Dhiren A Sadokpam

धधक रहा है मणिपुर, शांति समझौतों के दौर में जातीय कत्लेआम की नई चुनौती


धधक रहा है मणिपुर, शांति समझौतों के दौर में जातीय कत्लेआम की नई चुनौती
x
मणिपुर के चूराचांदपुर में कुकी-ज़ो और नागा समुदायों द्वारा गुरुवार, 14 मई को बुलाए गए बंद के कारण सामान्य जनजीवन पूरी तरह ठप हो गया, जिसके बाद लोग सड़क जाम करते हुए। यह बंद बुधवार को कांगपोकपी में तीन चर्च नेताओं और एक नागरिक की हत्या के विरोध में बुलाया गया था। (पीटीआई फोटो)
Click the Play button to hear this message in audio format

अब जमीनी हकीकत पूरी तरह बदल चुकी है। अब दुश्मन केवल राज्य या सरकार नहीं रह गया है। बल्कि अब दुश्मन पड़ोसी बन चुका है।

मई 2026 का मणिपुर संकट एक बड़ी चेतावनी है। रेवरेंड डॉ. वुमथांग सितल्हौ और उनके साथियों की हत्या किसी नई चीज़ की शुरुआत नहीं थी बल्कि यह उस कड़वी सच्चाई का खुलासा था, जो पहले से ही आकार ले रही थी। भारत के पूर्वोत्तर क्षेत्र के संघर्ष के परिदृश्य में इस समय एक निर्णायक बदलाव देखा जा रहा है। मणिपुर में बुधवार, 13 मई 2026 को तीन चर्च नेताओं की हत्या और उसके बाद महज 24 घंटों के भीतर 44 नागरिकों को बंधक बनाए जाने का संकट सिर्फ एक और दुखद घटना नहीं है। यह घटना दर्शाती है कि अंतर-जातीय (इंटर-एथनिक) और आंतरिक-जातीय (इंट्रा-एथनिक) हिंसा का बढ़ता दायरा किस तरह इस पहले से ही संवेदनशील क्षेत्र को और अधिक जटिल बना रहा है। इसके कारण नई दिल्ली और विभिन्न जातीय सशस्त्र आंदोलनों के बीच होने वाले पुराने और परिचित 'वर्टिकल' यानी लंबवत संघर्ष के प्रतिमान रणनीतिक रूप से हाशिए पर चले गए हैं।

दशकों से विश्लेषक पूर्वोत्तर भारत में उग्रवाद को समझने के लिए इसी 'वर्टिकल' चश्मे का इस्तेमाल करते थे, जिसमें मुकाबला राज्य बनाम गैर-राज्य सशस्त्र समूहों, केंद्र बनाम परिधि, या संवैधानिक व्यवस्था बनाम तथाकथित अलगाववादी आकांक्षाओं के बीच होता था। यूनाइटेड लिबरेशन फ्रंट ऑफ असोम (ULFA), नेशनल सोशलिस्ट काउंसिल ऑफ नागालैंड (NSCN) और विभिन्न कुकी-ज़ो उग्रवादी संगठनों जैसे समूहों ने अपने संघर्षों को भारत सरकार के खिलाफ स्वायत्तता, संप्रभुता या क्षेत्रीय पुनर्गठन के इर्द-गिर्द केंद्रित रखा था। नई दिल्ली ने भी इसके जवाब में उग्रवाद विरोधी अभियानों, शांति समझौतों और राजनीतिक समायोजन का सहारा लिया। लेकिन अब वह पूरा ढांचा टूट रहा है। ऐसा इसलिए नहीं है कि राज्य ने जीत हासिल कर ली है। बल्कि इसलिए है क्योंकि अब जमीनी हकीकत पूरी तरह बदल चुकी है। अब दुश्मन केवल राज्य या सरकार नहीं रह गया है बल्कि अब दुश्मन पड़ोसी बन चुका है।

कांगपोकपी में चर्च नेताओं की हत्या और बंधक संकट

बुधवार, 13 मई 2026 को थैडू बैपटिस्ट एसोसिएशन इंटरनेशनल के अध्यक्ष रेवरेंड डॉ. वुमथांग सितल्हौ, रेवरेंड कैगौलुन ल्हूवुम, पादरी पाओगौलेन सितल्हौ और उनके ड्राइवर लेलेन की कांगपोकपी जिले के कोटलेन और कोटज़िम गांवों के बीच इंफाल-तमेंगलोंग राजमार्ग (टाइगर रोड) पर घात लगाकर हत्या कर दी गई। ये सभी लोग चुराचांदपुर में एक शांति और सुलह सम्मेलन से लौट रहे थे। यह एक ऐसा विवरण है, जो इस हमले को केवल एक सामान्य हिंसा की घटना से अलग कर देता है और इसे समुदायों के बीच संवाद की भावना की एक प्रतीकात्मक हत्या में बदल देता है।

चूंकि पीड़ित थैडू चर्च के नेता थे, इसलिए इस जघन्य हत्याकांड की गहन जांच के बाद भी अब तक कुछ खास सामने नहीं आ पाया है। क्योंकि वर्तमान में कोई स्पष्ट सबूत नहीं है कि इस घटना के पीछे कौन से अपराधी हो सकते हैं। इसके बावजूद, इस हमले में एक प्रतिद्वंद्वी समूह के सशस्त्र संगठन के लक्षण साफ दिखाई दे रहे थे। इसके कुछ ही घंटों के भीतर जवाबी कार्रवाई की कूटनीति शुरू हो गई। गुरुवार, 14 मई 2026 तक सेनापति जिले में नागा समूहों द्वारा लगभग 23 कुकी व्यक्तियों को हिरासत में लिए जाने की खबरें आईं। इसके जवाब में, कुकी समूहों द्वारा कोनसाखुल से 18 से 20 नागा ग्रामीणों का अपहरण कर लिया गया और उन्हें लेइलोन वाइफेई क्षेत्र में बंधक बनाकर रखा गया। स्थिति इतनी विकट हो गई कि राज्य के उपमुख्यमंत्री लोसी दिखो को किसी शांति समझौते के लिए उग्रवादी जनरलों से नहीं बल्कि नवजात बच्चों और धार्मिक नेताओं को बंधक बनाकर बैठे जातीय सतर्कता समूहों (विजिलेंट्स) से बातचीत करनी पड़ी। यह कोई 'वर्टिकल' संघर्ष नहीं है बल्कि यह सीधे तौर पर एक 'हॉरिजॉन्टल' यानी क्षैतिज कत्लेआम है।

समानंतर जातीय युद्ध से पैदा हुई 3 मुख्य कूटनीतिक जटिलताएं

कांगपोकपी घात लगाकर किए गए हमले की जिम्मेदारी किसी बड़े सशस्त्र समूह ने नहीं ली है। उग्रवाद का जो पारंपरिक तरीका होता था, जिसमें मांग, धमकी, संघर्षविराम और फिर संवाद शामिल होता था, वह यहां पूरी तरह गायब है। अंतर-जातीय और आंतरिक-जातीय संघर्षों का यह बढ़ता स्तर तीन ऐसी तात्कालिक जटिलताओं को जन्म दे रहा है जो 'वर्टिकल' संघर्षों में शायद ही कभी दिखाई देती थीं...

पहला, नए हिंसक गुटों और संगठनों की बहुलता: पारंपरिक वर्टिकल संघर्षों में आमतौर पर सीमित संख्या में सशस्त्र समूह शामिल होते थे, जिनका एक पहचान योग्य कमांड स्ट्रक्चर, राजनीतिक विंग और कूटनीतिक मांगें होती थीं। इसके विपरीत, हॉरिजॉन्टल जातीय संघर्ष गैर-राज्य संगठनों की बाढ़ ला देते हैं। इनमें ग्राम रक्षा समितियां, युवा स्वयंसेवक संगठन, छात्र संगठन, जातीय आधार पर बने मिलिशिया और अचानक तैयार होने वाले सतर्कता बल शामिल हैं। कुकी स्टूडेंट्स ऑर्गनाइजेशन और थैडू समुदाय के जिन समूहों ने कांगपोकपी और चुराचांदपुर में अनिश्चितकालीन बंद लागू किया है, वे अब सुलह की नहीं बल्कि जवाबी कार्रवाई की बात कर रहे हैं। उनका मुख्य तर्क अपनी जाति और समुदाय का अस्तित्व बचाना है, न कि राज्य से किसी प्रकार की राजनीतिक मान्यता प्राप्त करना। इस समय उनसे बातचीत करना धुएं को इकट्ठा करने जैसा है।

दूसरा, राज्य के नियंत्रण और निवारक क्षमता का पतन: वर्टिकल संघर्षों में सैद्धांतिक रूप से राज्य के पास वैध हिंसा पर एकाधिकार होता है, भले ही व्यवहार में उसे चुनौती मिलती रहे। वहां जवाबी कार्रवाई नपी-तुली होती है। हॉरिजॉन्टल जातीय युद्धों में जवाबी कार्रवाई तत्काल, विकेंद्रीकृत और लगातार बढ़ने वाली होती है। मणिपुर का यह बंधक संकट, जहां कई स्थानों पर 44 नागरिकों को पकड़कर रखा गया है, यह साबित करता है कि कैसे लक्षित हत्याएं बहुत तेजी से अपहरण की एक पूरी श्रृंखला को जन्म दे सकती हैं। इस तनाव को कम करने का आदेश देने के लिए कोई केंद्रीय कमान नहीं है। हर एक अपहरण दूसरे अपहरण को जन्म देता है और हर एक हत्या के बदले खून की मांग की जाती है।

तीसरा, आम नागरिकों की सुरक्षा और उनके अधिकारों का पूर्ण खात्मा: पारंपरिक वर्टिकल संघर्ष अपनी तमाम क्रूरता के बावजूद लड़ाकों और आम नागरिकों के बीच एक बारीक अंतर बनाए रखते थे। सशस्त्र समूह आमतौर पर सुरक्षा बलों या राज्य के बुनियादी ढांचे को निशाना बनाते थे और नागरिक केवल अनजाने में हुए नुकसान (कोलैटरल डैमेज) का हिस्सा बनते थे। हॉरिजॉन्टल जातीय युद्ध में आम नागरिक ही मुख्य युद्धक्षेत्र बन जाते हैं। शांति का संदेश देने वाले चर्च नेताओं की सरेआम हत्या कर दी जाती है, आम लोगों को बंधक बना लिया जाता है और पड़ोसियों द्वारा ही ग्रामीणों को घेर लिया जाता है। लड़ाकू और नागरिक के बीच की रेखा पूरी तरह समाप्त हो जाती है क्योंकि व्यक्ति की जातीय पहचान ही उसका एकमात्र पहनावा बन जाती है।

पारंपरिक दिल्ली-केंद्रित शांति वार्ताओं का अप्रासंगिक होना

यह पूरी स्थिति नई दिल्ली और इस क्षेत्र के जातीय राजनीतिक सशस्त्र आंदोलनों के बीच दशकों से चल रहे पारंपरिक संघर्ष को हाशिए पर धकेल देती है। राज्य सरकार अब केवल संकट प्रबंधन तक सीमित रह गई है, जिसका काम राष्ट्रीय राजमार्गों की नाकेबंदी करना, सुरक्षा कड़ी करना और बंधकों की रिहाई के लिए गुहार लगाने के लिए एक उपमुख्यमंत्री को भेजना मात्र रह गया है। मुख्यमंत्री युमनाम खेमचंद सिंह ने इस हमले को एक "कायरतापूर्ण आतंकवादी कृत्य" कहा और न्याय का वादा किया, लेकिन सवाल यह है कि न्याय किसके खिलाफ किया जाए। अपराधियों की आधिकारिक तौर पर पहचान नहीं हो पाई है क्योंकि वे जातीय शत्रुता का एक बदलता हुआ ताना-बाना हैं।

भारत सरकार ने जिन शांति समझौतों में दशकों से निवेश किया है, जैसे कि नागा शांति प्रक्रिया या कुकी सस्पेंशन ऑफ ऑपरेशन (SoO) और अन्य समझौते, वे सभी वर्टिकल संघर्षों को समाप्त करने के लिए बनाए गए थे। उनमें यह मान लिया गया था कि यदि राज्य राजनीतिक मांगों को पूरा कर दे, तो हिंसा थम जाएगी। लेकिन हॉरिजॉन्टल जातीय संघर्ष राजनीतिक मांगों से संचालित नहीं होते। वे जमीन, इतिहास की कड़वी यादों, जनसांख्यिकी (डेमोग्राफी) और अपनी जातीय सुरक्षा के कच्चे गणित से चलते हैं। दिल्ली में हस्ताक्षरित कोई भी समझौता इस बुनियादी समस्या का समाधान नहीं कर सकता कि सेनापति जिले में नागा और कुकी गांव एक-दूसरे को अपने अस्तित्व के लिए खतरा क्यों मानते हैं।

हिंसा का अंतहीन चक्र और भारत सरकार के सामने नई चुनौती

इस पूरे परिदृश्य में सबसे खतरनाक पहलू हॉरिजॉन्टल और वर्टिकल संघर्षों के बीच बनने वाला एक अंतहीन फीडबैक लूप है। जैसे-जैसे अंतर-जातीय हिंसा तेज होती है, पारंपरिक सशस्त्र समूहों की प्रासंगिकता और वैधता खत्म होने लगती है। जब स्थानीय नागा या कुकी सतर्कता समूह खुद ही नागरिकों को बंधक बना रहे हों, तो कोई एनएससीएन या किसी अन्य संगठन से बातचीत क्यों करेगा? इसके उलट, जातीय ब्लॉकों के भीतर अल्पसंख्यक समुदायों की रक्षा करने में राज्य की असमर्थता आगे चलकर और अधिक हॉरिजॉन्टल लामबंदी को बढ़ावा देती है। जो कुकी नागरिक खुद को मणिपुर सरकार द्वारा असुरक्षित महसूस करेंगे। वे दिल्ली की ओर नहीं देखेंगे बल्कि वे अपनी कुकी रक्षा समितियों की शरण में जाएंगे। इसी तरह जो नागा ग्रामीण कुकी सशस्त्र समूहों के हाथों अपने परिवार के सदस्यों को खो देंगे, वे किसी एनएससीएन के राजनीतिक समाधान का इंतजार नहीं करेंगे बल्कि वे खुद हथियार उठा लेंगे।

इस अशांत माहौल में पुराना वर्टिकल संघर्ष पूरी तरह से अप्रासंगिक हो जाता है। जो सशस्त्र राजनीतिक आंदोलन कभी बड़े अभियानों के माध्यम से ध्यान आकर्षित करते थे, वे अब सड़कों पर उतरने वाली इन जातीय सेनाओं के सामने पीछे छूट गए हैं। नई दिल्ली के पास, जिसने दशकों तक केवल उग्रवाद विरोधी अभियानों और शांति प्रक्रियाओं के व्याकरण को सीखा है, इस नए हॉरिजॉन्टल जातीय युद्ध से निपटने के लिए कोई प्रशासनिक शब्दावली नहीं है। राजमार्गों की नाकेबंदी खोलना और बंद का आह्वान करना कोई दीर्घकालिक रणनीति नहीं है, बल्कि यह प्रशासनिक लाचारी की स्वीकारोक्ति है।

पूर्वोत्तर भारत में चाहे वह मणिपुर हो, असम हो, नागालैंड हो या मेघालय हो, संघर्ष का केंद्र अब राज्य बनाम उग्रवादी से बदलकर पड़ोसी बनाम पड़ोसी और राजनीतिक बातचीत से बदलकर जातीय विनाश की ओर जा रहा है। नई दिल्ली अब शांति समझौतों को अंतिम पड़ाव मानने की भूल नहीं कर सकती। असली काम बेहद थकाऊ, चकाचौंध से दूर और पूरी तरह से स्थानीय स्तर पर हॉरिजॉन्टल फैलाव को रोकना है। इसका अर्थ केवल उग्रवादी समूहों का ही नहीं बल्कि नागरिक मिलिशिया और स्थानीय सशस्त्र समूहों का भी पूरी तरह से निरस्त्रीकरण करना है। इसके लिए केवल स्वायत्तता पैकेज देना काफी नहीं है। बल्कि भूमि और संसाधनों का सही वितरण करना होगा। भारत सरकार को अब यह समझना होगा कि पूर्वोत्तर में राज्य का सबसे खतरनाक दुश्मन अब घोषणापत्र लेकर घूमने वाला कोई सशस्त्र क्रांतिकारी नहीं है। बल्कि वह हथियारबंद ग्रामीण हैं, जिसके मन में गहरी शिकायतें और असुरक्षा की भावना है। लंबवत संघर्ष अब हाशिए पर जा चुका है और यदि राज्य अभी भी वहीं समाधान ढूंढता रहा तो वह अपने पैरों के पास सुलगती हुई इस नई आग को देखने में पूरी तरह चूक जाएगा।

Next Story