बंगाल की सियासत से अदालत तक, ममता बनर्जी फिर बनीं वकील
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बंगाल की सियासत से अदालत तक, ममता बनर्जी फिर बनीं वकील

चुनावी हार के 10 दिन बाद ममता बनर्जी कोलकाता हाईकोर्ट में वकील के रूप में पहुंचीं। कोर्ट परिसर में उन्हें विरोध और नारेबाजी का भी सामना करना पड़ा।


करीब तीन महीने बाद सुप्रीम कोर्ट में पेश होने और पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनाव में करारी हार झेलने के सिर्फ 10 दिन बाद ममता बनर्जी गुरुवार, 14 मई को एक बार फिर वकील के रूप में अदालत पहुंचीं।इस बार ममता बनर्जी कोलकाता हाईकोर्ट में एक मामले की पैरवी करने पहुंचीं, जो विधानसभा चुनाव के बाद हुई हिंसा से जुड़ा है। मामला राजनीतिक कार्यकर्ताओं और पार्टी कार्यालयों पर हमलों के आरोपों से संबंधित है। सुनवाई मुख्य न्यायाधीश सुजॉय पॉल की अदालत में हुई।

यह याचिका वरिष्ठ टीएमसी सांसद और वकील कल्याण बनर्जी के बेटे शिर्षन्या बंदोपाध्याय ने दायर की है। यह वही चुनाव थे जिनमें 15 साल पुरानी TMC सरकार सत्ता से बाहर हो गई और भाजपा पहली बार बंगाल में सरकार बनाने में सफल रही।

काले गाउन में दिखीं ममता

71 वर्षीय ममता बनर्जी जब काले वकीली गाउन में हाईकोर्ट पहुंचीं तो हर किसी की नजर उन पर टिक गई। हालांकि अदालत से बाहर निकलते वक्त उनका अनुभव सुखद नहीं रहा।ममता ने आरोप लगाया कि कुछ वकीलों ने उनके खिलाफ अभद्र भाषा का इस्तेमाल किया और उन्हें धक्का भी दिया। इसके बाद वह नाराजगी जाहिर करते हुए कोर्ट परिसर से निकल गईं।उनके समर्थकों ने इसे राजनीतिक हार के बाद ममता की नई लड़ाई बताया, जबकि आलोचकों का कहना है कि वह सुर्खियों में बने रहने की कोशिश कर रही हैं।

पहले भी अदालत में लड़ चुकी हैं केस

हालांकि कोर्ट में ममता की यह मौजूदगी नई नहीं है। राजनीति में आने से पहले और उसके बाद भी कई बार उन्होंने खुद अदालत में केस लड़े हैं।

फरवरी 2026 में सुप्रीम कोर्ट पहुंचीं

4 फरवरी 2026 को ममता बनर्जी खुद सुप्रीम कोर्ट पहुंची थीं। उन्होंने पश्चिम बंगाल में चुनाव आयोग द्वारा कराए गए स्पेशल इंटेंसिव रिवीजन (SIR) को चुनौती देने वाली अपनी याचिका पर खुद बहस की थी।उस दौरान भारत के मुख्य न्यायाधीश सूर्य कांत की अध्यक्षता वाली बेंच ने मामले की सुनवाई की थी।

छात्र राजनीति से वकालत तक

ममता बनर्जी ने 1980 के दशक की शुरुआत में कोलकाता के जोगेश चंद्र लॉ कॉलेज से कानून की पढ़ाई की थी। यह कॉलेज कलकत्ता यूनिवर्सिटी से संबद्ध है।1983 में उन्हें यूथ कांग्रेस में शामिल किया गया। उसी दौर में उन्होंने पहली बार वकील का गाउन पहना।

1984 में पहली बड़ी कानूनी लड़ाई

1984 में दक्षिण दिनाजपुर जिले के कुमारगंज में एक स्कूल हेडमास्टर की हत्या हुई थी। उस समय कांग्रेस विपक्ष में थी और यूथ कांग्रेस ने इस हत्या के खिलाफ आंदोलन किया।प्रदर्शन के दौरान कई यूथ कांग्रेस कार्यकर्ताओं को गिरफ्तार कर लिया गया। तब ममता बनर्जी ने बालुरघाट कोर्ट में उनकी जमानत की पैरवी की थी। अदालत ने गिरफ्तार कार्यकर्ताओं को जमानत दे दी थी।

1993 की घटना और ममता की लड़ाई

ममता की दूसरी बड़ी कानूनी लड़ाई 1990 के दशक में सामने आई।21 जुलाई 1993 को उन्होंने कोलकाता में यूथ कांग्रेस के साथ राज्य सचिवालय तक मार्च निकाला था। उनकी मांग थी कि चुनाव में फोटो पहचान पत्र अनिवार्य किया जाए। ममता अक्सर वाम मोर्चा सरकार पर चुनाव में धांधली के आरोप लगाती थीं।यह प्रदर्शन हिंसक हो गया था और पुलिस फायरिंग में 13 लोगों की मौत हुई थी। कई यूथ कांग्रेस कार्यकर्ताओं को भी गिरफ्तार कर लिया गया।1996 में ममता बनर्जी खुद कोलकाता की बैंकशाल कोर्ट पहुंचीं और गिरफ्तार कांग्रेस कार्यकर्ताओं की जमानत की पैरवी की।

दूसरे मामलों में भी कोर्ट पहुंचीं

1990 के दशक में ममता कई बार यूथ कांग्रेस कार्यकर्ताओं के समर्थन में अदालत पहुंचीं। कभी अलीपुर कोर्ट में तो कभी हुगली जिले के चिनसुरा में।एक मामले में पुलिस फायरिंग में मारे गए व्यक्ति के परिवार की ओर से भी उन्होंने अदालत में बहस की थी।

बदला हुआ राजनीतिक माहौल

ममता समर्थकों का कहना है कि उन्होंने आम लोगों के लिए लड़ने की अपनी पुरानी आदत नहीं छोड़ी है।लेकिन हाईकोर्ट के बाहर जिस तरह उन्हें विरोध का सामना करना पड़ा, उससे उनके आलोचक कह रहे हैं कि अब राजनीतिक हालात बदल चुके हैं और ममता के लिए पुराना प्रभाव दोबारा हासिल करना आसान नहीं होगा।

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