बंगाल की राजनीति में क्यों खास है रायटर्स बिल्डिंग और नबन्ना?
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बंगाल की राजनीति में क्यों खास है रायटर्स बिल्डिंग और नबन्ना?

बंगाल में बीजेपी की जीत के बाद बंगाल में सत्ता के प्रतीक बदलने लगे हैं। नबन्ना छोड़ रायटर्स बिल्डिंग को फिर सत्ता का केंद्र बनाने की तैयारी तेज है।


पश्चिम बंगाल की राजनीति में एक बार फिर परिवर्तन की चर्चा तेज हो गई है। कभी ममता बनर्जी ने 34 साल पुराने वाम मोर्चा शासन के खिलाफ परिवर्तन का नारा दिया था, और अब बीजेपी उसी अंदाज में तृणमूल कांग्रेस की डेढ़ दशक पुरानी सत्ता को चुनौती देती नजर आ रही है। चुनाव नतीजों के बाद राज्य की सत्ता संरचना, प्रशासनिक केंद्र और राजनीतिक प्रतीकों में बदलाव के संकेत मिलने लगे हैं।

सत्ता परिवर्तन के साथ बदलता पावर सेंटर

बीजेपी की जीत के बाद प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने दिल्ली स्थित बीजेपी मुख्यालय में कहा था, “बंगाल में बदला नहीं, बदलाव की जीत हुई है।” अब यह बदलाव प्रशासनिक ढांचे में भी दिखाई देने लगा है। शुभेंदु अधिकारी के नेतृत्व में मिली जीत के बाद राज्य सचिवालय में केंद्रीय बलों की तैनाती की गई है ताकि सरकारी रिकॉर्ड और संपत्तियां सुरक्षित रहें। बीजेपी के प्रदेश अध्यक्ष समिक भट्टाचार्य ने दावा किया कि उनकी पार्टी पहले ही स्पष्ट कर चुकी थी कि सत्ता में आने के बाद सरकार फिर से रायटर्स बिल्डिंग से चलाई जाएगी। इसी सिलसिले में उन्होंने कार्यवाहक मुख्य सचिव दुश्यंत नारियाला से नबन्ना में मुलाकात भी की। माना जा रहा है कि बैठक में सचिवालय को वापस कोलकाता स्थित रायटर्स बिल्डिंग में ले जाने को लेकर चर्चा हुई।

रायटर्स बिल्डिंग फिलहाल पूरी तरह तैयार नहीं

रायटर्स बिल्डिंग को तत्काल प्रशासनिक केंद्र बनाना आसान नहीं होगा। लोक निर्माण विभाग के अनुसार, इमारत के जीर्णोद्धार का केवल 25 प्रतिशत काम ही पूरा हुआ है और पूरी मरम्मत में अभी 6 से 8 महीने का समय लग सकता है। सुरक्षा कारणों से मुख्यमंत्री और मंत्रियों का वहां स्थायी रूप से बैठना अभी संभव नहीं माना जा रहा। ऐसे में संभावना जताई जा रही है कि नई सरकार अस्थायी तौर पर विधानसभा विस्तार भवन से कामकाज संचालित करे। रिपोर्टों के मुताबिक नई सरकार का शपथ ग्रहण 9 मई को ब्रिगेड परेड ग्राउंड में हो सकता है, जिसके बाद मुख्यमंत्री रायटर्स बिल्डिंग जाकर औपचारिक रूप से कार्यभार संभाल सकते हैं।

वाम मोर्चा का शक्ति केंद्र था रायटर्स बिल्डिंग

1977 से 2011 तक वाम मोर्चा सरकार ने रायटर्स बिल्डिंग से ही शासन चलाया। तत्कालीन मुख्यमंत्री ज्योति बसु और बुद्धदेव भट्टाचार्य का पूरा प्रशासनिक तंत्र इसी ऐतिहासिक इमारत से संचालित होता था। रायटर्स बिल्डिंग केवल सचिवालय नहीं, बल्कि वाम राजनीति का प्रतीक बन चुकी थी। राजनीतिक हलकों में कहा जाता था कि “अगर बंगाल की राजनीति समझनी हो, तो रायटर्स के गलियारों की हवा समझनी होगी।”

ममता बनर्जी ने नबन्ना को बनाया नया सत्ता केंद्र

2011 में सत्ता में आने के बाद ममता बनर्जी ने शुरुआत में रायटर्स बिल्डिंग से कामकाज संभाला, लेकिन 2013 में सचिवालय को नबन्ना स्थानांतरित कर दिया। उन्होंने रायटर्स बिल्डिंग को पुरानी और असुरक्षित बताते हुए कहा था कि कर्मचारियों की सुरक्षा के लिए यह कदम जरूरी है। हालांकि शुरुआत में इसे अस्थायी व्यवस्था कहा गया था, लेकिन बाद में नबन्ना ही स्थायी सचिवालय बन गया।राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि ममता बनर्जी रायटर्स बिल्डिंग को वामपंथी शासन की पहचान मानती थीं और उसी प्रतीक से दूरी बनाने के लिए उन्होंने नबन्ना को नया सत्ता केंद्र बनाया।

अब बीजेपी नबन्ना को तृणमूल कांग्रेस शासन का प्रतीक मान रही है और सत्ता प्रतिष्ठान को फिर से रायटर्स बिल्डिंग में ले जाने की तैयारी कर रही है।यह वही रणनीति है जो कभी ममता बनर्जी ने वाम मोर्चा के खिलाफ अपनाई थी। फर्क सिर्फ इतना है कि अब राजनीतिक भूमिका बदल चुकी है।

रायटर्स बिल्डिंग का इतिहास और विरासत

करीब 250 साल पुरानी रायटर्स बिल्डिंग का निर्माण 1777 में ईस्ट इंडिया कंपनी ने कराया था। इसका डिजाइन वास्तुकार थॉमस लियोन ने तैयार किया था।शुरुआत में यह इमारत ईस्ट इंडिया कंपनी के जूनियर क्लर्कों के लिए बनाई गई थी, जिन्हें “राइटर्स” कहा जाता था। इसी वजह से इसका नाम “रायटर्स बिल्डिंग” पड़ा।

लाल रंग की यह तीन मंजिला इमारत लंबे समय तक बंगाल की सत्ता का केंद्र रही, जबकि दूसरी ओर नबन्ना एक आधुनिक 14 मंजिला इमारत है, जिसे पहले HRBC (Hooghly River Bridge Commissioners) बिल्डिंग के रूप में इस्तेमाल किया जाता था। राजनीतिक रंगों की बात करें तो रायटर्स बिल्डिंग का लाल रंग वाम मोर्चा की विचारधारा से जोड़ा जाता था, जबकि नबन्ना का नीला-सफेद रंग ममता बनर्जी की पसंद माना जाता है। अब चर्चा है कि बीजेपी शासन में इसमें भगवा रंग का प्रभाव भी दिखाई दे सकता है।

‘बैटल ऑफ रायटर्स बिल्डिंग’: स्वतंत्रता आंदोलन की गूंज

8 दिसंबर 1930 को रायटर्स बिल्डिंग भारतीय स्वतंत्रता संग्राम के एक ऐतिहासिक अध्याय की गवाह बनी। क्रांतिकारी बेनॉय बसु, बादल गुप्ता और दिनेश गुप्ता ने यूरोपीय पोशाक पहनकर रायटर्स बिल्डिंग में प्रवेश किया और ब्रिटिश अधिकारी कर्नल एन.एस. सिम्पसन पर हमला कर दिया, जो राजनीतिक कैदियों पर अत्याचार के लिए कुख्यात था। सिम्पसन की हत्या के बाद बिल्डिंग में घंटों मुठभेड़ चली। गिरफ्तारी से बचने के लिए बादल गुप्ता ने सायनाइड खा लिया, जबकि बिनॉय और दिनेश ने खुद को गोली मार ली। बाद में दिनेश गुप्ता को गिरफ्तार कर फांसी दे दी गई।

रायटर्स बिल्डिंग के सामने इन तीनों क्रांतिकारियों की प्रतिमाएं लगी हुई हैं और बीबीडी बाग का नाम भी इनके नामों के प्रथम अक्षरों बेनॉय, बादल और दिनेश पर रखा गया है।

भूतिया कहानियों से भी जुड़ा है रायटर्स बिल्डिंग का नाम

रायटर्स बिल्डिंग को कोलकाता की चर्चित हॉन्टेड इमारतों में भी गिना जाता है। लंबे गलियारों, बंद कमरों और रात में सुनाई देने वाली रहस्यमयी आवाजों को लेकर कई किस्से मशहूर हैं। कुछ सुरक्षा गार्डों ने दावा किया कि उन्होंने रात में पुराने जमाने के कपड़े पहने लोगों को देखा या अजीब संगीत सुना। हालांकि इन दावों की कभी आधिकारिक पुष्टि नहीं हुई, लेकिन ये कहानियां इमारत की रहस्यमयी छवि को और मजबूत करती हैं।

ममता बनर्जी और रायटर्स बिल्डिंग का पुराना विवाद

7 जनवरी 1993 को ममता बनर्जी एक मूक-बधिर बलात्कार पीड़िता के साथ तत्कालीन मुख्यमंत्री ज्योति बसु से मिलने रायटर्स बिल्डिंग पहुंची थीं। आरोप था कि राजनीतिक संरक्षण के कारण आरोपियों की गिरफ्तारी नहीं हो रही थी। ममता बनर्जी मुख्यमंत्री कक्ष के बाहर धरने पर बैठ गईं। बाद में पुलिस ने उन्हें जबरन हटाया और इस दौरान उनके साथ धक्का-मुक्की भी हुई।

कहा जाता है कि उसी दिन ममता बनर्जी ने प्रण लिया था कि वह मुख्यमंत्री बनकर ही रायटर्स बिल्डिंग लौटेंगी। 18 साल बाद, 20 मई 2011 को उन्होंने मुख्यमंत्री के रूप में रायटर्स बिल्डिंग में प्रवेश किया और अपना वादा पूरा किया।लेकिन विडंबना यह रही कि दो साल बाद उन्होंने सचिवालय को नबन्ना स्थानांतरित कर दिया।

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