
5 लाख करोड़ से ज्यादा कर्ज में डूबा केरल! रिपोर्ट पर छिड़ी राजनीतिक जंग
केरल की वित्तीय स्थिति पर आई रिपोर्ट में बढ़ते कर्ज और आर्थिक दबाव की तस्वीर सामने आई है। विपक्ष ने रिपोर्ट की वैधता और प्रक्रिया पर सवाल उठाए हैं।
केरल की वित्तीय स्थिति पर जारी विस्तृत स्टेटस रिपोर्ट ने राज्य की राजनीति में नया विवाद खड़ा कर दिया है। रिपोर्ट में राज्य की आर्थिक हालत को चिंताजनक बताया गया है, वहीं विपक्ष ने रिपोर्ट की वैधता और इसे तैयार करने की प्रक्रिया पर सवाल उठाए हैं।विधानसभा में इस रिपोर्ट को लेकर राजनीतिक बहस शुरू होने से पहले ही इसकी सिफारिशों ने चर्चा का केंद्र बना लिया था। रिपोर्ट केवल केरल की वित्तीय चुनौतियों का आकलन नहीं करती, बल्कि आर्थिक सुधारों के ऐसे सुझाव भी देती है जो लागू होने पर राज्य की आर्थिक नीतियों में बड़ा बदलाव ला सकते हैं।
खर्चों में कटौती और संरचनात्मक सुधारों की सिफारिश
रिपोर्ट में सरकार के खर्चों की समीक्षा करने और वित्तीय बोझ कम करने की आवश्यकता पर जोर दिया गया है। इसके तहत कर्मचारियों की सेवानिवृत्ति आयु की समीक्षा, वेतन और पेंशन पर होने वाले दीर्घकालिक खर्च को नियंत्रित करने जैसे उपाय सुझाए गए हैं।रिपोर्ट में सार्वजनिक क्षेत्र के उपक्रमों (पीएसयू) की स्थिति पर भी चिंता जताई गई है। इसमें लगातार घाटे में चल रही गैर-रणनीतिक इकाइयों को बंद करने, उनका पुनर्गठन करने या विनिवेश (डिसइन्वेस्टमेंट) करने की सिफारिश की गई है, जबकि आवश्यक सेवाओं को सुरक्षित रखने की बात कही गई है।
सिविल सप्लाई और बेवरेज कॉरपोरेशन के विलय का सुझाव
रिपोर्ट का एक महत्वपूर्ण प्रस्ताव केरल स्टेट सिविल सप्लाईज कॉरपोरेशन को लाभ कमाने वाले बेवरेज कॉरपोरेशन के साथ विलय करने का है। रिपोर्ट का तर्क है कि इससे एक संस्था के घाटे की भरपाई दूसरी संस्था के लाभ से की जा सकेगी, जिससे कर बोझ कम होगा और वित्तीय दक्षता बढ़ेगी।
निजी निवेश को बढ़ावा देने की वकालत
रिपोर्ट में उत्पादन आधारित सब्सिडी की जगह उपभोग आधारित सब्सिडी लागू करने, वित्तीय नियमों का कड़ाई से पालन करने और बजट से बाहर लिए गए ऋणों (ऑफ-बजट बॉरोइंग) में पारदर्शिता बढ़ाने की सिफारिश की गई है।इसके अलावा बिजली क्षेत्र में निजी निवेश को प्रोत्साहित करने, भूमि और श्रम कानूनों से जुड़ी बाधाओं को कम करने तथा उद्योगों के लिए अनुकूल माहौल बनाने की जरूरत बताई गई है।
विशेषज्ञों का मानना है कि ये सुझाव केरल की पारंपरिक आर्थिक नीतियों से हटकर अधिक बाजार आधारित व्यवस्था की ओर संकेत करते हैं, जहां निजी पूंजी की भूमिका बढ़ेगी और वित्तीय अनुशासन पर अधिक जोर दिया जाएगा।
5.07 लाख करोड़ रुपये पहुंचा राज्य का कर्ज
रिपोर्ट के अनुसार केरल पर कुल कर्ज 5.07 लाख करोड़ रुपये तक पहुंच चुका है, जो राज्य के सकल घरेलू उत्पाद (जीएसडीपी) का लगभग 35.5 प्रतिशत है।रिपोर्ट बताती है कि राज्य की कुल राजस्व प्राप्तियों का लगभग 77 प्रतिशत हिस्सा वेतन, पेंशन और ब्याज भुगतान जैसे अनिवार्य खर्चों में चला जाता है। इसके कारण सरकार के पास विकास और अन्य योजनाओं के लिए सीमित संसाधन बचते हैं।
विकास और पूंजीगत खर्च में गिरावट
रिपोर्ट के मुताबिक पूंजीगत व्यय जीएसडीपी का केवल 1.3 प्रतिशत है, जो राष्ट्रीय औसत से काफी कम है। विकास संबंधी खर्च भी कुल व्यय के अनुपात में राष्ट्रीय स्तर से पीछे है।रिपोर्ट में कहा गया है कि राज्य द्वारा लिया जा रहा अधिकांश कर्ज नई परिसंपत्तियां बनाने के बजाय मौजूदा खर्चों को पूरा करने में इस्तेमाल हो रहा है, जिससे भविष्य में आय बढ़ाने की क्षमता प्रभावित हो रही है।
नकदी संकट से जूझ रही सरकार
रिपोर्ट में राज्य की नकदी स्थिति को भी चिंताजनक बताया गया है। इसमें कहा गया है कि केरल सरकार लगातार भारतीय रिजर्व बैंक से अल्पकालिक ऋण लेने पर निर्भर रही है।साल 2025 में राज्य ने 262 दिनों तक ‘वेज एंड मीन्स एडवांस’ का उपयोग किया और 84 दिनों तक ओवरड्राफ्ट की स्थिति में रहा। यह राज्य की गंभीर नकदी समस्या को दर्शाता है।
48,733 करोड़ रुपये की बकाया देनदारियां
रिपोर्ट के अनुसार नई सरकार को 48,733 करोड़ रुपये की बकाया देनदारियां भी विरासत में मिली हैं।इनमें महंगाई भत्ता और महंगाई राहत का बकाया, ठेकेदारों के भुगतान तथा बैंकों से संबंधित देनदारियां शामिल हैं। यह राशि राज्य की वार्षिक उधारी के लगभग बराबर बताई गई है।
ऑफ-बजट देनदारियां भी चिंता का कारण
रिपोर्ट में केरल इंफ्रास्ट्रक्चर इन्वेस्टमेंट फंड बोर्ड (KIIFB) की 21,000 करोड़ रुपये की देनदारी को भी प्रमुख चिंता बताया गया है।रिपोर्ट का कहना है कि ये देनदारियां अंततः राज्य सरकार पर ही बोझ बनती हैं, इसलिए वित्तीय पारदर्शिता के दृष्टिकोण से इन्हें नजरअंदाज नहीं किया जा सकता।
सार्वजनिक उपक्रमों का बढ़ता घाटा
सार्वजनिक क्षेत्र की कंपनियों का संचयी घाटा बढ़कर 78,851 करोड़ रुपये तक पहुंच गया है। कुछ चुनिंदा कंपनियां इस घाटे का बड़ा हिस्सा पैदा कर रही हैं।
रिपोर्ट में कहा गया है कि लगातार घाटे में चल रही कंपनियों को वित्तीय सहायता देने के कारण बुनियादी ढांचे, स्वास्थ्य और शिक्षा जैसे महत्वपूर्ण क्षेत्रों के लिए संसाधन कम पड़ रहे हैं।
सामाजिक योजनाओं पर भी पड़ा असर
वित्तीय दबाव का असर योजनागत खर्च पर भी दिखाई दे रहा है। रिपोर्ट के अनुसार अनुसूचित जाति, अनुसूचित जनजाति, पिछड़ा वर्ग और अल्पसंख्यकों के लिए आवंटन में समय के साथ उल्लेखनीय कमी आई है।
रिपोर्ट इसे बढ़ते अनिवार्य खर्च और सीमित वित्तीय संसाधनों का परिणाम बताती है।
राजस्व संग्रह में भी कमी
राज्य की कर आय लगातार बजटीय अनुमानों से कम रही है। इसके कारण वास्तविक और अनुमानित आय के बीच बड़ा अंतर पैदा हुआ है।
साथ ही केंद्र से मिलने वाले अनुदानों में बदलाव और जीएसटी मुआवजे की समाप्ति ने भी राज्य की वित्तीय स्थिति को और कठिन बना दिया है।
बेरोजगारी और प्रवासी आय पर निर्भरता
रिपोर्ट के अनुसार केरल की अर्थव्यवस्था अब भी मुख्य रूप से सेवा क्षेत्र पर आधारित है। औद्योगिक विकास सीमित है और शिक्षित युवाओं में बेरोजगारी की दर ऊंची बनी हुई है।राज्य की अर्थव्यवस्था काफी हद तक प्रवासी भारतीयों द्वारा भेजी जाने वाली धनराशि (रेमिटेंस) पर भी निर्भर है। रिपोर्ट ने इन चुनौतियों से निपटने के लिए निजी निवेश, औद्योगिक विकास और रोजगार सृजन पर जोर दिया है।
पिनराई विजयन ने उठाए प्रक्रिया पर सवाल
रिपोर्ट के सामने आने के बाद विपक्ष के नेता और पूर्व मुख्यमंत्री पिनराई विजयन ने इसकी तैयारी और प्रस्तुति की प्रक्रिया पर सवाल उठाए हैं।उन्होंने कहा कि मुख्यमंत्री ने पहले बताया था कि यह रिपोर्ट तैयार करने के लिए तीन सदस्यीय समिति बनाई गई थी, जिसके सभी सदस्य सरकारी सेवा से बाहर के थे।विजयन का तर्क है कि ऐसी रिपोर्टें सामान्यतः वित्त विभाग द्वारा तैयार की जाती हैं और निर्धारित सरकारी प्रक्रिया के तहत विधानसभा में प्रस्तुत की जाती हैं।उन्होंने आरोप लगाया कि वित्त विभाग को दरकिनार कर गोपनीय वित्तीय आंकड़े बाहरी व्यक्तियों के साथ साझा किए गए।
'रिपोर्ट की कोई कानूनी मान्यता नहीं'
विजयन ने कहा कि यह दस्तावेज आधिकारिक नहीं माना जा सकता और इसकी कोई कानूनी वैधता नहीं है।उनके अनुसार विधानसभा ने ऐसी किसी रिपोर्ट की तैयारी को अधिकृत नहीं किया था और निर्धारित प्रक्रिया का पालन किए बिना तैयार किए गए दस्तावेज को सदन के आधिकारिक रिकॉर्ड का हिस्सा नहीं बनाया जा सकता।उन्होंने इसे "राजनीतिक दस्तावेज" करार देते हुए कहा कि इसे विधानसभा में पेश करना संसदीय परंपराओं और प्रक्रियाओं का अपमान है।विजयन ने विधानसभा अध्यक्ष से यह स्पष्ट करने की मांग की है कि क्या इस प्रकार तैयार की गई रिपोर्ट को सदन की कार्यवाही का हिस्सा माना जा सकता है।
आर्थिक बहस से राजनीतिक टकराव तक
विश्लेषकों का मानना है कि यह रिपोर्ट अब केवल वित्तीय स्थिति का आकलन भर नहीं रह गई है। इसमें सुझाए गए आर्थिक सुधारों और रिपोर्ट की वैधता को लेकर उठे सवालों ने इसे केरल की राजनीति का नया विवाद बना दिया है।आने वाले दिनों में यह देखना दिलचस्प होगा कि सरकार इन सिफारिशों को लागू करने की दिशा में कदम बढ़ाती है या फिर यह मुद्दा राजनीतिक आरोप-प्रत्यारोप तक ही सीमित रह जाता है।

