
कश्मीर में 31 वर्षीय युवक की मौत से फिर उठा 'फर्जी मुठभेड़' का जिन्न
जब 31 वर्षीय राशिद अहमद मुगल 31 मार्च की सुबह कश्मीर के गांदरबल जिले के चुंट वालीवार गांव स्थित अपने घर से निकले थे, तब उनके भाई एजाज अहमद मुगल को इस बात का...
गांदरबल के निवासी राशिद अहमद मुगल 31 मार्च को सुरक्षा बलों के साथ एक मुठभेड़ में मारे गए और उन्हें 'आतंकवादी' करार दिया गया। हालांकि, परिवार का दावा है कि कॉमर्स में पोस्ट ग्रेजुएट यह युवक एक नागरिक था, जो स्थानीय लोगों के सरकारी दस्तावेज तैयार करने में मदद कर अपनी आजीविका कमाता था। यह मुद्दा अब राजनीतिक तूल पकड़ चुका है और जम्मू-कश्मीर के गृह विभाग ने इस मामले में जांच के आदेश दे दिए हैं।
जब 31 वर्षीय राशिद अहमद मुगल 31 मार्च की सुबह कश्मीर के गांदरबल जिले के चुंट वालीवार गांव स्थित अपने घर से निकले थे, तब उनके भाई एजाज अहमद मुगल को इस बात का जरा भी अंदाजा नहीं था कि वे उन्हें आखिरी बार देख रहे हैं। लेकिन नियति को यही मंजूर था और वह मुलाकात अंतिम साबित हुई।
'द फेडरल' से बातचीत के दौरान 34 वर्षीय मजदूर एजाज उस दिन को याद करते हुए बताते हैं कि दिन की शुरुआत बेहद सामान्य तरीके से हुई थी। एजाज कहते हैं, "राशिद सुबह करीब 9:30 बजे काम के लिए घर से निकले थे। यह उनकी रोज की दिनचर्या थी।" उन्होंने आगे बताया कि राशिद लोगों की सरकारी कागजी कार्रवाई में मदद किया करते थे। परिवार के अनुसार, कॉमर्स में स्नातकोत्तर (Postgraduate) राशिद लोगों के नौकरी के आवेदन फॉर्म भरने, आधार कार्ड बनवाने और अधिवास प्रमाण पत्र (Domicile Certificates) आदि व्यवस्थित करने में मदद करते थे, जिससे वे महीने में लगभग 3,000 रुपये कमा लेते थे।
लेकिन, उस दिन शाम को वह घर वापस नहीं लौटे।
एजाज बताते हैं कि शुरुआत में परिवार, जिसमें वे स्वयं, उनकी पत्नी और उनका बेटा शामिल हैं, ज्यादा घबराया नहीं था। उन्होंने राशिद को फोन करने की कोशिश की। लेकिन उनका मोबाइल फोन स्विच ऑफ आ रहा था। परिवार को उस वक्त भी इसमें कुछ असामान्य नहीं लगा। एजाज का दावा है, "उनका फोन पुराना था और अक्सर काम नहीं करता था। हमने मान लिया था कि वह अगली सुबह तक लौट आएंगे।"
हालांकि, अगली सुबह एक ऐसा संदेश लेकर आई, जिसने पूरे परिवार को झकझोर कर रख दिया। परिवार का कहना है कि इसके बाद जो कुछ भी हुआ, वे आज भी उससे उबरने और उसे स्वीकार करने की कोशिश कर रहे हैं। इस घटना ने कश्मीर में कथित फर्जी मुठभेड़ों और न्यायेतर हत्याओं (Extrajudicial Killings) के संवेदनशील मुद्दे को एक बार फिर गरमा दिया है।
एजाज का कहना है कि 1 अप्रैल की सुबह उन्हें स्थानीय पुलिस स्टेशन से एक फोन आया, जिसमें उन्हें सूचित किया गया कि राशिद का एक्सीडेंट हो गया है और उन्हें तुरंत थाने आने के लिए कहा गया। हालांकि, उनका दावा है कि जब वे वहां पहुंचे, तो उनसे उनके भाई के शव की पहचान करने के लिए कहा गया। एजाज दावा करते हैं, "पुलिस मुझे गांदरबल से श्रीनगर स्थित पुलिस कंट्रोल रूम (PCR) ले गई।"
वह आगे आरोप लगाते हुए कहते हैं: “जब मैंने उसे [राशिद के शव को] दूर से देखा, तो मैं उसे पहचान नहीं सका। उसके चेहरे पर गोलियों के निशान थे। ऐसा लग रहा था कि उस पर कई राउंड फायरिंग की गई थी, जिससे उसकी खोपड़ी का आधा हिस्सा चकनाचूर हो गया था और उसका एक हाथ बुरी तरह क्षतिग्रस्त था; हाथ की दो उंगलियां गायब थीं। जब मैं और करीब गया, तब जाकर मैं उसे अपने भाई के रूप में पहचान सका।”
राशिद अहमद मुगल की फाइल फोटो। (विशेष व्यवस्था के तहत)
एजाज के अनुसार, जब उन्होंने अधिकारियों से यह जानकारी मांगी कि उनके भाई की हत्या कैसे हुई तो उन्होंने किसी भी तरह की जानकारी होने से इनकार कर दिया। शव की पहचान होने के बाद, एजाज का दावा है कि उनसे उस पुलिस टीम के साथ चलने को कहा गया जो शव को दफनाने के लिए गांदरबल से लगभग 90 किलोमीटर दूर उत्तरी कश्मीर के कुपवाड़ा जिले में ले जा रही थी।
वे दावा करते हैं, "उनके शव को 1 अप्रैल को वहां ले जाया गया और स्थानीय निवासियों द्वारा दफनाया गया। कफन के इंतजाम से लेकर दफनाने तक, सब कुछ उसी इलाके के लोगों द्वारा किया गया था।"
शव को दफनाने के लिए परिवार को न सौंपा जाना एजाज के लिए एक चेतावनी होनी चाहिए थी कि मामला वैसा नहीं है, जैसा दिख रहा है। लेकिन शायद शोक और दुख ने उनकी संवेदनाओं को सुन्न कर दिया था।
विशेष रूप से 2019 में अनुच्छेद 370 के निरस्त होने, जिसने जम्मू-कश्मीर को कुछ विशेष शक्तियां प्रदान की थीं। और तत्कालीन राज्य को जम्मू-कश्मीर और लद्दाख नामक दो केंद्र शासित प्रदेशों में विभाजित किए जाने के बाद से, सुरक्षा बलों के लिए संदिग्ध या कथित आतंकवादियों के शवों को उनके परिवारों को न सौंपना और उन्हें घर से दूर सुदूर स्थानों पर दफनाना कोई असामान्य बात नहीं रही है। कथित तौर पर ऐसा इसलिए किया जाता है। ताकि अंतिम संस्कार में भारी भीड़ जमा न हो सके, जिससे पीड़ित होने की भावना पैदा हो सकती है। और अन्य लोग उग्रवाद की ओर आकर्षित हो सकते हैं।
फिर भी, एजाज कहते हैं कि अगले दिन 2 अप्रैल की सुबह तक उन्हें यह पता नहीं चला था कि सेना ने गांदरबल के अराहामा में एक मुठभेड़ में एक आतंकवादी को मारने का दावा किया है। और वह कथित आतंकवादी उनका भाई राशिद था।
एजाज जोर देते हुए कहते हैं, “लेकिन मेरा भाई आतंकवादी नहीं था; वह एक आम नागरिक था।” वे आगे अपनी बात जोड़ते हुए कहते हैं “जब राशिद घर से निकला था। तो उसने 'खान ड्रेस' (एक पारंपरिक पोशाक जिसे पठानी सूट भी कहा जाता है) पहनी हुई थी। लेकिन जब उन्होंने मुझे उसका शव दिखाया तो उसने पतलून, एक फेरन और सेना के जूते पहने हुए थे।”
राशिद के माता-पिता अब इस दुनिया में नहीं हैं, लेकिन परिवार के बाकी सदस्यों, उसके भाई-बहनों और अन्य रिश्तेदारों के लिए 31 वर्षीय युवक को खोने का दुख उसकी मौत के आसपास की परिस्थितियों के कारण और भी गहरा हो गया है।
मृतक के चाचा, 70 वर्षीय गुलाम रसूल, राशिद को एक "सामाजिक कार्यकर्ता" के रूप में वर्णित करते हैं। वे बताते हैं कि वह इलाके में लोगों के आधिकारिक दस्तावेज तैयार करने में मदद करने के लिए काफी लोकप्रिय थे।
रसूल जिद करते हुए कहते हैं, “हर कोई उसे जानता था। उसके घर में वे दस्तावेज मौजूद हैं जो उसके काम का प्रमाण हैं। आप उसके बैंक रिकॉर्ड और उसके काम की जांच करें। सब कुछ वहां मिल जाएगा। उसके खिलाफ कभी कोई पुलिस केस दर्ज नहीं हुआ था और वह कभी जेल भी नहीं गया था।”
वे आगे सवाल उठाते हैं: “अगर वह आतंकवादी था तो हमें कभी बताया क्यों नहीं गया? कोई केस या कोई नोटिस क्यों नहीं दिया गया?” एजाज के मुताबिक, परिवार ने इस मामले में एफआईआर (FIR) दर्ज कराई है। लेकिन अभी तक उन्हें कोई ठोस जानकारी नहीं मिली है। वे कहते हैं, “हमें सिर्फ इतना बताया गया है कि कानूनी प्रक्रिया चल रही है।”
सेना का पक्ष
दूसरी ओर, सेना ने दावा किया है कि जिस ऑपरेशन में राशिद मारा गया, वह इलाके में आतंकवादियों की मौजूदगी के बारे में मिली "विशिष्ट खुफिया जानकारी" के आधार पर शुरू किया गया था। सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म 'X' पर एक पोस्ट में, सेना की श्रीनगर स्थित 'चिनार कॉर्प्स' ने कहा: “31 मार्च 2026 की रात को, रुक-रुक कर हो रही गोलीबारी के बीच घेराबंदी (cordon) को रणनीतिक रूप से पुनर्गठित किया गया था। हमारे सैनिकों ने नपी-तुली प्रतिक्रिया के साथ प्रभावी जवाबी कार्रवाई की, जिसके परिणामस्वरूप एक आतंकवादी मारा गया।”
एक अन्य पोस्ट में सेना ने जानकारी दी: “विशिष्ट खुफिया इनपुट के आधार पर, #IndianArmy और @JmuKmrPolice द्वारा गांदरबल के अराहामा क्षेत्र में एक संयुक्त तलाशी अभियान शुरू किया गया था। तलाशी के दौरान सतर्क सैनिकों ने संदिग्ध गतिविधि देखी। चुनौती दिए जाने पर आतंकवादियों ने गोलीबारी शुरू कर दी और हमारे सैनिकों ने जवाबी कार्रवाई की।”
मुठभेड़ स्थल से एक एके-56 (AK-56) राइफल, कारतूस के तीन मैगजीन, 67 जिंदा कारतूस और एके राइफल के 58 खाली खोखे बरामद करने का दावा करते हुए सेना ने यह भी कहा कि 31 मार्च की मुठभेड़ में मारे गए "आतंकवादी" की पहचान बाद में गांदरबल निवासी राशिद अहमद मुगल के रूप में हुई।
हालांकि, जम्मू-कश्मीर के लिए फर्जी मुठभेड़ों (Staged Encounters) और न्यायेतर हत्याओं (Extrajudicial Killings) के आरोप कोई नई बात नहीं हैं। अतीत में भी ऐसे कई मामले सामने आए हैं जिन्होंने सुरक्षा बलों की कार्यप्रणाली पर सवाल खड़े किए हैं:
पथरीबल मामला: साल 2000 में चित्तीसिंहपुरा में 35 सिखों के भीषण नरसंहार के बाद, पथरीबल में पांच लोगों को मार गिराया गया था और कथित तौर पर उन्हें "विदेशी आतंकवादी" करार दिया गया था। साल 2014 के एक प्रेस सूचना ब्यूरो (PIB) के बयान में जानकारी दी गई थी कि "सीबीआई ने 9 मई 2006 को मुख्य न्यायिक मजिस्ट्रेट (CJM) सह विशेष मजिस्ट्रेट सीबीआई, श्रीनगर की अदालत में पथरीबल मामले में एक चालान पेश किया था, जिसमें इन हत्याओं के लिए सेना के 5 कर्मियों को आरोपी बनाया गया था।" हालांकि, बाद में सेना ने इस मामले को अपने हाथ में ले लिया और "साक्ष्यों के सारांश (Summary of Evidence) में मौजूद सबूतों की जांच के बाद, इन 5 सैन्य कर्मियों के खिलाफ प्रथम दृष्टया मामला स्थापित नहीं हो सका और इसलिए सेना द्वारा इस मामले को बंद कर दिया गया।"
माछिल मामला: साल 2010 में माछिल में एक "फर्जी मुठभेड़" में तीन लोग मारे गए थे। इस मामले में एक दुर्लभ घटनाक्रम देखने को मिला था, जहाँ जनरल कोर्ट मार्शल द्वारा सेना के पांच कर्मियों को दोषी ठहराया गया था। हालांकि, साल 2017 में एक सैन्य अदालत ने उन्हें सुनाई गई उम्रकैद की सजा को निलंबित कर दिया।
श्रीनगर में निगरानी रखते सुरक्षा अधिकारी। (फाइल फोटो)
माछिल मुठभेड़ में मारे गए तीन युवकों में से एक, मोहम्मद शफी लोन के पिता, 55 वर्षीय किसान अब्दुल राशिद लोन ने 'द फेडरल' से बात करते हुए अपना दर्द साझा किया। उन्होंने कहा, "मेरे बेटे के साथ जो हुआ, उसने हमारे पूरे जीवन को तबाह कर दिया। हमें बताया गया कि वह एक आतंकवादी था, लेकिन हम जानते थे कि वह कौन था, सपनों से भरा एक साधारण लड़का। उस सच्चाई को उससे छीन लिया गया।" मौत के वक्त शफी की उम्र महज 19 साल थी।
यह कहते हुए कि ऐसी घटनाएं एक पैटर्न का हिस्सा बन गई हैं, जो जम्मू-कश्मीर में वर्षों से जारी है। लोन आरोप लगाते हैं, "आज यह एक परिवार के साथ हुआ है, कल किसी और के साथ होगा। हमने ऐसा बार-बार होते देखा है। अगर निर्दोष लोगों को मारकर उन्हें आतंकवादी कहा जा सकता है तो एक आम आदमी न्याय के लिए कहां जाए?"
लोन आगे कहते हैं कि पिछले मामलों में जांच और न्याय के वादों के बावजूद, जवाबदेही बेहद सीमित रही है, जिससे परिवारों में अन्याय की गहरी भावना पैदा हो गई है। उन्होंने कहा, "जब तक जिम्मेदार लोगों को वास्तविक और दृश्यमान तरीके से जवाबदेह नहीं ठहराया जाता, तब तक ऐसी घटनाएं होती रहेंगी और कोई भी परिवार सुरक्षित महसूस नहीं करेगा।"
मानवाधिकार संगठनों की चिंताएं
पिछले कुछ वर्षों में, मानवाधिकार संगठनों ने बार-बार ऐसी चिंताएं उठाई हैं। अंतरराष्ट्रीय संगठन 'ह्यूमन राइट्स वॉच' ने अपनी 'वर्ल्ड रिपोर्ट 2026' में कहा है कि इस क्षेत्र में "पूरे साल सुरक्षा बलों के खिलाफ मनमानी हिरासत, प्रताड़ना और न्यायेतर हत्याओं (extrajudicial killings) के आरोप लगते रहे।" रिपोर्ट में जवाबदेही को लेकर भी गंभीर सवाल उठाए गए हैं और बताया गया है कि सशस्त्र बल (विशेषाधिकार) अधिनियम (AFSPA) जैसे कानूनी ढांचे जम्मू-कश्मीर में अभी भी लागू हैं, जो सुरक्षा बलों को अभियोजन से सुरक्षा प्रदान करते हैं। यहां तक कि उन मामलों में भी जहां मानवाधिकारों के गंभीर उल्लंघन के आरोप होते हैं।
कानूनी विशेषज्ञों की राय
कश्मीरी राजनीतिक विश्लेषक और मानवाधिकार एवं अंतरराष्ट्रीय कानून के विद्वान, शेख शौकत हुसैन ने 'द फेडरल' को बताया, "नागरिकों का जीवन और स्वतंत्रता तब तक असुरक्षित रहेगी, जब तक उनकी सुरक्षा के लिए तैनात लोग असाधारण कानूनों के तहत दण्डमुक्ति (impunity) के साथ काम करते रहेंगे। शांति और सामान्य स्थिति के दावे तब तक विरोधाभासी प्रतीत होते हैं, जब तक ऐसे कानूनी ढांचे लागू रहते हैं। ऐसे कानून उन लोगों के लिए भी बाधा बनते हैं, जिन्हें जांच और पूछताछ का काम सौंपा जाता है।"
उनकी इस चिंता से जम्मू-कश्मीर और लद्दाख उच्च न्यायालय के वकील यावर रमजान भी इत्तेफाक रखते हैं। उन्होंने जोर देकर कहा कि न्यायेतर हत्याएं "कानून के शासन (Rule of Law) की मूल भावना के खिलाफ हैं और संविधान के अनुच्छेद 21 के तहत गारंटीकृत व्यक्ति के जीवन के अधिकार के साथ समझौता करती हैं।" रमजान ने कहा कि जीवन से वंचित करने की किसी भी प्रक्रिया में स्थापित आपराधिक कानून प्रक्रियाओं का पालन किया जाना चाहिए, जिसमें जांच, सुनवाई (ट्रायल) और आरोपी को अपनी बात रखने का अवसर मिलना अनिवार्य है।
उच्चतम न्यायालय के 'पीपुल्स यूनियन फॉर सिविल लिबर्टीज (PUCL) बनाम महाराष्ट्र राज्य' (2014) के फैसले का हवाला देते हुए, एडवोकेट रमजान ने उल्लेख किया कि शीर्ष अदालत ने मुठभेड़ में हुई मौतों की स्वतंत्र जांच के लिए स्पष्ट दिशानिर्देश निर्धारित किए हैं। और मजिस्ट्रेट जांच को अनिवार्य बनाया है। उन्होंने जोर देकर कहा कि न्याय के हित में ऐसे मामलों की जांच स्वतंत्र एजेंसियों द्वारा की जानी चाहिए और जवाबदेही सुनिश्चित करने के लिए निष्कर्षों को सार्वजनिक किया जाना चाहिए।
पिछले कुछ वर्षों में, कथित न्यायेतर हत्याओं का मुद्दा कश्मीर में दलीय राजनीति से ऊपर उठकर राजनीतिक ध्यान का केंद्र बना रहा है।
पीपुल्स डेमोक्रेटिक पार्टी (PDP) के वरिष्ठ नेता और पुलवामा से विधायक वहीद उर रहमान पारा का दावा है, "गांदरबल मुठभेड़ को जम्मू-कश्मीर में विवादित मुठभेड़ों और कथित न्यायेतर हत्याओं के लंबे और परेशान करने वाले इतिहास के परिप्रेक्ष्य में देखा जाना चाहिए। सशस्त्र बल (विशेषाधिकार) अधिनियम जैसे कानून सुरक्षा बलों के लिए उन्मुक्ति (Immunity) और दण्डमुक्ति (Impunity) का स्रोत बन गए हैं। जब तक ये कानूनी सुरक्षा कवच प्रभावी रहेंगे, ऐसी घटनाओं के जारी रहने की संभावना बनी रहेगी।"
पारा आगे कहते हैं कि पीडीपी का हमेशा से यह रुख रहा है कि इन कानूनी सुरक्षा उपायों की समीक्षा किए बिना और पारदर्शी, समयबद्ध जांच सुनिश्चित किए बिना जनता का विश्वास बहाल नहीं किया जा सकता। राशिद की मौत के बाद जम्मू-कश्मीर विधानसभा में भी भारी हंगामा देखने को मिला, जहाँ नेशनल कॉन्फ्रेंस, कांग्रेस और पीडीपी के सदस्यों ने मामले की न्यायिक जांच की मांग की।
सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म 'X' पर मुख्यमंत्री उमर अब्दुल्ला ने अपनी प्रतिक्रिया देते हुए कहा, "मेरा मानना है कि परिवार के दावे को बिना सोचे-समझे खारिज नहीं किया जाना चाहिए। कम से कम इस मुठभेड़ की एक पारदर्शी और समयबद्ध जांच होनी चाहिए और तथ्यों को सार्वजनिक किया जाना चाहिए। जांच की घोषणा में देरी या मामले को उलझाने का कोई भी प्रयास केवल विश्वसनीयता को नुकसान पहुंचाएगा, जो किसी के हित में नहीं है।"
इन मांगों और दबाव के बीच, जम्मू-कश्मीर गृह विभाग ने 2 अप्रैल को जिला मजिस्ट्रेट को लिखे एक पत्र में इस मुठभेड़ की मजिस्ट्रेट जांच के आदेश दिए। पत्र में कहा गया है कि "इस मुद्दे की समीक्षा की गई है और तदनुसार, आपसे अनुरोध है कि राशिद अहमद मुगल की मृत्यु के कारणों और परिस्थितियों का पता लगाने के लिए मामले की गहन और निष्पक्ष मजिस्ट्रेट जांच कराई जाए।"
आधिकारिक संचार में यह भी स्पष्ट किया गया है कि "जांच सात (07) दिनों की अवधि के भीतर पूरी की जानी चाहिए और इसकी रिपोर्ट गृह विभाग को सौंपी जानी चाहिए।"
'द फेडरल' ने इस मामले में 'फर्जी मुठभेड़' और 'न्यायेतर हत्याओं' के आरोपों पर प्रतिक्रिया जानने के लिए गांदरबल के वरिष्ठ पुलिस अधीक्षक (SSP) और श्रीनगर स्थित जनसंपर्क अधिकारी (रक्षा) के कार्यालयों से संपर्क किया है। जैसे ही उनकी प्रतिक्रिया प्राप्त होगी, इस लेख को अपडेट किया जाएगा।
इसी बीच, राजनीतिक हलचल से दूर, मुगल परिवार के आवास पर जमा हुए स्थानीय लोगों में राशिद की अचानक हुई मौत को लेकर गुस्सा और डर दोनों साफ दिखाई दे रहा है। नाम न छापने की शर्त पर एक स्थानीय निवासी ने सवाल उठाया, "अगर एक शिक्षित युवक, एक पोस्ट ग्रेजुएट को मारा जा सकता है और उसे आतंकवादी करार दिया जा सकता है, तो फिर हम जैसों का क्या होगा? आम लोगों के पास क्या सुरक्षा है?"
चुंट वालीवार गांव के ही एक अन्य निवासी ने इस बात का समर्थन करते हुए कहा, "आज वह था, कल कोई और भी हो सकता है।"
अब परिवार की एकमात्र मांग यह है कि राशिद का शव उन्हें सौंप दिया जाए, ताकि वे उसे अपने ही गांव में दफना सकें। परिवार के एक सदस्य ने नाम न जाहिर करने की शर्त पर कहा, "हमें नहीं पता कि क्या जिम्मेदार लोगों को कभी सजा मिलेगी या नहीं, लेकिन कम से कम हमें उसका शव तो वापस दे दो।"
संयोग से, राशिद की मौत इस परिवार में हुई पहली अप्राकृतिक मृत्यु नहीं है। उनके एक अन्य भाई, इशफाक अहमद मुगल की साल 2000 में 23 साल की उम्र में कथित तौर पर अज्ञात बंदूकधारियों ने हत्या कर दी थी। एजाज उन यादों को ताजा करते हुए बताते हैं, “दरवाजे पर दस्तक हुई थी। जब हमने दरवाजा खोला, तो उसे बाहर ले जाया गया और गोली मार दी गई। हमें नहीं पता कि उसका शव कहां ले जाया गया। हमें कुछ भी वापस नहीं मिला। आज भी हमें नहीं पता कि उसे कहां दफनाया गया था।”
मृतक के चाचा रसूल कहते हैं कि चार भाई-बहनों में से अब केवल दो ही जीवित बचे हैं।
राशिद को याद करते हुए उनके चाचा ने फिर दोहराया “वह आतंकवादी नहीं था। वह एक सीधा-साधा और मेहनती लड़का था। वह कंप्यूटर पर बैठता था और लोगों की मदद करता था। यही उसका काम था। इलाके में हर कोई उसे जानता था। उसकी जिंदगी सबके सामने थी। उसके बारे में कुछ भी छिपा हुआ नहीं था। उसकी मौत के बाद उसे आतंकवादी कहना, हम कभी स्वीकार नहीं कर सकते।”

