
136 साल पुरानी मस्जिद और BJP सरकार, बंगाल में सुवेंदु अधिकारी के सामने आई पहली बड़ी चुनौती
इस विवाद के सामने आते ही कांग्रेस और अन्य विपक्षी दलों ने सुवेंदु अधिकारी सरकार की प्राथमिकताओं पर सवाल उठाने शुरू कर दिए हैं। प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष शुभंकर सरकार ने कहा कि नई सरकार को आए अभी कुछ ही हफ्ते हुए हैं और उन्होंने आते ही इतने संवेदनशील मुद्दे को हवा दे दी।
पश्चिम बंगाल में 9 मई को सत्ता संभालने वाली भारतीय जनता पार्टी (BJP) की नई सरकार के सामने पहला बड़ा और बेहद संवेदनशील राजनीतिक विवाद खड़ा हो गया है। मुख्यमंत्री सुवेंदु अधिकारी की सरकार ने कोलकाता के नेताजी सुभाष चंद्र बोस अंतरराष्ट्रीय हवाई अड्डे के विस्तार और विमानों की सुरक्षा के लिए एक बड़ा कदम उठाया है। सरकार हवाई अड्डे के सेकेंडरी रनवे के पास स्थित 136 साल पुरानी 'गौरीपुर जामे मस्जिद' (जिसे बांकरा मस्जिद भी कहा जाता है) को दूसरी जगह स्थानांतरित (Relocate) करने की तैयारी कर रही है। सरकार के इस कदम के बाद राज्य के प्रभावशाली मुस्लिम संगठनों ने कड़ा विरोध दर्ज कराया है, जिससे बंगाल की राजनीति में एक नया तनाव पैदा होने के आसार दिखने लगे हैं।
क्यों हो रही है मस्जिद को हटाने की मांग?
यह विवाद नया नहीं है, बल्कि दशकों पुराना है। हवाई अड्डा अधिकारियों का तर्क है कि यह मस्जिद रनवे के उत्तरी छोर के बिल्कुल करीब है। इस वजह से हवाई अड्डे के रनवे का पूरी क्षमता से इस्तेमाल नहीं हो पा रहा है।
अधिकारियों के मुताबिक:
सर्दियों में लैंडिंग में दिक्कत: सर्दियों के मौसम में जब घना कोहरा होता है, तो कम विजिबिलिटी के कारण विमानों को उतारना बेहद खतरनाक हो जाता है।
नेविगेशन सिस्टम लगाने में बाधा: केंद्र सरकार ने पिछले साल संसद में बताया था कि मस्जिद की नजदीकी के कारण वहां आधुनिक नेविगेशन सिस्टम (CAT-III या एडवांस्ड लैंडिंग सिस्टम) नहीं लगाया जा पा रहा है, जो कोहरे में सुरक्षित लैंडिंग के लिए जरूरी है।
रनवे की लंबाई कम होना: मस्जिद के कारण विमानों की लैंडिंग के लिए उपलब्ध प्रभावी दूरी (Landing Distance) कम हो जाती है, जिससे बड़े विमानों के संचालन में खतरा बना रहता है।
एयरपोर्ट अथॉरिटी का कहना है कि कोलकाता में हवाई यात्रियों की संख्या लगातार बढ़ रही है। ऐसे में एयरपोर्ट का विस्तार और रनवे को सुरक्षित बनाना देश के इंफ्रास्ट्रक्चर के लिए बेहद जरूरी है।
मुस्लिम नेताओं और संगठनों ने जताया कड़ा विरोध
इस मामले में नया मोड़ तब आया जब इस महीने हवाई अड्डा अधिकारियों, जिला प्रशासन, सुरक्षा एजेंसियों और मस्जिद कमेटी के प्रतिनिधियों के बीच एक बैठक हुई। जैसे ही मस्जिद को शिफ्ट करने की बात सामने आई, मुस्लिम समाज के नेताओं ने इसका पुरजोर विरोध किया।
जमीयत उलेमा-ए-हिंद के वरिष्ठ नेता और पूर्व राज्य मंत्री सिद्दीकुल्लाह चौधरी ने इस मामले पर बेहद कड़ा रुख अपनाया है। उन्होंने साफ कहा कि किसी भी मस्जिद को केवल एक प्रशासनिक आदेश के जरिए नहीं हटाया जा सकता। चौधरी ने तर्क दिया, "यह मस्जिद 136 साल पुरानी है। जब यह मस्जिद बनी थी, तब वहां कोई एयरपोर्ट नहीं था। एयरपोर्ट का विस्तार बाद में हुआ और मस्जिद के चारों तरफ की जमीन का अधिग्रहण किया गया। लेकिन मस्जिद की जमीन आज भी कानूनी रूप से मस्जिद के ही नाम पर रजिस्टर्ड है।"
उन्होंने आगे कहा कि इस मस्जिद को हटाने का फैसला स्थानीय कमेटी अकेले नहीं ले सकती। इसके लिए देश की बड़ी मुस्लिम संस्थाओं, जैसे दारुल उलोम देवबंद और ऑल इंडिया मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड (AIMPLB) से चर्चा करनी होगी। उन्होंने स्पष्ट किया, "हम टकराव नहीं चाहते, लेकिन सरकार कोई भी फैसला एकतरफा नहीं ले सकती।"
लेफ्ट और टीएमसी (TMC) सरकारों ने क्यों दूरी बनाई?
कोलकाता एयरपोर्ट का यह विवाद पिछले कई दशकों से फाइलों में दबा हुआ था। पश्चिम बंगाल में साल 1977 से 2011 तक वामपंथी मोर्चा (Left Front) की सरकार रही और उसके बाद 2011 से 2026 तक ममता बनर्जी की तृणमूल कांग्रेस (TMC) सत्ता में रही। लेकिन दोनों ही सरकारों ने इस मुद्दे की संवेदनशीलता और वोटों के समीकरण को देखते हुए इस पर कभी आक्रामक रुख नहीं अपनाया।
अब चूंकि केंद्र और राज्य दोनों जगह बीजेपी की सरकार है, इसलिए इस ठंडे बस्ते में पड़े मामले को अचानक गति मिल गई है। हाल ही में एयरपोर्ट सुरक्षा समिति की बैठक में इस मुद्दे पर गंभीरता से चर्चा हुई, जिसके बाद जिला प्रशासन ने स्थानीय मुस्लिम नेताओं से बातचीत शुरू की है।
बीजेपी का रुख: 'इसे धार्मिक चश्मे से न देखें'
दूसरी तरफ, सत्तारूढ़ भारतीय जनता पार्टी इस कदम को पूरी तरह से विकास और राष्ट्रीय सुरक्षा से जोड़कर देख रही है। स्थानीय बीजेपी विधायक सौरव सिकदार ने मीडिया से बात करते हुए कहा कि इस मुद्दे को धार्मिक रंग नहीं दिया जाना चाहिए।
सिकदार ने कहा, "यह सीधे तौर पर विमान यात्रियों की सुरक्षा और देश के बुनियादी ढांचे (Infrastructure) के विकास से जुड़ा मामला है। किसी भी विकास कार्य को इस तरह हमेशा के लिए नहीं रोका जा सकता।" इसके साथ ही बीजेपी नेताओं ने पिछली वामपंथी और टीएमसी सरकारों पर तुष्टीकरण की राजनीति करने और जानबूझकर इस गंभीर समस्या को टालने का आरोप लगाया है।
विपक्ष ने टाइमिंग पर उठाए सवाल: 'रोजगार पर ध्यान दे सरकार'
इस विवाद के सामने आते ही कांग्रेस और अन्य विपक्षी दलों ने सुवेंदु अधिकारी सरकार की प्राथमिकताओं पर सवाल उठाने शुरू कर दिए हैं। प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष शुभंकर सरकार ने कहा कि नई सरकार को आए अभी कुछ ही हफ्ते हुए हैं और उन्होंने आते ही इतने संवेदनशील मुद्दे को हवा दे दी।
शुभंकर सरकार ने कहा, "नई सरकार को सबसे पहले अपने चुनावी वादे पूरे करने चाहिए थे। उन्हें पेट्रोल और डीजल पर वैट (VAT) कम करना चाहिए था ताकि बंगाल में तेल की कीमतें पड़ोसी राज्यों के बराबर आ सकें। जनता को इस वक्त महंगाई से राहत, नए रोजगार और आर्थिक मदद की जरूरत है, लेकिन सरकार विवादित मुद्दों को आगे बढ़ा रही है।" उन्होंने मांग की कि इस सामाजिक और धार्मिक रूप से संवेदनशील मुद्दे पर सभी राजनीतिक दलों और प्रभावित समुदाय के साथ मिलकर आम सहमति बनाई जानी चाहिए, न कि तानाशाही रवैया अपनाया जाए।
आगे क्या होगा?
बंगाल के मुस्लिम समुदाय में पहले से ही नागरिकता जांच (NRC/CAA), घुसपैठ पर सख्ती और गोहत्या नियमों को लेकर एक डर का माहौल है, ऐसे में मस्जिद का यह मुद्दा सुवेंदु सरकार के लिए बड़ी परीक्षा साबित हो सकता है।
फिलहाल, प्रशासनिक अधिकारियों ने किसी भी तरह के तनाव से बचने के लिए ईद-उल-जुहा (Bakrid) के त्योहार को देखते हुए बातचीत को कुछ समय के लिए टाल दिया है। प्रशासन ने मस्जिद हटाने की कोई तय समय सीमा (Deadline) भी घोषित नहीं की है। सरकारी अधिकारी दबी जुबान में कह रहे हैं कि वे बिना किसी हंगामे के बातचीत और आम सहमति से रास्ता निकालने की कोशिश करेंगे। अब देखना यह होगा कि सुवेंदु अधिकारी की नई सरकार इस नाजुक मामले को समझदारी से सुलझा पाती है या यह बंगाल की राजनीति में एक नए टकराव की शुरुआत साबित होगा।

