केरल में संघ परिवार के हालिया विवादों से तेज होती हिंदुत्व राजनीति के संकेत
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नंदगोविंदम भजंस वही समूह है, जिसे पिछले साल दक्षिणपंथ के कुछ वर्गों का सक्रिय समर्थन मिला था। अब वही समूह संघ परिवार के निशाने पर है।

केरल में संघ परिवार के हालिया विवादों से तेज होती हिंदुत्व राजनीति के संकेत

बीजेपी की अल्पसंख्यक पहुंच की कोशिशें विफल रहने के बाद अब पहचान-आधारित राजनीति और तेज होती दिख रही है। अंतरधार्मिक भजनों और खाने से जुड़े पोस्टरों पर विवाद राज्य के धर्मनिरपेक्ष ताने-बाने की परीक्षा ले रहे हैं।


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केरल में दो ऐसे घटनाक्रम, जो पहली नजर में एक-दूसरे से जुड़े नहीं लगते, कुछ ही दिनों में एक बड़े राजनीतिक संकेत में बदल गए हैं। श्री महाविष्णु मंदिर के पास एक भजन मंडली द्वारा ईसाई भक्ति गीत गाने को लेकर विवाद और अलप्पुझा जिले के एक रेस्टोरेंट ‘मेहर मंडी एंड ग्रिल्स’ के विशु पोस्टर को लेकर उठे विवाद—अब इन दोनों को साथ जोड़कर देखा जा रहा है।

इन्हें इस रूप में समझा जा रहा है कि हालिया चुनाव में ईसाई समुदाय तक पहुंच बनाने की कोशिशें विफल रहने के बाद संघ परिवार एक बार फिर अधिक आक्रामक हिंदुत्व रणनीति की ओर लौट रहा है।

भजन विवाद

वेम्बिंकुलंगारा में यह मामला एक स्थानीय सांस्कृतिक घटना के रूप में शुरू हुआ। नंदगोविंदम भजंस नाम की भजन मंडली ने स्थानीय चर्च समुदाय का आभार व्यक्त करने के लिए एक ईसाई भक्ति गीत प्रस्तुत किया। इस चर्च समुदाय ने मंदिर से जुड़े एक कार्यक्रम में सहयोग किया था।

आयोजकों और मंदिर प्रबंधन का कहना था कि यह कार्यक्रम मंदिर परिसर के बाहर आयोजित किया गया था और यह विभिन्न समुदायों के बीच लंबे समय से चली आ रही साझा भागीदारी की परंपरा को दर्शाता है।

दिलचस्प बात यह है कि नंदगोविंदम भजंस वही समूह है, जिसे पिछले साल दक्षिणपंथ के कुछ वर्गों का सक्रिय समर्थन मिला था, खासकर उस समय जब रैपर वेदन का उदय हुआ था। वेदन के तेज़, एंटी-कास्ट (जाति-विरोधी) विषयों और ऊर्जावान प्रस्तुतियों ने केरल के युवाओं के बीच खासा प्रभाव डाला था।

उस समय नंदगोविंदम को वेदन के मुकाबले एक सांस्कृतिक विकल्प के रूप में पेश किया गया था। इस समूह को एक नरम, मूल्यों पर आधारित और भक्तिपूर्ण अनुशासन का प्रतिनिधि बताया गया, जबकि वेदन को उन कथाओं में आक्रामक और कम परिष्कृत बताया गया। यही पुरानी छवि आज के विरोध को और भी चौंकाने वाला बनाती है।

हाल ही में संघ परिवार से जुड़े कुछ वर्गों की प्रतिक्रिया ने इस घटना को जल्दी ही एक अलग रूप दे दिया। ईसाई भक्ति गीत गाने को धार्मिक नियमों के उल्लंघन के रूप में पेश किया गया। तर्क साफ था—मंदिर अंतरधार्मिक अभिव्यक्ति के स्थान नहीं हैं।

जो पहले केरल की सह-अस्तित्व वाली जीवंत संस्कृति का हिस्सा माना जाता था, उसे अब धार्मिक पहचान के कमजोर पड़ने के रूप में प्रस्तुत किया गया।

हिंदू ऐक्य वेदी की केपी शशिकला ने इसे एक उदाहरण के जरिए समझाया, “चिकन मसाला स्वादिष्ट होता है, लेकिन उसे पायसम (मीठी खीर) में नहीं डाला जाना चाहिए। या फिर, अगर आप उसी शाखा को काट देंगे जिस पर बैठे हैं, तो वह चाहे जितनी मजबूत हो, आप गिर जाएंगे।”

केरल के सामाजिक ताने-बाने पर असर

पूर्व वित्त मंत्री टी. एम. थॉमस आइजैक इसे एक व्यापक प्रवृत्ति का हिस्सा मानते हैं।

उन्होंने कहा, “सांप्रदायिक विभाजन पैदा करने की एक संगठित कोशिश चल रही है। देखिए, संघ परिवार का एक नेता पूछता है कि क्या चिकन मसाला को पायसम में मिलाया जा सकता है। ऐसे बयान श्री नारायण गुरु की धरती पर चौंकाने वाले हैं। एक समय था जब मंदिर उत्सवों में केपीएसी के नाटक और वी. संबासिवन की विश्व साहित्य पर आधारित कथाएं जैसे प्रगतिशील कार्यक्रम होते थे। आज, एक क्रांतिकारी गीत पर भी आपत्ति हो सकती है, यहां तक कि अदालतों में भी। वेम्बिंकुलंगारा मंदिर प्रबंधन की प्रतिक्रिया दिखाती है कि केरल ने अभी तक ऐसे विभाजनकारी दबावों के आगे झुकाव नहीं किया है।”

कांग्रेस नेता के सी वेणुगोपाल ने भी इसे केरल के सामाजिक ताने-बाने को बिगाड़ने की एक व्यापक कोशिश बताया है।

उन्होंने कहा, “संघ परिवार की यह साजिश, जो सांप्रदायिक सौहार्द की जड़ों से जुड़े केरल के दिल को चोट पहुंचाना चाहती है, अब सारी सीमाएं पार कर रही है। बीजेपी-आरएसएस का धार्मिक नफरत फैलाने का प्रयास केरल की उस अनोखी संस्कृति को चुनौती देता है, जहां मंदिर और चर्च मिलकर ओणम, विशु, ईस्टर और पेरुनाल जैसे त्योहार मनाते हैं। यह धरती हर संभव तरीके से ऐसे प्रयासों का विरोध करेगी।”

बीजेपी खेमे में भी इस मुद्दे पर एक राय नहीं दिखी। पूर्व डीजीपी से बीजेपी नेता बने टी.पी. सेनकुमार ने खुलकर भजन मंडली की आलोचना की, जबकि कुछ अन्य नेताओं ने इस मुद्दे को कमतर दिखाने की कोशिश की।

वहीं, ईसाई समुदाय के भीतर से संघ परिवार का समर्थन करने वाले कुछ लोगों ने जब नरम रुख अपनाया, तो उन्हें सोशल मीडिया पर कट्टरपंथी वर्गों के विरोध का सामना करना पड़ा—जो रणनीति को लेकर मतभेदों की ओर इशारा करता है।

विशु पोस्टर विवाद से बढ़ा गुस्सा

अगर भजन विवाद ने धार्मिक स्थानों से जुड़े सवाल उठाए, तो ‘मेहर मंडी’ वाला मामला एक अलग लेकिन उससे जुड़ी दिशा में आगे बढ़ा।

विशु-थीम वाले एक पोस्टर में भगवान कृष्ण के साथ एक मांसाहारी डिश दिखाए जाने को लेकर विवाद खड़ा हो गया। यह विवाद सिर्फ स्वाद या भावना की बहस तक सीमित नहीं रहा, बल्कि काफी आगे तक बढ़ गया।

रेस्टोरेंट मालिकों ने माफी भी मांगी, लेकिन इसके बावजूद उनके खिलाफ समाज में सांप्रदायिक विभाजन पैदा करने के आरोप में मामला दर्ज किया गया।

हिंदू संगठनों ने आरोप लगाया कि यह उनकी आस्थाओं को कमजोर करने की एक सुनियोजित कोशिश है, और दावा किया कि विशु के दौरान कई रेस्टोरेंट्स ने इसी तरह के विज्ञापन अपनाए थे।

एफसीआरए विवाद: केरल के चर्च-समर्थित मलयालम अखबार ने ‘राजनीतिक अवसरवाद’ पर साधा निशाना

त्रिशूर से बीजेपी से जुड़े एक पदाधिकारी प्रसीद दास ने राष्ट्रीय जांच एजेंसी (NIA) में शिकायत दर्ज कराई है, जिसमें राज्य भर में मुसलमानों द्वारा चलाए जा रहे आठ अरबियन फूड आउटलेट्स की जांच की मांग की गई है—खासतौर पर वे जो नोटबंदी के बाद शुरू हुए। इस कदम ने एक सांस्कृतिक विवाद को संदेह और सुरक्षा के मुद्दे में बदल दिया है।

जहर घोलने की कोशिश’

इन हालिया विवादों पर बात करते हुए वरिष्ठ पत्रकार श्रीजीत दिवाकरन ने कहा,

“मंदिरों के सांस्कृतिक कार्यक्रमों में जहर घोलने की स्पष्ट कोशिश हो रही है। लेकिन केरल में एक स्वाभाविक भावनात्मक प्रतिरोध मौजूद है, जो समाज को मजबूती से खड़ा रखता है। मंदिर समितियां अक्सर ऐसे हस्तक्षेपों का विरोध करती हैं और उन्हें स्वीकार करने से इनकार कर देती हैं।

साथ ही, जैसा कि उत्तर भारत के कुछ हिस्सों में देखा गया है, नफरत को खाने तक में घोलने की कोशिश की जा रही है। केरल जैसे राज्य में, जहां खान-पान की आदतें भाषा और क्षेत्रीय सीमाओं से परे हैं, कुछ रेस्टोरेंट्स की जांच के लिए NIA से मांग करना एक खतरनाक बदलाव को दर्शाता है।

यह भी ध्यान देने वाली बात है कि नीतिगत फैसलों के चलते बढ़ती रसोई गैस की कीमतों ने पहले ही केरल के होटल उद्योग को संकट में डाल दिया है। ये सभी घटनाएं मिलकर एक चिंताजनक दिशा की ओर इशारा करती हैं।”

इन दोनों घटनाओं को साथ जोड़कर देखें तो यह एक नई रणनीति (रीकैलिब्रेशन) का संकेत देती हैं। अल्पसंख्यक समुदायों तक पहुंच बनाने की कोशिशों को सीमित सफलता मिलने के बाद अब जोर तेज पहचान-आधारित राजनीति के जरिए समर्थन मजबूत करने पर दिखाई देता है।

केरल में, जहां रोजमर्रा की सामाजिक जिंदगी लंबे समय से अलगाव के बजाय आपसी मेल-जोल पर आधारित रही है, वहां राजनीतिक तौर पर इन सीमाओं को और स्पष्ट करने की कोशिश की जा रही है।

अब यह देखना बाकी है कि इस प्रयास को व्यापक स्वीकृति मिलती है या नहीं।

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