राज्य दर्जा के मुद्दे पर आक्रामक हुई नेशनल कॉन्फ्रेंस, मास्टरस्ट्रोक या मजबूरी?
x

राज्य दर्जा के मुद्दे पर आक्रामक हुई नेशनल कॉन्फ्रेंस, मास्टरस्ट्रोक या मजबूरी?

उपचुनाव में हार और पार्टी के भीतर असंतोष के बीच उमर अब्दुल्ला ने जम्मू-कश्मीर को राज्य का दर्जा दिलाने की मांग को संसद तक ले जाने का फैसला किया है।


उपचुनाव में करारी हार और पार्टी के भीतर बढ़ते असंतोष के बीच जम्मू-कश्मीर के मुख्यमंत्री उमर अब्दुल्ला ने राज्य का दर्जा बहाल करने की मांग को सीधे संसद तक ले जाने का फैसला किया है। राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि यह कदम एक सोची-समझी रणनीति का हिस्सा है, जिसका उद्देश्य पार्टी के भीतर बढ़ती नाराजगी को शांत करना, आलोचकों को जवाब देना और नेशनल कॉन्फ्रेंस (एनसी) के मूल राजनीतिक एजेंडे जम्मू-कश्मीर को पूर्ण राज्य का दर्जा दिलाने पर दोबारा फोकस करना है।

संसद सत्र के पहले दिन दिल्ली में होगा बड़ा प्रदर्शन

श्रीनगर के बाहरी इलाके में स्थित दाचीगाम नेशनल पार्क में मुख्यमंत्री उमर अब्दुल्ला की अध्यक्षता में हुई एक गोपनीय बैठक के बाद नेशनल कॉन्फ्रेंस ने बुधवार को फैसला किया कि संसद के मानसून सत्र के पहले दिन नई दिल्ली में बड़ा प्रदर्शन किया जाएगा।इस प्रदर्शन का मुख्य उद्देश्य जम्मू-कश्मीर को पूर्ण राज्य का दर्जा बहाल करने की मांग को राष्ट्रीय स्तर पर उठाना होगा। माना जा रहा है कि यह अब तक राज्य के दर्जे के मुद्दे पर एनसी का सबसे आक्रामक राजनीतिक कदम होगा।

अनुच्छेद 370 हटने के बाद बदला राजनीतिक परिदृश्य

5 अगस्त 2019 को केंद्र सरकार ने जम्मू-कश्मीर का विशेष दर्जा समाप्त करते हुए अनुच्छेद 370 को निष्प्रभावी कर दिया था। इसके साथ ही जम्मू-कश्मीर राज्य को दो केंद्र शासित प्रदेशों जम्मू-कश्मीर और लद्दाख में विभाजित कर दिया गया था।उस समय केंद्र सरकार ने "उचित समय" पर राज्य का दर्जा बहाल करने का आश्वासन दिया था, लेकिन इसके लिए कोई निश्चित समयसीमा तय नहीं की गई।

तब से नेशनल कॉन्फ्रेंस और पीपुल्स डेमोक्रेटिक पार्टी (पीडीपी) जैसे क्षेत्रीय दल अनुच्छेद 370 की बहाली की मांग करते रहे हैं। हालांकि मौजूदा राजनीतिक परिस्थितियों में अनुच्छेद 370 की वापसी मुश्किल मानी जा रही है, इसलिए अब राज्य का दर्जा बहाल करना राजनीतिक सहमति का मुख्य मुद्दा बन गया है।

दाचीगाम की गोपनीय बैठक पर सबकी नजर

बैठक के बाद मीडिया को जानकारी देते हुए जादीबल विधायक और एनसी के मुख्य प्रवक्ता तनवीर सादिक ने बताया कि पार्टी अब राज्य के दर्जे की लड़ाई को दिल्ली तक ले जाएगी।उन्होंने कहा कि बैठक में विकास कार्यों, नशे और शराब की बढ़ती समस्या जैसे मुद्दों पर चर्चा हुई, लेकिन सबसे बड़ा मुद्दा जम्मू-कश्मीर की विशेष स्थिति और राज्य का दर्जा रहा।

इस बैठक को लेकर काफी गोपनीयता बरती गई थी। एनसी विधायक पहले उमर अब्दुल्ला के गुपकार रोड स्थित आवास पर एकत्र हुए और फिर काफिले में रवाना हुए। अंतिम स्थान को पूरी तरह गोपनीय रखा गया था। कई लोगों को लगा कि वे किसी मुगल गार्डन जा रहे हैं, लेकिन अंततः वे दाचीगाम नेशनल पार्क पहुंचे, जो संकटग्रस्त कश्मीरी हिरण 'हंगुल' के लिए प्रसिद्ध है।

विपक्ष ने साधा निशाना

बैठक को लेकर विपक्ष ने भी तीखी प्रतिक्रिया दी।पीपुल्स कॉन्फ्रेंस के अध्यक्ष सज्जाद लोन ने कहा कि बैठक का इतना दूर और अलग-थलग स्थान पर होना एक "अलग-थलग और जनता से कटी हुई सरकार" का प्रतीक है।वहीं पीडीपी नेता इल्तिजा मुफ्ती ने व्यंग्य करते हुए कहा कि कश्मीर में अब विधायक हंगुल से भी ज्यादा संकटग्रस्त हो गए हैं और उनके लिए भी अलग वन्यजीव अभयारण्य बनाया जाना चाहिए।

बाद में उमर अब्दुल्ला ने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म एक्स पर स्पष्ट किया कि बैठक के लिए यह स्थान पहले से तय था ताकि सामान्य राजनीतिक माहौल से दूर रहकर गंभीर चर्चा की जा सके।

शराबबंदी पर भी लाया जाएगा विधेयक

बैठक में सरकार के पिछले 18 महीनों के कामकाज की समीक्षा की गई और भविष्य की रणनीति पर चर्चा हुई। नेशनल कॉन्फ्रेंस ने जम्मू-कश्मीर में शराबबंदी के लिए विधेयक लाने का भी फैसला किया।

राज्य का दर्जा नहीं मिलने से बढ़ा दबाव

राजनीतिक हलकों में इस बैठक को लेकर काफी उत्सुकता थी क्योंकि मई में उमर अब्दुल्ला ने संकेत दिया था कि वे कई मुद्दों पर खुलकर बोलना चाहते हैं। उन्होंने कहा था, "यकीन मानिए, मेरा मन बादल फटने की तरह फट पड़ने का करता है।"राज्य का दर्जा बहाल न करा पाना अब एनसी सरकार के लिए एक बड़ी राजनीतिक कमजोरी बन गया है। विपक्षी दल लगातार आरोप लगा रहे हैं कि नेशनल कॉन्फ्रेंस ने इस मुद्दे पर अपना रुख कमजोर कर लिया है।

पार्टी के भीतर भी बढ़ रहा असंतोष

दबाव केवल विपक्ष से ही नहीं बल्कि पार्टी के भीतर से भी बढ़ रहा है।श्रीनगर से सांसद आगा रुहुल्लाह मेहदी ने राज्य के दर्जे और आरक्षण नीति जैसे मुद्दों पर पार्टी नेतृत्व से खुला मतभेद जताया है। जम्मू-कश्मीर में आरक्षण का प्रतिशत 50 फीसदी से अधिक होने को लेकर भी उन्होंने सवाल उठाए हैं।हाल ही में वे मुख्यमंत्री आवास के बाहर छात्रों के प्रदर्शन में भी शामिल हुए थे। खास बात यह रही कि दाचीगाम की बैठक में वे मौजूद नहीं थे। हालांकि यह स्पष्ट नहीं है कि उन्हें आमंत्रित किया गया था या नहीं।

उपचुनाव में हार से बढ़ी मुश्किलें

हालिया उपचुनाव में नेशनल कॉन्फ्रेंस को बड़ा झटका लगा है।सबसे बड़ी हार बडगाम सीट पर मिली, जहां से 2024 में उमर अब्दुल्ला स्वयं जीते थे। बाद में सीट खाली करने के बाद हुए उपचुनाव में यह सीट पीडीपी के खाते में चली गई।राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि इस हार का सीधा संबंध उमर अब्दुल्ला और आगा रुहुल्लाह मेहदी के बीच बढ़ते मतभेदों से है, क्योंकि बडगाम मेहदी का प्रभाव क्षेत्र माना जाता है।

कांग्रेस के साथ भी बढ़ रहा तनाव

नेशनल कॉन्फ्रेंस और कांग्रेस के रिश्तों में भी खटास की खबरें सामने आ रही हैं।हालांकि दोनों दलों ने 2024 का विधानसभा चुनाव मिलकर लड़ा था, लेकिन कांग्रेस ने सरकार में शामिल होने से इनकार करते हुए केवल बाहरी समर्थन दिया। कांग्रेस का कहना है कि राज्य का दर्जा बहाल होने तक वह सरकार में शामिल नहीं होगी।

कांग्रेस के कई नेताओं ने सार्वजनिक रूप से एनसी पर राज्य के दर्जे की बहाली के लिए पर्याप्त प्रयास न करने का आरोप लगाया है। दाचीगाम बैठक में भी कांग्रेस के किसी विधायक को आमंत्रित नहीं किया गया।

क्या सरकार पर मंडरा रहा है खतरा?

राजनीतिक गलियारों में चर्चा है कि नेशनल कॉन्फ्रेंस के कुछ विधायक सरकार के कामकाज से नाराज हैं। भाजपा ने इन चर्चाओं को मुद्दा बनाते हुए सरकार को अस्थिर बताया है।विधानसभा में विपक्ष के नेता सुनील शर्मा ने दाचीगाम बैठक को "डूबते जहाज को बचाने की कोशिश" करार दिया।हालांकि एनसी नेताओं ने इन आरोपों को खारिज करते हुए कहा है कि मुख्यमंत्री उमर अब्दुल्ला को पार्टी का पूरा समर्थन प्राप्त है।

फिलहाल सुरक्षित है सरकार

90 सदस्यीय जम्मू-कश्मीर विधानसभा में उमर अब्दुल्ला सरकार के पास आरामदायक बहुमत है।सत्तारूढ़ गठबंधन के पास कुल 53 विधायक हैं, जिनमें 41 नेशनल कॉन्फ्रेंस, 6 कांग्रेस विधायक (बाहरी समर्थन), 5 निर्दलीय और 1 सीपीएम विधायक शामिल हैं।वहीं भाजपा के नेतृत्व वाले विपक्ष के पास 29 सीटें हैं। पीडीपी के पास 4, पीपुल्स कॉन्फ्रेंस के पास 1, आम आदमी पार्टी के पास 1 सीट है, जबकि 2 निर्दलीय विधायक किसी खेमे में नहीं हैं।हालांकि यदि कांग्रेस और निर्दलीय विधायक समर्थन वापस लेते हैं तो सरकार पर दबाव बढ़ सकता है, लेकिन फिलहाल ऐसी संभावना कम नजर आती है।

दिल्ली प्रदर्शन पर टिकीं निगाहें

अब सभी की नजरें नेशनल कॉन्फ्रेंस के दिल्ली प्रदर्शन पर टिकी हैं। यह प्रदर्शन मोदी सरकार के साथ टकराव की नई शुरुआत साबित होगा या केवल एक प्रतीकात्मक राजनीतिक कदम बनकर रह जाएगा, यह आने वाले दिनों में स्पष्ट होगा।फिलहाल इतना तय है कि राज्य के दर्जे की बहाली का मुद्दा एक बार फिर जम्मू-कश्मीर की राजनीति के केंद्र में आ गया है और इससे प्रदेश की राजनीति का अगला अध्याय तय हो सकता है।

Read More
Next Story