वापसी या और गिरावट? नागांव उपचुनाव में कांग्रेस की सबसे बड़ी परीक्षा
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वापसी या और गिरावट? नागांव उपचुनाव में कांग्रेस की सबसे बड़ी परीक्षा

असम में करारी हार के बाद कांग्रेस के लिए नागांव लोकसभा उपचुनाव अहम परीक्षा बन गया है। नतीजा पार्टी के भविष्य और विपक्ष की ताकत तय कर सकता है।


असम विधानसभा चुनाव में अपनी अब तक की सबसे बड़ी हार झेलने के महज दो महीने बाद कांग्रेस के नेतृत्व वाला विपक्ष एक नई और बड़ी चुनौती का सामना कर रहा है—यह साबित करना कि वह अभी भी राज्य की राजनीति में प्रासंगिक है।अप्रैल में हुए विधानसभा चुनाव में कांग्रेस ने भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी (मार्क्सवादी), असम जातीय परिषद (एजेपी) और रायजोर दल के साथ गठबंधन कर चुनाव लड़ा था। हालांकि चार दलों के इस गठबंधन में केवल कांग्रेस और रायजोर दल ही सीटें जीत सके। कांग्रेस को 19 सीटें मिलीं, जबकि रायजोर दल को दो सीटों पर सफलता मिली। एजेपी और सीपीआई (एम) अपना खाता तक नहीं खोल सके।

चुनाव के बाद गठबंधन में दरार के संकेत भी सामने आने लगे हैं। अखिल गोगोई के नेतृत्व वाला रायजोर दल विधानसभा के भीतर और बाहर दोनों जगह कांग्रेस के खिलाफ अधिक आक्रामक रुख अपनाता दिखाई दे रहा है।

चुनाव ने बदल दिया असम का राजनीतिक नक्शा

विधानसभा चुनाव ने असम की राजनीति का पूरा परिदृश्य बदल दिया। भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) ने 82 सीटें जीतकर शानदार वापसी की और पहली बार अपने दम पर राज्य में स्पष्ट बहुमत हासिल किया। दूसरी ओर कांग्रेस केवल 19 सीटों तक सिमट गई।रायजोर दल समेत अन्य सहयोगियों के साथ भी विपक्ष कुल मिलाकर करीब 21 सीटें ही हासिल कर पाया, जिससे उसकी राजनीतिक कमजोरी साफ दिखाई दी।

नागांव उपचुनाव पर टिकी निगाहें

अब सभी की नजर आगामी नागांव लोकसभा उपचुनाव पर है। राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि यह चुनाव तय करेगा कि कांग्रेस अपनी गिरती राजनीतिक स्थिति को रोक पाएगी या भाजपा का वर्चस्व और मजबूत होगा।

यह उपचुनाव इसलिए जरूरी हुआ क्योंकि पूर्व कांग्रेस सांसद प्रद्युत बोरदोलोई भाजपा में शामिल हो गए, दिसपुर विधानसभा सीट से चुनाव जीते और नागांव लोकसभा सीट खाली कर दी।नागांव कभी कांग्रेस का मजबूत गढ़ माना जाता था। 2024 के लोकसभा चुनाव में मुस्लिम बहुल इस क्षेत्र से प्रद्युत बोरदोलोई ने 50 प्रतिशत से अधिक वोट हासिल कर जीत दर्ज की थी।

भाजपा के लिए नागांव में जीत उसकी बढ़ती राजनीतिक पहुंच का एक और बड़ा प्रमाण होगी। वहीं कांग्रेस के लिए यह चुनाव कहीं अधिक महत्वपूर्ण है। यदि पार्टी का प्रदर्शन खराब रहता है तो नेताओं और कार्यकर्ताओं में निराशा बढ़ सकती है तथा दल-बदल की घटनाएं भी तेज हो सकती हैं।

कांग्रेस के पतन की जड़ें

नाजिरा के पत्रकार सिबा गोगोई का मानना है कि जब तक हिमंत बिस्वा सरमा सत्ता में हैं, तब तक कांग्रेस या किसी अन्य विपक्षी दल के लिए राजनीतिक जगह बनाना मुश्किल होगा।उन्होंने कहा कि गौरव गोगोई, देवव्रत सैकिया और रिपुन बोरा जैसे वरिष्ठ नेताओं की हार यह संकेत देती है कि विपक्ष अपना जमीनी जनाधार खो चुका है।उनके अनुसार कांग्रेस की आम जनता से सीधी संवाद क्षमता कमजोर हो गई है और उसके पास प्रभावी चुनावी रणनीति का भी अभाव है।असम प्रदेश कांग्रेस कमेटी (एपीसीसी) के अध्यक्ष गौरव गोगोई, जो स्वयं जोरहाट विधानसभा सीट हार गए, ने चुनावी हार की जिम्मेदारी स्वीकार की है। उन्होंने बेरोजगारी, भ्रष्टाचार और कथित सांप्रदायिक राजनीति जैसे मुद्दों को लेकर सक्रिय विपक्ष की भूमिका निभाने का वादा किया है।

लगातार झटकों से जूझ रही कांग्रेस

राजनीतिक पर्यवेक्षकों का कहना है कि कांग्रेस की समस्याएं केवल एक चुनावी हार तक सीमित नहीं हैं। वर्ष 2014 के बाद से पार्टी लगातार कई राजनीतिक झटके झेल रही है, जिसके कारण संगठनात्मक थकान और आंतरिक गुटबाजी बढ़ी है।

गैर-अल्पसंख्यक मतदाताओं के बीच पार्टी का समर्थन लगातार घटा है। क्षेत्रीय दलों के साथ गठबंधन की कोशिशें भी मुख्यमंत्री हिमंत बिस्वा सरमा की आक्रामक राजनीतिक शैली के मुकाबले कोई मजबूत विकल्प तैयार नहीं कर सकीं।

विश्लेषकों के अनुसार कांग्रेस की सबसे बड़ी कमजोरी उसका संगठन है। पार्टी अक्सर राजनीतिक लहरों के सहारे सत्ता में आती रही, लेकिन जमीनी स्तर पर लगातार संगठन खड़ा करने में सफल नहीं रही।जिला, ब्लॉक और बूथ स्तर के कार्यकर्ताओं से वरिष्ठ नेताओं की दूरी ने नेतृत्व और कार्यकर्ताओं के बीच बड़ा अंतर पैदा कर दिया है।

जमीनी स्तर से पुनर्निर्माण की जरूरत

राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि टीवी बहसों और सोशल मीडिया अभियानों से राजनीतिक पुनरुत्थान संभव नहीं है। जनता के मुद्दों पर लगातार आंदोलनों और जमीनी संघर्षों के बिना लोगों का भरोसा दोबारा जीतना मुश्किल होगा।कांग्रेस की वरिष्ठ प्रवक्ता हैप्पी गोगोई ने स्वीकार किया कि पार्टी के सामने चुनौतियां बड़ी हैं, लेकिन उन्होंने भरोसा जताया कि कांग्रेस खुद को फिर से मजबूत करने के लिए प्रतिबद्ध है।

उन्होंने कहा कि असम के लोकतंत्र को एक मजबूत विपक्ष की जरूरत है और कांग्रेस इस जिम्मेदारी को निभाने के लिए संगठन को पुनर्गठित कर रही है।उनके अनुसार पार्टी बेरोजगारी, महंगाई, किसानों की समस्याओं, शिक्षा, स्वास्थ्य, भ्रष्टाचार और असम की पहचान तथा संसाधनों की सुरक्षा जैसे मुद्दों पर ध्यान केंद्रित कर रही है।उन्होंने बताया कि बूथ स्तर से संगठन को मजबूत किया जा रहा है, युवा नेतृत्व को आगे बढ़ाया जा रहा है और समान विचारधारा वाली लोकतांत्रिक ताकतों के साथ मिलकर एक मजबूत विकल्प तैयार करने की कोशिश हो रही है। नागांव उपचुनाव की तैयारी के लिए भी लगातार बैठकें आयोजित की जा रही हैं।

विपक्ष की वापसी के सामने चुनौतियां

पूर्व छात्र संगठन नेता नयनज्योति भुइयां का मानना है कि भाजपा का प्रभुत्व हमेशा नहीं रहेगा, लेकिन विपक्ष को अभी लंबा रास्ता तय करना है।उन्होंने कहा कि कांग्रेस ने हाल ही में जनता से दोबारा जुड़ने की कोशिश शुरू की है, लेकिन उसे और तेज करने की जरूरत है।भुइयां ने कांग्रेस के भीतर मौजूद भ्रष्टाचार और पूंजीवादी सोच वाले नेताओं को भी जनआंदोलन खड़ा करने में बड़ी बाधा बताया। उनका मानना है कि क्षेत्रीय राजनीतिक ताकतों के पुनर्गठन की जरूरत है और कांग्रेस को क्षेत्रीय राजनीति का समर्थन करना चाहिए।

खराब प्रदर्शन के पीछे के कारण

राजनीतिक विश्लेषक प्रसेनजीत बिस्वास का मानना है कि विपक्ष की मौजूदा स्थिति का मुख्य कारण एकजुट मोर्चा बनाने और आम जनता के मुद्दों को प्रभावी ढंग से उठाने में विफलता है।उन्होंने बताया कि 2024 के लोकसभा चुनाव में कांग्रेस गठबंधन को भाजपा से अधिक वोट मिले थे, लेकिन 2026 के विधानसभा चुनाव में स्थिति पूरी तरह बदल गई।

परिसीमन और राजनीतिक ध्रुवीकरण के कारण कांग्रेस और उसके सहयोगी कुल मतदान का 30 प्रतिशत भी हासिल नहीं कर सके, जबकि भाजपा को अकेले 38 प्रतिशत और सहयोगियों के साथ लगभग 50 प्रतिशत वोट मिले।बिस्वास का कहना है कि विपक्ष भ्रष्टाचार, बेरोजगारी, बाढ़, जलभराव और आवश्यक वस्तुओं की बढ़ती कीमतों जैसे मुद्दों को मजबूती से नहीं उठा पाया, जबकि ये सीधे तौर पर गरीब और मध्यम वर्ग को प्रभावित करते हैं।उन्होंने यह भी कहा कि वरिष्ठ कांग्रेस नेता रकीबुल हुसैन और उनके परिवार को लेकर पार्टी के अंदर चल रहे विवाद नागांव उपचुनाव में कांग्रेस की संभावनाओं को प्रभावित कर सकते हैं।

गठबंधन से आगे की चुनौती

राजनीतिक टिप्पणीकार राणा खान का मानना है कि यदि विपक्ष गंभीर आत्ममंथन नहीं करता तो उसके लिए निकट भविष्य में कोई बड़ी उम्मीद नहीं है।उन्होंने कहा कि कांग्रेस दिशा और नेतृत्व के संकट से जूझ रही है। विपक्षी एकता केवल कागजों तक सीमित है और जनता के मुद्दों को लेकर कोई स्पष्ट रणनीति दिखाई नहीं देती। केवल नारों के सहारे मौजूदा स्थिति को नहीं बदला जा सकता।

वरिष्ठ अधिवक्ता संगीता शर्मा का कहना है कि विपक्ष एक महत्वपूर्ण मोड़ पर खड़ा है और उसे वास्तविक सुधारों की जरूरत है।उनके अनुसार भाजपा की मौजूदा सफलता प्रभावी नेतृत्व, अनुशासित संगठन और राजनीतिक विमर्श को दिशा देने की क्षमता पर आधारित है। हालांकि लोकतंत्र में कोई भी राजनीतिक प्रभुत्व स्थायी नहीं होता।

उन्होंने कहा कि नागांव उपचुनाव इस बात की महत्वपूर्ण परीक्षा होगा कि क्या विपक्ष फिर से मतदाताओं से जुड़कर अपनी प्रासंगिकता साबित कर सकता है।उनका मानना है कि सफलता केवल गठबंधन की गणित पर निर्भर नहीं करेगी, बल्कि रोजगार, आर्थिक विकास, सामाजिक सद्भाव और युवाओं की आकांक्षाओं जैसे मुद्दों को प्रभावी ढंग से उठाने पर भी निर्भर करेगी।

असम में एक मजबूत विपक्ष के लिए अभी भी जगह है, लेकिन कांग्रेस और उसके सहयोगियों की वापसी केवल चुनावी समीकरणों से संभव नहीं होगी। इसके लिए संगठन का पुनर्निर्माण, नया नेतृत्व और स्पष्ट राजनीतिक दृष्टि जरूरी होगी, जो मतदाताओं का भरोसा फिर से जीत सके।

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