
TMC बागियों का नया ठिकाना बनी NCPI, जानिए पार्टी की पूरी कहानी
टीएमसी के 20 बागी सांसदों के विलय के बाद NCPI चर्चा में है। जानिए पार्टी का इतिहास, गठन, नेतृत्व और राष्ट्रीय राजनीति में इसकी नई भूमिका के बारे में।
पश्चिम बंगाल की राजनीति में बड़ा घटनाक्रम सामने आया है। तृणमूल कांग्रेस (टीएमसी) के 28 लोकसभा सांसदों में से 20 सांसदों ने पार्टी नेतृत्व से बगावत करते हुए अलग होने का फैसला किया है। बागी सांसदों ने नेशनलिस्ट सिटिजंस पार्टी ऑफ इंडिया (एनसीपीआई) में विलय की घोषणा कर दी है और इसके लिए लोकसभा अध्यक्ष से भी औपचारिक मान्यता की प्रक्रिया शुरू कर दी है।
रविवार को बागी सांसदों के प्रतिनिधिमंडल ने लोकसभा अध्यक्ष ओम बिड़ला से मुलाकात कर विलय संबंधी आधिकारिक पत्र सौंपा। इसके साथ ही संसद में अलग बैठने की व्यवस्था (सिटिंग अरेंजमेंट) की मांग भी की गई है।
एनडीए के साथ काम करने का ऐलान
बागी गुट का नेतृत्व कर रहीं काकोली घोष ने कहा कि उनका समूह प्रधानमंत्री के नेतृत्व वाले राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन (एनडीए) के साथ मिलकर काम करेगा। उन्होंने दावा किया कि उनके साथ टीएमसी के दो-तिहाई सांसदों का समर्थन है।वहीं, बागी सांसद सुदीप बंद्योपाध्याय और शताब्दी रॉय ने भी पुष्टि की कि उनका समूह औपचारिक रूप से एनसीपीआई में शामिल हो चुका है।
आखिर क्या है एनसीपीआई?
टीएमसी के बागी सांसदों के एनसीपीआई में शामिल होने के बाद यह अपेक्षाकृत कम चर्चित पार्टी अचानक राष्ट्रीय सुर्खियों में आ गई है। नेशनलिस्ट सिटिजंस पार्टी ऑफ इंडिया (एनसीपीआई) मूल रूप से त्रिपुरा में पंजीकृत एक गैर-मान्यता प्राप्त राजनीतिक दल है।इस पार्टी का गठन 20 जनवरी 2023 को त्रिपुरा विधानसभा चुनाव से कुछ सप्ताह पहले किया गया था। चुनाव आयोग में इसे पंजीकृत गैर-मान्यता प्राप्त राजनीतिक दल के रूप में दर्ज किया गया। पार्टी का चुनाव चिह्न पेन निब (कलम की नोक) है।
चुनाव आयोग के रिकॉर्ड के अनुसार, पार्टी को अब तक बेहद सीमित आर्थिक सहायता मिली थी। पार्टी के दस्तावेजों में शेली कुंडू का नाम कोषाध्यक्ष के रूप में दर्ज है, जबकि वे संगठन की राष्ट्रीय अध्यक्ष भी हैं।
बंगाल में पंजीकरण, त्रिपुरा से चुनावी शुरुआत
दिलचस्प बात यह है कि पश्चिम बंगाल के हावड़ा जिले के बानीपुर क्षेत्र में पंजीकृत होने के बावजूद एनसीपीआई ने अपना पहला चुनावी अभियान त्रिपुरा से शुरू किया था। त्रिपुरा में पार्टी का संचालन शांतनु डे के नेतृत्व में किया गया।पार्टी ने आदिवासी समुदायों के प्रतिनिधित्व के उद्देश्य से सात विधानसभा सीटों पर उम्मीदवार उतारे थे। हालांकि, चार उम्मीदवारों के नामांकन पत्र खारिज हो गए थे। अंततः पार्टी केवल दो सीटों पर अपने चुनाव चिह्न पर चुनाव लड़ सकी।
चुनाव में उसे बेहद सीमित समर्थन मिला। छवामनु सीट पर पार्टी को 536 वोट और कैलाशहर सीट पर 286 वोट मिले। एक समर्थित निर्दलीय उम्मीदवार को भी केवल 376 वोट प्राप्त हुए। इसके बाद पार्टी लगभग राजनीतिक परिदृश्य से गायब हो गई थी।
आंतरिक विवादों के कारण ठप हुआ संगठन
पार्टी के त्रिपुरा प्रभारी शांतनु डे के अनुसार, संगठन ने 2023 के पश्चिम बंगाल पंचायत चुनाव लड़ने की भी योजना बनाई थी, लेकिन संसाधनों और आंतरिक मतभेदों के कारण यह संभव नहीं हो सका।उन्होंने बताया कि त्रिपुरा चुनाव के बाद फंडिंग और संगठनात्मक मामलों को लेकर विवाद उत्पन्न हो गए थे, जिससे पार्टी की गतिविधियां लगभग ठप पड़ गई थीं। बाद में उन्होंने नेतृत्व से 2026 के पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनाव की तैयारी शुरू करने का आग्रह भी किया, लेकिन संसाधनों की कमी के कारण योजना आगे नहीं बढ़ सकी।
जीरो सांसद से सीधे 20 सांसदों वाली पार्टी
हालांकि एनसीपीआई ने 2024 का लोकसभा चुनाव नहीं लड़ा था और उसके पास संसद में कोई प्रतिनिधित्व नहीं था, लेकिन टीएमसी के 20 सांसदों के विलय के बाद पार्टी की स्थिति पूरी तरह बदल गई है।
बागी सांसदों के इस फैसले ने एनसीपीआई को एक झटके में राष्ट्रीय राजनीति के केंद्र में ला खड़ा किया है। संसद में अब उसके पास 20 सांसदों का समर्थन होने का दावा किया जा रहा है, जिससे वह सांसदों की संख्या के आधार पर महत्वपूर्ण राजनीतिक ताकत बनकर उभर सकती है।
बंगाल की राजनीति में नए समीकरण
टीएमसी में हुई इस बड़ी टूट को पश्चिम बंगाल की राजनीति में एक अहम मोड़ माना जा रहा है। 20 सांसदों के अलग होने से मुख्यमंत्री ममता बनर्जी के नेतृत्व वाली पार्टी को बड़ा झटका लग सकता है। वहीं, एनसीपीआई का अचानक राष्ट्रीय स्तर पर उभरना और एनडीए के साथ काम करने का संकेत देना आने वाले समय में बंगाल और राष्ट्रीय राजनीति दोनों में नए समीकरण पैदा कर सकता है।

