
'हम ममता नहीं, उनके गुंडों से परेशान थे', बंगाल में सत्ता बदलाव की कहानी
बंगाल चुनाव में ममता बनर्जी को भ्रष्टाचार, दबंगई और जनता से दूरी का भारी नुकसान हुआ। शहरी वोटरों और महिलाओं ने TMC से मुंह मोड़ लिया।
पश्चिम बंगाल में चुनाव नतीजे आए एक हफ्ता बीत चुका है। नई सरकार बन चुकी है, नया मुख्यमंत्री कई बड़े फैसले भी ले चुका है। लेकिन इसके बावजूद बंगाल की जनता अब भी पूर्व मुख्यमंत्री और तृणमूल कांग्रेस प्रमुख ममता बनर्जी को लेकर अपनी नाराजगी खुलकर जाहिर कर रही है।करीब डेढ़ दशक पहले “परिबर्तन” का नारा देकर वाम मोर्चे को सत्ता से हटाने वाली ममता बनर्जी आज खुद जनता के गुस्से का सामना कर रही हैं। चुनाव के बाद लगातार ऐसी घटनाएं सामने आ रही हैं, जहां टीएमसी नेताओं और कार्यकर्ताओं को लोगों के विरोध का सामना करना पड़ा।
टीएमसी सांसद महुआ मोइत्रा को दिल्ली जाने वाली फ्लाइट में “चोर-चोर” के नारों का सामना करना पड़ा। सोशल मीडिया पर कई वीडियो सामने आए हैं, जिनमें स्थानीय लोग टीएमसी नेताओं को घेरते, धक्का देते या विरोध करते दिखाई दे रहे हैं।अब सबसे बड़ा सवाल यही है कि आखिर ऐसा क्या हुआ कि दो साल पहले तक अजेय दिखने वाली ममता बनर्जी की राजनीति अचानक ढह गई। लोकसभा चुनावों के समय तक भी किसी ने इतनी बड़ी हार की कल्पना नहीं की थी। यहां तक कि मतदान से एक दिन पहले तक कई राजनीतिक विश्लेषक भी इस नतीजे की उम्मीद नहीं कर रहे थे। कई उदारवादी टिप्पणीकारों ने एग्जिट पोल को “बीजेपी प्रोपेगेंडा” कहकर खारिज कर दिया था।
खामोश जनता का विस्फोट
इस चुनाव की सबसे खास बात थी जनता की खामोशी। लोगों ने वोट डालने तक अपनी नाराजगी को जाहिर नहीं होने दिया। लेकिन नतीजों के बाद वही दबा हुआ गुस्सा सोशल मीडिया और सड़कों पर दिखाई देने लगा।ममता बनर्जी की राजनीति की सबसे बड़ी ताकत मानी जाती थी शहरी मध्यवर्ग और हर वर्ग की महिलाएं। लेकिन इस बार यही दो तबके सबसे ज्यादा उनसे दूर हो गए।बीजेपी को मिले वोट सिर्फ “बीजेपी के पक्ष” में नहीं थे, बल्कि “ममता विरोधी वोट” ज्यादा थे। ग्रामीण इलाकों में जहां घुसपैठ और आर्थिक लाभ के मुद्दों ने असर डाला, वहीं शहरों में सबसे बड़ा मुद्दा बना “दुर्नीति” यानी भ्रष्टाचार और टीएमसी कार्यकर्ताओं की दबंगई।
“हम ममता को नहीं, उनके गुंडों को वोट दे रहे थे”
कालिघाट, जो ममता बनर्जी का राजनीतिक गढ़ माना जाता है, वहां रहने वाली करीब 60 साल की एक महिला ने धीमी आवाज में कहा कि उसने 2021 तक टीएमसी को वोट दिया था, लेकिन इस बार बीजेपी को वोट दिया। उस महिला ने कहा, “ममता बनर्जी कहती थीं कि हर सीट पर वही उम्मीदवार हैं। हो सकता है वो खुद भ्रष्ट न हों, लेकिन हम वोट आखिर किसे दे रहे थे? उनके गुंडों को।”उसने दावा किया कि उसके परिवार में पुलिस अधिकारी भी हैं और वे भी पार्टी के अंदर फैले भ्रष्टाचार और गुंडागर्दी से परेशान थे।
कालिघाट की ही 46 वर्षीय एक दुकानदार और घरेलू कामगार महिला ने बताया कि उसने 2021 में ही बीजेपी का समर्थन करना शुरू कर दिया था।उसका सवाल था, “एक ही इलाके में दो-दो पार्टी ऑफिस क्यों? शाम होते ही पार्टी कार्यकर्ता पूरा फुटपाथ घेर लेते हैं, आम लोगों को सड़क पर चलना पड़ता है।”
पार्क स्ट्रीट से शुरू हुआ अविश्वास
बालीगंज की रहने वाली एक मीडिया प्रोफेशनल के मुताबिक ममता सरकार की गिरावट की शुरुआत 2012 के पार्क स्ट्रीट रेप केस से हुई थी।उन्होंने कहा, “ममता की सबसे बड़ी गलती थी उस घटना को ‘सजाया हुआ मामला’ बताना और दमयंती सेन जैसी अधिकारी को हटा देना।”दमयंती सेन उस समय कोलकाता पुलिस में जॉइंट कमिश्नर थीं और उन्होंने पार्क स्ट्रीट केस को महज चार दिनों में सुलझा दिया था। उनके मुताबिक RG कर अस्पताल की घटना उसी सड़ांध का विस्तार थी, जिसकी शुरुआत एक दशक पहले हो चुकी थी।
हालांकि उन्होंने बीजेपी को वोट नहीं दिया। उनका कहना था कि वे “भ्रष्ट टीएमसी” और “सांप्रदायिक बीजेपी” दोनों के खिलाफ थीं, इसलिए उन्होंने CPI(M) को वोट दिया। उनके कई दोस्तों ने NOTA चुना।
“अब ममता का नाम भी नहीं सुन सकते”
जादवपुर क्षेत्र की दो बुजुर्ग महिलाओं ने कहा कि उनके पास बीजेपी को वोट देने के अलावा कोई विकल्प नहीं था।एक महिला ने ममता बनर्जी को “राक्षसी” तक कह दिया।एक युवा महिला, जो पहले टीएमसी को वोट देती थी, इस बार बीजेपी के साथ गई। उसने कहा, “हम भ्रष्टाचार और गुंडागर्दी से तंग आ चुके थे।”
भवानीपुर में भी बदल गई हवा
दक्षिण 24 परगना के एक फिजियोथेरेपिस्ट ने बताया कि चुनाव से पहले ही भवानीपुर में बदलाव की हवा महसूस होने लगी थी।उनके मुताबिक, “ममता के घर के पास रहने वाले लोग कह रहे थे कि अब उच्च और मध्यम वर्ग उन्हें वोट नहीं देगा। गुस्सा सालों से जमा हो रहा था।”उन्होंने एक घटना का जिक्र करते हुए कहा कि एक महिला, जिसकी टांग टूटी हुई थी, उसे एंबुलेंस तक पहुंचाने के लिए लोगों को गोद में उठाकर ले जाना पड़ा, क्योंकि सुरक्षा कर्मियों और पार्टी कार्यकर्ताओं ने गाड़ी को गली में आने नहीं दिया।
गांवों में भी बढ़ा गुस्सा
उनका कहना था कि गांवों में टीएमसी नेताओं ने सरकारी आवास योजनाओं का पैसा हड़प लिया।“गरीब लोग देखते रहे कि नेताओं के घर बड़े होते जा रहे हैं, लेकिन उनकी हालत नहीं बदली। उन्होंने चुपचाप बीजेपी को वोट दिया, लेकिन किसी को भनक तक नहीं लगने दी,” उन्होंने कहा।
टीएमसी को आत्ममंथन की जरूरत
टीएमसी अपनी हार के लिए I-PAC, वोटर लिस्ट संशोधन और चुनाव आयोग पर बीजेपी से मिलीभगत जैसे आरोप लगा रही है। लेकिन पार्टी को अब गंभीर आत्ममंथन की जरूरत है।असल वजहें जनता के सामने साफ हैं — भ्रष्टाचार, दबंगई और जनता से दूरी।
कोलकाता और आसपास बदल गया समीकरण
इस चुनाव में कोलकाता और उसके आसपास का राजनीतिक नक्शा पूरी तरह बदल गया।टीएमसी ने कुछ सीटें बचा लीं, लेकिन बीजेपी ने जादवपुर, टॉलीगंज, भवानीपुर, बेहाला और कई अहम सीटों पर जीत दर्ज की। दिलचस्प बात यह रही कि CPI(M) का वोट प्रतिशत कम होने के बावजूद उसने कई सीटों पर “वोट काटने” का काम किया। कई जगह बीजेपी बेहद कम अंतर से जीती, जबकि CPI(M) को हजारों वोट मिले।
जनता की नब्ज से दूर हो गईं ममता?
ममता बनर्जी कभी ऐसी नेता मानी जाती थीं जो सीधे जनता के बीच रहती थीं। कोलकाता की सड़कों से संघर्ष करते हुए सत्ता तक पहुंची ममता को हमेशा जनता की नब्ज पहचानने वाली नेता माना गया।लेकिन विडंबना यह है कि इस बार उन्हें अपने ही गढ़ भवानीपुर में उठ रहे गुस्से का अंदाजा तक नहीं हुआ और शायद यही उनकी सबसे बड़ी राजनीतिक हार है।

