
NDA का क्लीन स्वीप, असम की राज्यसभा में कांग्रेस का 'सूपड़ा साफ', हाथ से निकली सभी सीटें
असम के राजनीतिक इतिहास में एक अभूतपूर्व मोड़ आया है। आजादी के बाद पहली बार ऐसा हुआ है कि राज्यसभा में असम से कांग्रेस का एक भी प्रतिनिधि नहीं है। तीन नए सदस्यों के शपथ ग्रहण के साथ ही राज्य की सभी 7 सीटों पर अब एनडीए (NDA) का कब्जा हो गया है।
असम की राजनीति में एक ऐसे युग का अंत हो गया है जिसकी कल्पना कुछ साल पहले तक नामुमकिन थी। भारत की आजादी के बाद पहली बार, देश की सबसे पुरानी पार्टी इंडियन नेशनल कांग्रेस का असम से राज्यसभा में प्रतिनिधित्व शून्य हो गया है। यह गिरावट केवल सीटों का नुकसान नहीं, बल्कि असम की राजनीति पर कांग्रेस की कभी रही मजबूत पकड़ के पूरी तरह ढहने का प्रतीक है।
NDA का पूर्ण वर्चस्व
16 अप्रैल 2026 को असम के राजनीतिक परिदृश्य में यह बदलाव आधिकारिक हो गया। द्विवार्षिक चुनावों के बाद तीन नवनिर्वाचित सदस्यों—जोगेन मोहन (भाजपा), तेराश गोवाला (भाजपा) और प्रमोद बोरो (UPPL)—ने शपथ ली। इसके साथ ही असम की सभी 7 राज्यसभा सीटों पर अब एनडीए (NDA) गठबंधन का परचम लहरा रहा है। वर्तमान में, भाजपा के पास 4 सीटें हैं, उसकी सहयोगी यूनाइटेड पीपुल्स पार्टी लिबरल (UPPL) के पास 2 और असम गण परिषद (AGP) के पास 1 सीट है।
विपक्ष के लिए सिमटता स्थान
कांग्रेस के लिए यह गिरावट धीरे-धीरे शुरू हुई लेकिन पिछले कुछ वर्षों में इसने विनाशकारी रूप ले लिया। कांग्रेस के आखिरी कद्दावर सांसद रिपुन बोरा और रानी नाराह का कार्यकाल अप्रैल 2022 में समाप्त हुआ था। उसके बाद से पार्टी एक भी सीट जीतने में नाकाम रही।
राज्यसभा में असम से आखिरी गैर-एनडीए आवाज पत्रकार से राजनेता बने अजीत कुमार भुइयां की थी। भुइयां 2020 में संयुक्त विपक्ष के उम्मीदवार के रूप में चुने गए थे, लेकिन उनका कार्यकाल भी 9 अप्रैल 2026 को समाप्त हो गया। उनके जाने के साथ ही राज्यसभा में असम से विपक्ष की आवाज पूरी तरह खामोश हो गई है।
2022 का चुनाव: वो मोड़ जहाँ सब कुछ बिखर गया
कांग्रेस के पतन की सबसे बड़ी वजह 2022 के राज्यसभा चुनाव रहे। पार्टी ने रिपुन बोरा को मैदान में उतारा था, लेकिन अपने ही विधायकों के विश्वासघात ने खेल बिगाड़ दिया। अगस्त 2021 में AIUDF के साथ गठबंधन तोड़ने के बाद कांग्रेस की राह और मुश्किल हो गई थी।
चुनाव के दौरान कांग्रेस के विधायकों ने जमकर क्रॉस-वोटिंग की। एक विधायक सिद्दीकी अहमद का वोट इसलिए रद्द कर दिया गया क्योंकि उन्होंने "1" लिखने के बजाय "ONE" लिख दिया था। वहीं, शशि कांत दास जैसे विधायकों ने खुलेआम पार्टी लाइन के खिलाफ जाकर एनडीए को वोट दिया। उस समय मुख्यमंत्री हिमंत बिस्वा सरमा ने तंज कसते हुए कहा था, "कांग्रेस विधायकों ने अपनी 'अंतरात्मा' की आवाज पर वोट दिया है, जो दिखाता है कि असली ताकत कहाँ है।"
मनमोहन सिंह के दौर से 'शून्य' तक का सफर
यह स्थिति इसलिए भी चौंकाने वाली है क्योंकि असम वही राज्य है जिसने पूर्व प्रधानमंत्री डॉ. मनमोहन सिंह को लगातार तीन दशकों (1991 से 2019) तक राज्यसभा भेजा था। रिपुन बोरा ने इस कड़वी हकीकत को स्वीकार करते हुए कहा, "प्रधानमंत्री भेजने वाले राज्य से आज जीरो पर आना एक बहुत बड़ा पतन है। यह हमारे लिए रियलिटी चेक है। 2022 में जब हमारे अपने लोगों ने ही मुझे वोट नहीं दिया, तो वह कांग्रेस के लिए सबसे कठिन दौर था।"
गिरावट की जड़ें: 2016 से शुरू हुआ सिलसिला
राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि इस पतन की शुरुआत 2016 में हुई थी, जब भाजपा पहली बार असम की सत्ता में आई। इसके बाद कांग्रेस के भीतर भगदड़ मच गई। भुवनेश्वर कालिता जैसे वरिष्ठ नेताओं का भाजपा में जाना पार्टी के लिए बड़ा झटका था। 2021 के विधानसभा चुनावों में कांग्रेस केवल 29 सीटों पर सिमट गई, जबकि एनडीए ने 75 सीटें जीतकर अपनी स्थिति अभेद्य बना ली। सीटों के इसी गणित ने कांग्रेस के लिए राज्यसभा की राह बंद कर दी।
क्या है भविष्य?
राज्यसभा में आवाज न होने का मतलब है कि कांग्रेस अब ऊपरी सदन में असम के विशिष्ट मुद्दों को अपने प्रतिनिधि के माध्यम से सीधे नहीं उठा पाएगी। हालांकि पार्टी नेतृत्व जमीनी स्तर पर संगठन को फिर से खड़ा करने की बात कर रहा है, लेकिन राज्यसभा में उनकी वापसी का रास्ता लंबा है। वर्तमान एनडीए सांसदों का कार्यकाल 2028 तक है, जिसका मतलब है कि अगले दो साल तक असम से कांग्रेस की आवाज संसद के इस सदन में सुनाई नहीं देगी।
गुवाहाटी के एक राजनीतिक विश्लेषक कहते हैं, "यह एक युग का अंत है। जो पार्टी कभी असम की पर्याय थी, आज वह अपनी पहचान बचाने के लिए संघर्ष कर रही है।"

