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फिर टूटी शांति की आशा, 3 साल बाद नई हिंसा से दहल उठा मणिपुर


फिर टूटी शांति की आशा, 3 साल बाद नई हिंसा से दहल उठा मणिपुर
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फाइल फोटो।
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मणिपुर का संकट अब अपने सबसे खतरनाक चरण में पहुंच गया है। मुख्यमंत्री ने इसे "सैन्यीकृत आतंक के माध्यम से शांति प्रयासों को जानबूझकर बाधित करने का अभियान" कहा है

29 अप्रैल को, मणिपुर को झकझोर देने वाली जातीय हिंसा की तीसरी बरसी से कुछ दिन पहले, मुख्यमंत्री युमनाम खेमचंद सिंह ने लांगथाबाल निर्वाचन क्षेत्र में एक सभा के दौरान एक चौंकाने वाला आरोप लगाया। उन्होंने कहा कि 7 अप्रैल को ट्रोंगलाओबी गांव में हुआ भयानक रॉकेट हमला, जिसमें दो छोटे भाई-बहनों (एक पांच साल का लड़का और उसकी पांच महीने की बहन) की मौत हो गई थी, कोई आकस्मिक हिंसा नहीं थी। मुख्यमंत्री के अनुसार, यह "उन समूहों की करतूत थी, जो राज्य को अस्थिर करने और चल रहे शांति प्रयासों में बाधा डालने की कोशिश कर रहे हैं।" उन्होंने स्पष्ट रूप से कहा, "हमारा मानना ​​है कि यह घटना उन लोगों द्वारा रची गई होगी, जो एक लोकप्रिय सरकार का गठन नहीं चाहते थे या जो राज्य में अस्थिर माहौल बनाए रखना चाहते हैं।"

यह बयान एक ऐसे नेता की ओर से आया है, जिसने एक साल के राष्ट्रपति शासन के बाद 4 फरवरी, 2026 को पदभार संभाला है। आज के मणिपुर के दुखद विरोधाभास को दर्शाता है। ठीक उसी समय जब राजनीतिक सामान्य स्थिति लौट रही है और "शांति की यात्रा" शुरू हुई है, सशस्त्र समूह इसे चकनाचूर करने पर आमादा दिखाई दे रहे हैं। पिछले तीन वर्षों में, राज्य में हिंसा और तनाव की प्रकृति के बारे में बहुत कुछ कहा गया है। हालांकि, ट्रोंगलाओबी हमले की अमानवीय घटना के साथ, मणिपुर का संकट अपने सबसे खतरनाक दौर में प्रवेश कर गया है।

उकसावे के रूप में पेश की गई शांति

मुख्यमंत्री का यह नजरिया महत्वपूर्ण है। क्योंकि यह हिंसा को स्वतःस्फूर्त 'जातीय क्रोध' के बजाय 'सोची-समझी राजनीतिक साजिश' के रूप में परिभाषित करता है। उन्होंने ट्रोंगलाओबी हत्याकांड को एक विशिष्ट राजनीतिक समयरेखा (Timeline) में रखा: पूर्व मुख्यमंत्री एन. बीरेन सिंह के इस्तीफे के बाद 13 फरवरी, 2025 से मणिपुर राष्ट्रपति शासन के अधीन था। फिर 4 फरवरी, 2026 को केंद्रीय शासन को हटाना और एक लोकप्रिय सरकार की स्थापना करना, जैसा कि उन्होंने जोर दिया, "जनता की आवाज के माध्यम से" लोकतांत्रिक सामान्य स्थिति को बहाल करने के लिए था।

युमनाम खेमचंद ने कहा कि उन्होंने इस पद के लिए पैरवी नहीं की थी और उन्हें चुने जाने की उम्मीद भी नहीं थी। उन्होंने आगे कहा कि उनकी सरकार का ध्यान विधायकों और नागरिक समाज के साथ व्यापक जुड़ाव के साथ-साथ जिरीबाम, सेनापति, कांगपोकपी और उखरुल सहित पहाड़ी जिलों के दौरों के माध्यम से "शांति की यात्रा" पर रहा है। ट्रोंगलाओबी विस्फोट "जिरीबाम की उनकी यात्रा के ठीक बाद" हुआ, जिसे उन्होंने नाजुक शांति प्रक्रिया को पटरी से उतारने का एक "दुर्भाग्यपूर्ण" प्रयास बताया।

यह केवल राजनीतिक बयानबाजी नहीं है। यह 'फेडरेशन ऑफ सिविल सोसाइटीज' (FOCS) द्वारा गृह मंत्रालय को महीनों पहले दिए गए विश्लेषण से मेल खाता है। फिर 27 मई, 2025 को FOCS ने चेतावनी दी थी कि यह संघर्ष अब नागरिक अशांति नहीं बल्कि "ग्रे-जोन वारफेयर" (grey-zone warfare) रणनीति का उपयोग करने वाला एक संगठित सैन्य अभियान है। मुख्यमंत्री के बयान से संकेत मिलता है कि इस संगठित हिंसा का अब एक रणनीतिक उद्देश्य है- एक ऐसी सरकार को रोकना, जो समुदायों के बीच सुलह कराने में सफल हो सके।

ऐसे बढ़ती गई हिंसा

पिछले तीन वर्षों के घटनाक्रम और अधिकारियों के सामने खड़ी चुनौतियों को समझने के लिए FOCS द्वारा प्रलेखित हिंसा के प्रक्षेपवक्र (Trajectory) को देखना आवश्यक है...

मई 2023: नागरिक अशांति दंगों और आगजनी में बदल गई।

22 मई 2023 के बाद: संघर्ष "भीड़ की हिंसा से अधिक संगठित और सैन्यीकृत मुठभेड़ों" में बदल गया। इसमें पारंपरिक युद्ध की तरह क्षेत्र चिह्नित करना, बुनियादी ढांचे का विकास और बंकरों व किलेबंदी का निर्माण देखा गया।

सितंबर 2024: कौत्रुक और कदंगबंद में ड्रोन बमबारी, जिसकी बाद में एनआईए (NIA) ने पुष्टि की—एक "निर्णायक मोड़" साबित हुई।

6 सितंबर 2024: मोइरांग में रॉकेट हमले में एक 70 वर्षीय व्यक्ति की मौत।

7 अप्रैल, 2026 को ट्रोंगलाओबी पर हुआ हमला इसी सैन्यीकृत हिंसा का रक्तरंजित चरमोत्कर्ष है। घटना के दिन, संदिग्ध सशस्त्र लोगों ने एक रॉकेट दागा, जिसने एक नागरिक आवास को निशाना बनाया। वह मिसाइल खिड़की के रास्ते घर के अंदर घुसी, जिससे दो बच्चों की मौत हो गई और उनकी मां गंभीर रूप से घायल हो गई।

रणनीतिक चूक और हथियारों का निर्माण

विशेषज्ञों द्वारा लगातार पर्याप्त चेतावनी दी गई थी कि शांति और सामान्य स्थिति बहाल करने का कोई भी कदम "गलत आकलन वाले संयम" (Miscalculated restraint) पर आधारित नहीं होना चाहिए। यदि यह संयम "हथियार बनाने वाली इकाइयों" को नष्ट करने और सशस्त्र उपद्रवी तत्वों को निशस्त्र करने में विफल रहता है तो शांति संभव नहीं है। ट्रोंगलाओबी में इस्तेमाल किया गया बम या रॉकेट, जो कि एक निर्मित विस्फोटक था, न कि कोई कामचलाऊ हथियार, यह साबित करता है कि वे इकाइयां अभी भी सक्रिय हैं। यह इस बात का भी प्रमाण है कि केंद्रीय सुरक्षा बलों की मौजूदगी के बावजूद उग्रवादियों के पास राज्य में कहीं भी हमला करने की क्षमता और मंशा दोनों मौजूद हैं।

हथियार के रूप में 'नैरेटिव' (कथानक)

सरकार कार्रवाई करने में इतनी सुस्त क्यों रही है? वह "पुराना नैतिक नजरिया" (Outdated moral lens) अब तक क्यों बना हुआ है? इंफाल स्थित MAPAAL (मीडिया एंड पॉलिसी एनालिसिस लोइसांग) द्वारा प्रकाशित 2024 के एक अभूतपूर्व अध्ययन, 'नेशनल मीडिया एंड द मणिपुर मेहेम: द फोर्थ एस्टेट एज अ साइट ऑफ इंफॉर्मेशन वॉर' ने इसका एक सटीक और गंभीर स्पष्टीकरण दिया है। अध्ययन का तर्क है कि "राष्ट्रीय" मीडिया ने "कम रिपोर्टिंग और संदर्भहीनता (Decontextualization) के माध्यम से संरचनात्मक हिंसा" को बढ़ावा दिया है।

इस अध्ययन के निष्कर्षों ने एक विकृत नैतिक परिदृश्य की ओर इशारा किया, जहां एक समुदाय की हिंसा को 'शोषक और शोषित' के घिसे-पिटे द्वंद्व (Binary) के नाम पर व्यवस्थित रूप से कम करके दिखाया गया। इससे जुड़ा एक पहलू यह भी है कि राष्ट्रीय मीडिया ने एक समुदाय को 'पीड़ित' और दूसरे को 'अपराधी' के रूप में असंतुलित तरीके से पेश किया और इस दौरान दोनों तरफ से होने वाली हिंसा की उपेक्षा की गई। अध्ययन में 'एडिटर्स गिल्ड ऑफ इंडिया' (EGI) की विवादास्पद रिपोर्ट की भी आलोचना की गई है, जिसमें गिल्ड को "गलत सूचना फैलाने में शामिल" और "नई दिल्ली की दुविधापूर्ण स्थिति के साथ संरेखित" बताया गया है।

यह कोई गौण मुद्दा नहीं है। जब राष्ट्रीय मीडिया एक समुदाय को स्थायी पीड़ित और दूसरे को स्थायी हमलावर के रूप में चित्रित करता है तो यह सरकार पर उसी "पुराने नैतिक नजरिये" को अपनाने का राजनीतिक दबाव बनाता है, जिसकी निंदा की जानी चाहिए। ऐसे में उन सशस्त्र समूहों के खिलाफ आक्रामक उग्रवाद-विरोधी अभियान (Counter-insurgency operations) चलाना लगभग असंभव हो जाता है, जिन्हें देश के सबसे शक्तिशाली समाचार पत्रों और समाचार चैनलों द्वारा "पीड़ित" घोषित कर दिया गया हो।

परिचालन रणनीति की विफलता

मुख्यमंत्री युमनाम खेमचंद का एकता का आह्वान और उनका यह वादा कि "हम जिम्मेदार लोगों को पकड़ लेंगे, उनके पास भागने की कोई जगह नहीं है" नेक है। लेकिन एक बढ़ती आलोचना बताती है कि रणनीतिक बदलाव के बिना ये पर्याप्त नहीं होंगे। पहले ही चेतावनी दी जा चुकी है कि "एजेंसियों के बीच खंडित समन्वय" और "सक्रिय के बजाय केवल प्रतिक्रियावादी रणनीतियां" इस व्यवस्था की मुख्य कमियां हैं।

ट्रोंगलाओबी हमले के तुरंत बाद की स्थिति इसे स्पष्ट रूप से दर्शाती है। घाटी में सुरक्षा व्यवस्था को काफी कड़ा किए जाने की खबरों के बाद भी, जिसे कई लोगों ने बहुत देर से उठाया गया कदम माना। सड़कों पर गुस्सा फूट पड़ा। आक्रोशित भीड़ ने रैलियां निकालीं जिससे हिंसा और तनाव पैदा हुआ। एक सप्ताह से अधिक समय तक, नागरिकों और केंद्रीय व राज्य बलों के बीच झड़पों के कारण घाटी युद्ध के मैदान में बदल गई। हालांकि, सार्वजनिक आक्रोश मणिपुर की प्राथमिकताओं की स्पष्ट समझ प्रदान करने में विफल रहा। पैटर्न अभी भी स्पष्ट है, सशस्त्र व्यक्ति हमला करते हैं, नागरिक मरते हैं, सार्वजनिक आक्रोश भड़कता है और सुरक्षा प्रतिक्रियाएं केवल प्रतिक्रियावादी बनी रहती हैं।

चुनौतियां और रणनीतिक बदलाव की आवश्यकता

मुख्यमंत्री ने इस चुनौती को अप्रत्यक्ष रूप से तब स्वीकार किया, जब उन्होंने गौर किया कि "सभी समुदायों के लोगों ने शांति और स्थिरता के लिए तीव्र इच्छा व्यक्त की है।" उन्होंने नागरिकों से "एकजुट रहने और विभाजन पैदा करने वाले तत्वों के खिलाफ सतर्क रहने" का आग्रह किया। लेकिन अब सरकार को "जोखिम से बचने वाले दृष्टिकोण" (Risk-averse approach) को छोड़कर उग्रवादी नेटवर्क को ध्वस्त करने और सीमावर्ती क्षेत्रों को सुरक्षित करने के लिए "एकीकृत, खुफिया-आधारित ऑपरेशनों" की ओर बढ़ना होगा। शांति की रक्षा केवल सतर्कता से नहीं की जा सकती। इसके लिए उन लोगों के आक्रामक और निवारक खात्मे (Pre-emptive neutralisation) की आवश्यकता है, जो पांच महीने के शिशुओं के खिलाफ रॉकेट और प्रोजेक्टाइल जैसे हथियारों का इस्तेमाल करते हैं।

दोराहे पर खड़ा राज्य

3 मई 2023 के तीन साल बाद, मणिपुर एक गहरे रसातल के मुहाने पर खड़ा है। मुख्यमंत्री के पास उन ताकतों की कुछ समझ दिखाई देती है, जो उनके कदमों को बाधित कर सकते हैं। उन्होंने उन "तत्वों" की पहचान कर ली है, जो अराजकता से लाभ उठाते हैं और जो एक लोकप्रिय सरकार की शांति पहल को अपने लिए खतरे के रूप में देखते हैं। लेकिन यह स्पष्ट रहे कि केवल किसी का "नाम लेना" ही उन्हें निष्प्रभावी करना नहीं है। वास्तव में यह उनके अपने रास्ते को और अधिक जटिल बना सकता है।

आगे का रास्ता रणनीतिक बदलाव की मांग करता है, जहां प्रतिक्रियावादी संयम की जगह सशस्त्र क्षमताओं को खत्म करने के लिए पूर्व-निवारक और एकीकृत कार्रवाई की जाए। केंद्र सरकार को उस "पुराने पड़ चुके विक्टिमहुड फ्रेम" (पीड़ित होने का ढांचा) को खारिज करना होगा, जिसने यथार्थवादी दृष्टिकोण अपनाने की उसकी क्षमता को पंगु बना दिया है। राज्य और नागरिक समाज को उस "एपिस्टेमिक इंजस्टिस" (ज्ञान संबंधी अन्याय) का सक्रिय रूप से मुकाबला करना होगा, जिसे सामूहिक विचारधाराओं के मुखौटे में छिपे विरोधाभासी विचारों के माहिर खिलाड़ियों (Spin doctors) या अंतहीन विमर्शों और प्रति-विमर्शों (Narratives and counter-narratives) द्वारा बढ़ावा दिया जा रहा है।

शांति का अर्थ

"शांति की यात्रा" जारी रहनी चाहिए। लेकिन इस समझ के साथ कि शांति 'पदों और स्थितियों' का युद्ध है। ट्रोंगलाओबी में मारे गए दो मासूम बच्चों का खून केवल दुख और विरोध प्रदर्शन से कहीं अधिक की मांग करता है। यह मांग करता है कि मणिपुर की सरकार और भारत का केंद्रीय नेतृत्व अंततः यह स्वीकार करे कि यह अब कोई जातीय दंगा या नागरिक अशांति मात्र नहीं है। यह शांति को रोकने के लिए चलाया जा रहा एक सशस्त्र अभियान है। और इसका मुकाबला एक ऐसे राज्य की पूर्ण, बिना किसी हिचकिचाहट वाली और पूर्व-निवारक शक्ति के साथ किया जाना चाहिए, जो अंततः यह समझ चुका है कि वह किस लिए लड़ रहा है: राज्य के प्रत्येक नागरिक का अधिकार।

(The Federal स्पेक्ट्रम के सभी पक्षों के विचार और राय प्रस्तुत करने का प्रयास करता है। लेख में दी गई जानकारी, विचार या राय लेखक के हैं और वे आवश्यक रूप से The Federal के विचारों को प्रतिबिंबित नहीं करते हैं।)

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