूत आधार बनाने का श्रेय दिया जाता है। चार बार मुख्यमंत्री रहने के बाद भी उनकी राजनीतिक पकड़ और खासकर लिंगायत समुदाय में उनका प्रभाव बरकरार रहा।
इसी विरासत को आगे बढ़ाने के लिए भाजपा ने उनके बेटे बीवाई विजयेंद्र को कर्नाटक भाजपा का प्रदेश अध्यक्ष बनाया था। उम्मीद थी कि वे पार्टी को एकजुट रखेंगे और लिंगायत वोट बैंक को मजबूत बनाए रखेंगे। लेकिन अब राजनीतिक गलियारों में चर्चा है कि विजयेंद्र अपने पिता की विरासत को आगे बढ़ाने में सफल नहीं रहे हैं। पार्टी के भीतर बढ़ती गुटबाजी, अनुशासनहीनता और आंतरिक संघर्ष ने उनके नेतृत्व पर सवाल खड़े कर दिए हैं।
क्या नेतृत्व बदलने की तैयारी में भाजपा?
सूत्रों के अनुसार, भाजपा का केंद्रीय नेतृत्व अब कर्नाटक में संगठनात्मक बदलाव पर गंभीरता से विचार कर रहा है। पार्टी पिछले कुछ वर्षों से किसी एक नेता के करिश्मे के बजाय मजबूत संगठन पर जोर दे रही है।2023 के विधानसभा चुनाव में हार के बाद केंद्रीय नेतृत्व ने विजयेंद्र को संगठन मजबूत करने और पार्टी को फिर से एकजुट करने के लिए पर्याप्त समय दिया था। लेकिन तीन साल बाद भी आंतरिक मतभेद कम नहीं हुए हैं, जिससे शीर्ष नेतृत्व निराश बताया जा रहा है।राजनीतिक हलकों में यह चर्चा भी तेज है कि क्या भाजपा का केंद्रीय नेतृत्व विजयेंद्र से भरोसा खो चुका है और क्या अब पार्टी येदियुरप्पा युग से आगे बढ़ने की तैयारी कर रही है।
विजयेंद्र के सामने बढ़ती चुनौतियां
विजयेंद्र को प्रदेश अध्यक्ष बनाए जाने के पीछे दो बड़े उद्देश्य थे—पहला, येदियुरप्पा की राजनीतिक विरासत को आगे बढ़ाना और दूसरा, भाजपा के मजबूत लिंगायत वोट बैंक को बनाए रखना।हालांकि उनके कार्यकाल में पार्टी लगातार आंतरिक विवादों से जूझती रही। सबसे बड़ा विवाद विधायक बसनगौड़ा पाटिल यतनाल के साथ सामने आया, जिन्होंने खुले तौर पर येदियुरप्पा परिवार और प्रदेश नेतृत्व की आलोचना की। पार्टी ने बाद में यतनाल के खिलाफ अनुशासनात्मक कार्रवाई की, लेकिन अंदरूनी कलह पूरी तरह समाप्त नहीं हुई।
विधान परिषद चुनाव ने बढ़ाई मुश्किलें
हालिया विधान परिषद चुनाव में भाजपा विधायकों की क्रॉस वोटिंग ने पार्टी नेतृत्व की मुश्किलें और बढ़ा दीं। इस घटना ने प्रदेश अध्यक्ष विजयेंद्र और विधानसभा में नेता प्रतिपक्ष आर. अशोक की नेतृत्व क्षमता पर सवाल खड़े कर दिए।पार्टी के भीतर यह भी माना जा रहा है कि कांग्रेस सरकार के खिलाफ MUDA भूमि आवंटन मामला और वाल्मीकि निगम घोटाले जैसे मुद्दों पर भाजपा अपेक्षित राजनीतिक माहौल बनाने में असफल रही। हालांकि पार्टी ने विरोध प्रदर्शन और पदयात्रा भी आयोजित की, लेकिन उसका राजनीतिक लाभ सीमित रहा।बताया जाता है कि इसके बाद केंद्रीय नेतृत्व ने विजयेंद्र और आर. अशोक दोनों को दिल्ली बुलाकर पार्टी के प्रदर्शन की समीक्षा की।
येदियुरप्पा का नेतृत्व क्यों था अलग?
पूर्व मुख्यमंत्री और पूर्व केंद्रीय मंत्री डीवी सदानंद गौड़ा का मानना है कि येदियुरप्पा की सबसे बड़ी ताकत संगठन को साथ लेकर चलना था।उन्होंने कहा कि येदियुरप्पा अनुशासन के मामले में सख्त जरूर थे, लेकिन कार्यकर्ताओं से व्यक्तिगत संबंध बनाए रखते थे और नाराजगी के बाद भी संवाद कायम रखते थे। उनके अनुसार, मौजूदा नेतृत्व कार्यकर्ताओं के बीच वैसा भरोसा कायम करने में सफल नहीं दिख रहा है।
प्रदेश अध्यक्ष और नेता प्रतिपक्ष दोनों बदल सकते हैं
भाजपा के एक वरिष्ठ नेता के अनुसार, पार्टी सिर्फ प्रदेश अध्यक्ष ही नहीं, बल्कि विधानसभा में नेता प्रतिपक्ष के पद पर भी बदलाव पर विचार कर रही है।2028 के विधानसभा चुनाव को ध्यान में रखते हुए संगठन में नए चेहरों को आगे लाने की रणनीति बनाई जा रही है।
लिंगायत समीकरण सबसे बड़ी चुनौती
हालांकि नेतृत्व परिवर्तन भाजपा के लिए आसान फैसला नहीं होगा। कर्नाटक में लिंगायत समुदाय लंबे समय से भाजपा का सबसे मजबूत सामाजिक आधार रहा है और इसका बड़ा श्रेय येदियुरप्पा को जाता है।इसी कारण पार्टी नेतृत्व परिवर्तन के दौरान लिंगायत समुदाय को नाराज नहीं करना चाहता।राजनीतिक चर्चाओं में यह भी कहा जा रहा है कि यदि राज्य संगठन में बदलाव होता है तो संतुलन बनाए रखने के लिए येदियुरप्पा परिवार को राष्ट्रीय स्तर पर बड़ी जिम्मेदारी दी जा सकती है।
ऐसी अटकलें हैं कि सांसद बीवाई राघवेंद्र को अगले केंद्रीय मंत्रिमंडल विस्तार में मौका मिल सकता है। हालांकि भाजपा ने इस संबंध में कोई आधिकारिक पुष्टि नहीं की है।
नए चेहरों पर मंथन
प्रदेश भाजपा अध्यक्ष पद के लिए केंद्रीय मंत्री शोभा करंदलाजे का नाम प्रमुखता से लिया जा रहा है। वे राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (RSS) की पृष्ठभूमि से आती हैं, वोक्कालिगा समुदाय से हैं और येदियुरप्पा के करीबी मानी जाती हैं।इसके अलावा केंद्रीय मंत्री वी. सोमन्ना का नाम भी चर्चा में है। यदि लिंगायत समीकरण को साधना जरूरी हुआ तो उन्हें दिल्ली से वापस राज्य की राजनीति में लाया जा सकता है।
वी. सोमन्ना लिंगायत समुदाय के प्रभावशाली नेता हैं और राज्य के कई मठों एवं धार्मिक नेताओं से उनके अच्छे संबंध हैं। साथ ही भाजपा के केंद्रीय नेतृत्व और जनता दल (सेक्युलर) दोनों के साथ उनकी बेहतर समझ मानी जाती है।इनके अलावा महेश तेंगिनकाई और अरविंद बेल्लद के नाम भी संभावित दावेदारों में शामिल बताए जा रहे हैं।
नेता प्रतिपक्ष की दौड़ में भी कई नाम
विधानसभा में नेता प्रतिपक्ष के पद के लिए भी कई नेताओं के नाम चर्चा में हैं।इनमें वरिष्ठ नेता डॉ. सी.एन. अश्वथ नारायण, जो वोक्कालिगा समुदाय से आते हैं, और वी. सुनील कुमार, जिन्हें भाजपा का प्रमुख ओबीसी चेहरा माना जाता है, प्रमुख दावेदार बताए जा रहे हैं।
क्या संगठनात्मक सुधार का समय आ गया है?
भाजपा के वरिष्ठ नेता और विधायक बी. सुरेश गौड़ा का कहना है कि केंद्रीय नेतृत्व जल्द ही संगठन को लेकर बड़े फैसले ले सकता है।उनके अनुसार, पार्टी ने राज्य नेतृत्व को आंतरिक विवाद सुलझाने के लिए पर्याप्त समय दिया, लेकिन अब संगठनात्मक सुधार की प्रक्रिया शुरू हो सकती है।उन्होंने यह भी माना कि भाजपा की अंदरूनी गुटबाजी का सबसे अधिक राजनीतिक फायदा कांग्रेस को मिला है।
सुरेश गौड़ा ने भरोसा जताया कि संगठन में बदलाव के बाद भाजपा और जनता दल (सेक्युलर) का गठबंधन 2028 के विधानसभा चुनाव में 175 सीटें जीतने का लक्ष्य लेकर मैदान में उतरेगा।उन्होंने कहा, "मौजूदा नेतृत्व का हनीमून पीरियड खत्म हो चुका है और अगले दो महीनों में पार्टी बड़े फैसले ले सकती है।"
कर्नाटक भाजपा ऐसे दौर से गुजर रही है जहां पार्टी को यह तय करना है कि वह भविष्य में किसी एक परिवार या नेता के प्रभाव पर आगे बढ़ेगी या फिर मजबूत संगठनात्मक ढांचे के सहारे नई राजनीतिक रणनीति तैयार करेगी।

