
माफिया, डकैत और सत्ता से भिड़ीं, फिर भी नहीं झुकीं खबर लहरिया की महिलाएं
खबर लहरिया की महिला पत्रकारों ने सामाजिक भेदभाव, धमकियों और चुनौतियों के बीच जमीनी पत्रकारिता से अपनी अलग पहचान बनाई।
उत्तर प्रदेश के बुंदेलखंड क्षेत्र के किसी दूरदराज़ गांव में तपेदिक (टीबी) जैसी गंभीर बीमारी का खुलासा करना हो, मध्य प्रदेश में स्वयंभू धर्मगुरु धीरेंद्र कृष्ण शास्त्री के बढ़ते प्रभाव पर सवाल उठाना हो, खनन माफिया का सामना करना हो या फिर बुंदेलखंड के कुख्यात डकैतों की दुनिया तक पहुंचना हो यह सब खबर लहरिया की महिला पत्रकारों के लिए रोजमर्रा का काम है।
लेकिन इन रिपोर्टों के पीछे संघर्ष, साहस और सामाजिक पूर्वाग्रहों से लड़ने की ऐसी व्यक्तिगत कहानियां छिपी हैं, जिनके बारे में बहुत कम लोग जानते हैं। सामंती सोच वाले बुंदेलखंड में हाशिए पर रहने वाले समुदायों से आने वाली इन महिलाओं ने न केवल पत्रकारिता में अपनी पहचान बनाई, बल्कि वर्षों से चले आ रहे भेदभाव, सामाजिक बहिष्कार और "बड़ी आई पत्रकार" जैसे तानों का भी डटकर सामना किया।
इन्हीं अनुभवों और संघर्षों को साझा करने के उद्देश्य से खबर लहरिया की टीम ने अपनी नई पुस्तक "द गुड रिपोर्टर: ए मेमॉयर ऑफ जर्नलिज्म इन द 21st सेंचुरी, ए कलेक्टिव बायोग्राफी" लिखी है। साइमन एंड शूस्टर इंडिया द्वारा प्रकाशित यह पुस्तक हाल ही में लॉन्च की गई।
छोटे अखबार से डिजिटल मीडिया तक का सफर
खबर लहरिया की शुरुआत वर्ष 2002 में उत्तर प्रदेश के बांदा जिले में एक साक्षरता केंद्र की कार्यशाला से हुई थी। शुरुआत में यह महिलाओं द्वारा तैयार किया गया एक छोटा अखबार था, जिसे ग्रामीण समुदायों तक पहुंचाया जाता था। उस समय यह बिना लाभ कमाने वाला एक ऐसा समाचार पत्र था, जिस पर किसी पत्रकार का नाम भी नहीं छपता था और जिसकी कीमत मात्र दो रुपये थी।
समय के साथ यह पहल विकसित होकर एक डिजिटल समाचार मंच में बदल गई। आज खबर लहरिया उत्तर प्रदेश और मध्य प्रदेश के 16 जिलों में फैले करीब दो दर्जन रिपोर्टरों का नेटवर्क बन चुका है और मल्टीमीडिया कंटेंट भी तैयार करता है।
किताब में दर्ज हैं अनकही कहानियां
खबर लहरिया की सह-संस्थापक और प्रबंध संपादक कविता बुंदेलखंडी बताती हैं कि वर्षों से उनके काम पर कई डॉक्यूमेंट्री और फिल्में बनीं, जिनमें ऑस्कर-नामांकित फिल्म भी शामिल है। लोगों ने उनके सामाजिक और पेशेवर संघर्षों को देखा, लेकिन उनके निजी जीवन की चुनौतियां कभी सामने नहीं आईं।इस पुस्तक में पत्रकारों के बीच के रिश्तों, दोस्ती, अकेलेपन, डर, संघर्ष और पत्रकारिता के दौरान मिले अनुभवों को विस्तार से दर्ज किया गया है।मुख्य रिपोर्टर नाज़नी रिज़वी ने स्वीकार किया कि रिपोर्टिंग के दौरान जब उन्हें सेक्स वर्कर्स से बातचीत करनी पड़ती थी, तो उनके भीतर एक "अच्छी महिला" होने को लेकर मानसिक संघर्ष चलता था।
टीम की अन्य सदस्यों ने भी बताया कि जब वे दो रुपये का अखबार बेचने गांव-गांव जाती थीं, तब कई पुरुष उनसे अपमानजनक सवाल पूछते थे। कई बार राजनीतिक नेताओं ने उनके सवालों का मजाक उड़ाया और उन्हें गंभीरता से नहीं लिया।
सामान्य पृष्ठभूमि का फायदा
टीबी संकट का खुलासा बना मिसाल
खबर लहरिया की सबसे चर्चित रिपोर्टों में से एक वर्ष 2016 में उत्तर प्रदेश के बांदा जिले के गोपरा गांव में फैली टीबी महामारी का खुलासा था।गीता और मीरा देवी की इस रिपोर्ट ने प्रशासन को झकझोर दिया। रिपोर्ट में बताया गया कि कैसे गांव में बड़ी संख्या में लोग टीबी से पीड़ित थे, लेकिन स्वास्थ्य व्यवस्था पूरी तरह विफल साबित हो रही थी। इस रिपोर्ट के बाद जिला प्रशासन ने गांव में विशेष टीबी जांच शिविर लगाया। कई मरीजों का इलाज शुरू हुआ और गांव को राहत मिली। हालांकि, इस खबर तक पहुंचाने वाले युवा कल्लू की बाद में मौत हो गई।
डकैत की कहानी का दूसरा पक्ष
टीम ने एक महिला डकैत साधना पाटिल की कहानी का भी जिक्र किया। मुख्यधारा की मीडिया ने उन्हें "दस्यु सुंदरी" और फिल्मी अंदाज में प्रस्तुत किया था। लेकिन जब खबर लहरिया की टीम उनके घर पहुंची, तो उन्हें एक जिम्मेदार बेटी की छवि देखने को मिली।टीम का कहना है कि उन्होंने सनसनी फैलाने के बजाय तथ्यों पर आधारित रिपोर्टिंग की और कहानी का वास्तविक पक्ष सामने रखा।
सोशल मीडिया के दौर की चुनौतियां
आज सोशल मीडिया और यूट्यूब के बढ़ते प्रभाव ने पारंपरिक पत्रकारिता के सामने नई चुनौतियां खड़ी कर दी हैं।मीरा देवी कहती हैं, "आज जिसके हाथ में मोबाइल है, वह खुद को पत्रकार समझता है। लेकिन कई यूट्यूबर और इन्फ्लुएंसर बिना तथ्यों की जांच किए सामग्री परोस रहे हैं, जिससे समाज में गलत संदेश जा रहा है।"उनका मानना है कि पत्रकारिता का मूल उद्देश्य तथ्यों की पुष्टि करना और संतुलित रिपोर्टिंग करना है, न कि केवल व्यूज़ बटोरना।
धीरेंद्र कृष्ण शास्त्री और बाबाओं पर रिपोर्ट
खबर लहरिया की एक रिपोर्ट मध्य प्रदेश में स्वयंभू धार्मिक गुरुओं और बाबाओं के बढ़ते प्रभाव पर भी केंद्रित थी।टीम ने बताया कि उन्होंने युवाओं में बढ़ रही अंधभक्ति पर सवाल उठाए थे। रिपोर्ट में बागेश्वर धाम के प्रमुख धीरेंद्र कृष्ण शास्त्री समेत ऐसे धार्मिक नेताओं के प्रभाव की पड़ताल की गई थी। यह रिपोर्ट सोशल मीडिया पर काफी वायरल हुई।
महिलाओं को पत्रकार बनाने की मुहिम
खबर लहरिया की संस्था चंबल मीडिया ने वर्ष 2021 में "चंबल अकादमी" की शुरुआत की। यह महिलाओं के लिए ऑनलाइन पत्रकारिता प्रशिक्षण कार्यक्रम है।अब तक 600 से अधिक ग्रामीण युवतियों को पत्रकारिता का प्रशिक्षण दिया जा चुका है। इनमें से कई महिलाएं वीडियो जर्नलिस्ट बनीं, कुछ ने अपने समाचार चैनल शुरू किए और कुछ सामुदायिक मीडिया संस्थानों से जुड़ीं।
'हम किसी पार्टी के विरोधी नहीं'
टीम का कहना है कि उन्हें अक्सर किसी राजनीतिक दल के पक्ष या विपक्ष में खड़ा करने की कोशिश की जाती है, लेकिन उनका उद्देश्य केवल जमीनी मुद्दों को उठाना है। कविता बुंदेलखंडी कहती हैं, "हम न भाजपा विरोधी हैं, न बसपा या कांग्रेस विरोधी। हमारा काम गांवों की राजनीति, विकास और आम लोगों के मुद्दों पर सवाल उठाना है।" उनका मानना है कि पत्रकारिता का उद्देश्य सत्ता या विपक्ष का समर्थन करना नहीं, बल्कि जनता की आवाज़ को सामने लाना है।
पत्रकारिता के जरिए बदलाव की कोशिश
पिछले दो दशकों में खबर लहरिया ने राजनीतिक, आर्थिक और तकनीकी चुनौतियों का सामना किया है। बावजूद इसके, यह संस्था ग्रामीण भारत की आवाज़ बनने में सफल रही है।टीम का कहना है कि उनका लक्ष्य केवल खबरें दिखाना नहीं, बल्कि समाज में सकारात्मक बदलाव लाना है। यही वजह है कि आज खबर लहरिया केवल एक मीडिया संस्थान नहीं, बल्कि ग्रामीण महिलाओं के सशक्तिकरण और जमीनी पत्रकारिता का एक प्रेरणादायक उदाहरण बन चुकी है।

