
‘सुशासन बाबू’ की विरासत पर सवाल, क्या अधूरा रह गया विकास?
नीतीश कुमार के 20 साल के शासन में कानून-व्यवस्था में सुधार हुआ, लेकिन रोजगार और औद्योगिक विकास शानदार कामयाबी से दूर रही।
लगभग दो दशक तक सत्ता में रहने के बाद नीतीश कुमार का कार्यकाल मिलेजुले रिकॉर्ड के रूप में सामने आया है - जहां एक ओर सुशासन और कानून-व्यवस्था में सुधार दिखता है, वहीं कई अहम मौके भी छूटते नजर आते हैं। बिहार अब एक नए राजनीतिक दौर में प्रवेश कर रहा है, ऐसे में यह सवाल और भी महत्वपूर्ण हो गया है कि नीतीश कुमार ने वास्तव में क्या हासिल किया और कहां कमी रह गई।
मिलेजुले नतीजे
करीब 20 साल तक मुख्यमंत्री रहे आप में सबसे बड़ी बात। यह बिहार के इतिहास में सबसे अधिक बोझिल है और देश के अन्य राज्यों की तुलना में भी काफी भारी माना जाता है। तीन लंबे शासनकाल में अवशेषों और असफलताओं का मिश्रण स्वाभाविक है।नीतीश को "सुशासन बाबू" कहा जाता है, लेकिन यह जांच जरूरी है कि छवि यह पूरी तरह से सही कुमार है या कुछ हद तक बढ़ा-चढ़ाकर पेश की गई है।
कानून-व्यवस्था में बड़े बदलाव
जब नीतीश कुमार ने सत्ता संभाली तब बिहार की पहचान कानून-व्यवस्था की खराब स्थिति के कारण जंगलराज के रूप में थी, जो लालू प्रसाद यादव और राबड़ी देवी के शासनकाल से जुड़ी थी।नीतीश कुमार की इस तस्वीर में बड़ा बदलाव आया। आज बिहार को पहले की तुलना में अधिक सुरक्षित माना जाता है। खासतौर पर महिलाओं को पहले यात्रा करने से ज्यादा सुरक्षित महसूस होता है। हालाँकि, आँकड़े पूरी तरह से इस बदलाव की पुष्टि नहीं करते हैं, लेकिन लोगों की धारणा में बदलाव आपके लिए बड़ी उपलब्धि है।
विकास मॉडल: अपूर्ण प्रगति
नीतीश कुमार ने श्रीकृष्ण सिन्हा और कर्पूरी ठाकुर के पुराने यूनिवर्सल मॉडल को आगे बढ़ाया, लेकिन इसमें कोई बड़ा बदलाव या विस्तार नहीं मिला।उनके शासन में सड़क, पुल और फुटपाथों में सुधार जरूर हुआ और सरकारी नामांकन की शुरुआत बेहतर हुई, लेकिन प्रगतिशील प्रगति और औद्योगिक विकास पर नजर नहीं पड़ी।
रोज़गार और उद्योग: सबसे बड़ी मंदी
20 साल बाद भी बिहार में बेरोजगारी एक बड़ी समस्या बनी हुई है।यदि चुनाव परिणाम के लिए अब भी सरकारी मंजूरी और सहायता पर प्रतिबंध हटा दिया गया है, तो यह संकेत देता है कि आर्थिक आत्मनिर्भरता का मॉडल पूरी तरह से सफल नहीं हो रहा है।औद्योगिक विकास की कमी ने राज्य की आर्थिक प्रगति को सीमित कर दिया।
शराबबंदी: सफलता और असफलता दोनों
नीतीश कुमार की शराबबंदी नीति को खासतौर पर महिलाओं के बीच काफी सपोर्ट मिला। लेकिन इसके साथ ही अवैध शराब का काला बाजार भी बढ़ गया।कई बार शराब से मौत की घटनाएं सामने आईं, जिससे यह साफ हो गया कि नीति की व्यवस्था तो अच्छी थी, लेकिन उनके सहयोगी काम कर रहे थे।
नई सरकार के सामने चुनौतियां
अब सम्राट चौधरी के मुख्यमंत्री बनने के बाद उनके सामने बड़ी चुनौती है।उनके काम की तुलना स्थिर नीतीश कुमार से होगी। सवाल यह भी है कि वे नीतीश मॉडल जारी करेंगे या भारतीय जनता पार्टी की रणनीति के अनुसार नया मॉडल अपनाएंगे।बेरोजगारी, आर्थिक विकास और स्नातक स्तर की पढ़ाई को बढ़ावा देना उनकी सबसे बड़ी जिम्मेदारी होगी।
नीतीश कुमार की भविष्य की भूमिका
नीतीश ने खुद को "मार्गदर्शक" की भूमिका में बताया है, लेकिन भारतीय राजनीति में यह भूमिका प्रमुख कुमार ही रहती है, जैसा कि लाल कृष्ण आडवाणी और मुरली मनोहर जोशी के मामले में देखा गया था।अब सबसे बड़ा सवाल यह है कि नीतीश कुमार का वास्तविक प्रभाव कितना रहेगा।इसके अलावा, अपनी पार्टी जनता दल (यूनाइटेड) को एकजुट रखना, बीजेपी के साथ संतुलन बनाए रखना और उत्तराधिकार (अन्य उनके बेटे निशांत कुमार की भूमिका भी शामिल है) को अपना बड़ा आधार बनाना है।
नीतीश कुमार का 20 साल का अनुबंध और कमियों का मिश्रण है। उन्होंने कानून-व्यवस्था में सुधार कर एक मजबूत छवि बनाई, लेकिन रोजगार और औद्योगिक विकास जैसे क्षेत्र में सफलता नहीं मिली।अगले वर्षों में, जब इस दौर का मूल्यांकन किया जाएगा, तब उनकी विरासत को शायद आज से अलग नज़रिए से देखा जाएगा।

