
सिल्वर लाइन आउट, हाई-स्पीड रेल इन! केरल में फिर गरमाई सियासत
सिल्वर लाइन परियोजना रद्द होने के बाद केरल में नई हाई-स्पीड रेल योजना पर बहस तेज हो गई है। भूमि, पर्यावरण और लागत को लेकर फिर सवाल उठ रहे हैं।
केरल में रेल विकास को लेकर लंबे समय से चल रही बहस अब एक नए चरण में प्रवेश कर गई है, लेकिन इससे जुड़े कई पुराने सवाल अभी भी कायम हैं। सिल्वर लाइन परियोजना को ठंडे बस्ते में डालने के बाद राज्य की यूडीएफ सरकार ने अब प्रसिद्ध इंजीनियर ई. श्रीधरन द्वारा प्रस्तावित नई हाई-स्पीड रेल परियोजना का समर्थन करने के संकेत दिए हैं। इस प्रस्ताव ने भूमि अधिग्रहण, पर्यावरणीय प्रभाव, वित्तीय व्यवहार्यता और राजनीतिक स्थिरता जैसे मुद्दों पर बहस को फिर से तेज कर दिया है।
इस परियोजना की अंतरिम रिपोर्ट पहले ही दिल्ली मेट्रो रेल कॉर्पोरेशन (DMRC) द्वारा सरकार को सौंप दी गई है। प्रस्तावित रेल कॉरिडोर तिरुवनंतपुरम से कन्नूर तक जाएगा और इसका उद्देश्य राज्य के भीतर यात्रा समय को काफी कम करना है। खास बात यह है कि सिल्वर लाइन परियोजना के खिलाफ उठाई गई कई आपत्तियां अब इस नए प्रस्ताव के संदर्भ में भी सामने आ रही हैं।
क्या है नई हाई-स्पीड रेल परियोजना?
प्रस्तावित केरल हाई-स्पीड रेलवे (KHSR) तिरुवनंतपुरम से कन्नूर के बीच 473.2 किलोमीटर लंबा रेल कॉरिडोर होगा। इस मार्ग पर कुल 23 स्टेशन प्रस्तावित हैं।
योजना के अनुसार, तिरुवनंतपुरम से कन्नूर तक की यात्रा लगभग 3 घंटे 30 मिनट में पूरी की जा सकेगी। यह परियोजना डबल-लाइन कॉरिडोर के रूप में विकसित की जाएगी, जिसका अधिकांश हिस्सा एलिवेटेड (ऊंचे पुलों पर) होगा। तिरुवनंतपुरम क्षेत्र में लगभग 6.5 किलोमीटर लंबी सुरंग भी बनाई जाएगी।
इस रेल लाइन में स्टैंडर्ड गेज ट्रैक का उपयोग होगा। ट्रेनों की अधिकतम डिजाइन गति 200 किलोमीटर प्रति घंटा होगी, जबकि परिचालन गति 180 किलोमीटर प्रति घंटा तक रहेगी। ट्रेन सेवाएं हर 20 से 40 मिनट के अंतराल पर उपलब्ध होंगी और प्रतिदिन लगभग 54,000 यात्रियों के सफर करने का अनुमान है।
सिल्वर लाइन परियोजना क्या थी?
नई परियोजना की तुलना अक्सर वाम लोकतांत्रिक मोर्चा (LDF) सरकार की महत्वाकांक्षी सिल्वर लाइन परियोजना से की जा रही है।सिल्वर लाइन को 530 किलोमीटर लंबे सेमी हाई-स्पीड रेल कॉरिडोर के रूप में प्रस्तावित किया गया था, जो तिरुवनंतपुरम को कासरगोड से जोड़ता। इसकी अनुमानित लागत 63,940 करोड़ रुपये थी। परियोजना में ट्रेनों की अधिकतम गति 200 किलोमीटर प्रति घंटा रखी गई थी और यात्रा समय चार घंटे से कम करने का लक्ष्य था।
इस परियोजना में 11 जिलों में 11 स्टेशन प्रस्तावित थे और इसके लिए लगभग 1,383 हेक्टेयर भूमि अधिग्रहण की आवश्यकता थी। हालांकि, परियोजना को राजनीतिक दलों, सामाजिक संगठनों, पर्यावरण कार्यकर्ताओं और नागरिक समूहों के व्यापक विरोध का सामना करना पड़ा।
सिल्वर लाइन के खिलाफ क्या थीं प्रमुख आपत्तियां?
सिल्वर लाइन के विरोधियों ने मुख्य रूप से तीन बड़े मुद्दे उठाए थे—
1. भूमि अधिग्रहण और विस्थापन
परियोजना के लिए बड़ी मात्रा में भूमि अधिग्रहण की जरूरत थी, जिससे हजारों परिवार प्रभावित होने की आशंका जताई गई।
2. पर्यावरणीय प्रभाव
आलोचकों का कहना था कि रेल मार्ग दलदली क्षेत्रों, धान के खेतों और अन्य संवेदनशील पारिस्थितिक क्षेत्रों को प्रभावित करेगा, जिससे पर्यावरण को नुकसान पहुंच सकता है।
3. वित्तीय व्यवहार्यता
परियोजना की भारी लागत और उसके वित्तपोषण को लेकर भी सवाल उठाए गए। विरोधियों ने इसकी दीर्घकालिक आर्थिक स्थिरता पर चिंता व्यक्त की।
यूडीएफ सिल्वर लाइन के सबसे मुखर विरोधियों में शामिल था। वहीं, केंद्रीय रेल मंत्रालय ने भी वित्तीय व्यवहार्यता और मौजूदा रेलवे विस्तार योजनाओं के साथ समन्वय को लेकर चिंता जताते हुए परियोजना को मंजूरी देने से इनकार कर दिया था। केंद्र सरकार की मंजूरी न मिलने के कारण यह परियोजना आगे नहीं बढ़ सकी।
ई. श्रीधरन का वैकल्पिक मॉडल
सिल्वर लाइन पर चल रही बहस के दौरान मेट्रोमैन ई. श्रीधरन ने परियोजना की कार्यप्रणाली पर सवाल उठाए थे। बाद में उन्होंने एलिवेटेड ट्रैक और मानक रेलवे प्रणाली पर आधारित एक वैकल्पिक मॉडल प्रस्तुत किया।श्रीधरन का मानना था कि इस मॉडल से भूमि अधिग्रहण की आवश्यकता कम होगी और परियोजना की कुल लागत भी नियंत्रित रह सकेगी। वर्तमान हाई-स्पीड रेल प्रस्ताव में उनके कई सुझावों को शामिल किया गया है।
हालांकि, दोनों परियोजनाओं में कुछ महत्वपूर्ण अंतर भी हैं। नई परियोजना का पहला चरण कन्नूर तक सीमित है, जबकि कासरगोड तक विस्तार दूसरे चरण में प्रस्तावित है।
फंडिंग मॉडल में भी बड़ा अंतर
नई परियोजना की वित्तीय संरचना सिल्वर लाइन से अलग है।प्रस्ताव के अनुसार, कुल लागत में से 36,000 करोड़ रुपये केंद्र और राज्य सरकारें 51:49 के अनुपात में इक्विटी निवेश के रूप में देंगी।बाकी 24,000 करोड़ रुपये क्राउडफंडिंग के माध्यम से जुटाने का प्रस्ताव है।
राजनीति में बदला रुख
नई परियोजना को लेकर राजनीतिक दलों का बदला हुआ रुख भी चर्चा का विषय बना हुआ है।एलडीएफ, जिसने सिल्वर लाइन का जोरदार समर्थन किया था, अब इस हाई-स्पीड रेल परियोजना का भी विरोध नहीं कर रहा है।दूसरी ओर, यूडीएफ, जिसने भूमि अधिग्रहण, पर्यावरण और वित्तीय कारणों के आधार पर सिल्वर लाइन का विरोध किया था, अब नई परियोजना के पक्ष में नजर आ रहा है।इस बदलाव ने यह सवाल खड़ा कर दिया है कि आखिर ऐसा क्या बदल गया है?जो मुद्दे कभी यूडीएफ की आलोचना का आधार थे, क्या नई परियोजना वास्तव में उनका समाधान प्रस्तुत करती है? यह बहस अभी भी जारी है।
कार्यकर्ता अब भी आश्वस्त नहीं
सिल्वर लाइन विरोधी कई कार्यकर्ता नई परियोजना को लेकर भी संशय में हैं।उनका तर्क है कि केरल को पूरी तरह नया हाई-स्पीड रेल कॉरिडोर बनाने के बजाय मौजूदा रेलवे नेटवर्क के आधुनिकीकरण और उन्नयन पर ध्यान देना चाहिए।उनके अनुसार, वर्तमान रेलवे ढांचे में सुधार कर कम लागत और कम सामाजिक-पर्यावरणीय प्रभाव के साथ बेहतर कनेक्टिविटी हासिल की जा सकती है।
उनका मानना है कि असली सवाल यह नहीं है कि कौन सी परियोजना बेहतर है, बल्कि यह है कि क्या राज्य को वास्तव में एक नए हाई-स्पीड रेल कॉरिडोर की जरूरत है?
बहस अभी खत्म नहीं हुई
दोनों परियोजनाओं की तुलना मुख्य रूप से भूमि अधिग्रहण, एलिवेशन, रूट अलाइनमेंट और फंडिंग मॉडल जैसे मुद्दों पर केंद्रित है।हालांकि, दोनों योजनाओं में कई समानताएं भी हैं, जिनमें उनकी विशाल लागत, परियोजना का आकार और ट्रेनों की प्रस्तावित गति शामिल है।
केंद्र सरकार ने अभी तक केरल हाई-स्पीड रेलवे परियोजना को औपचारिक मंजूरी नहीं दी है। फिलहाल यह परियोजना अंतरिम रिपोर्ट के स्तर पर विचाराधीन है।ऐसे में केरल में रेल विकास को लेकर बहस अभी समाप्त होने वाली नहीं है। राजनीतिक दलों के बदले रुख, ई. श्रीधरन के वैकल्पिक मॉडल और केंद्र सरकार द्वारा पहले सिल्वर लाइन को खारिज किए जाने जैसे मुद्दे आने वाले महीनों में चर्चा के केंद्र में बने रहेंगे।

