
CBI कोर्ट के फैसले से बदलेगा खेल? निंबालकर पर टिकी सबकी नजर
पवनराजे निंबालकर हत्याकांड में पद्मसिंह पाटिल समेत सभी आरोपी बरी हो गए। फैसले के बाद शिवसेना (UBT) में संभावित टूट की अटकलों पर नया सस्पेंस छा गया।
महाराष्ट्र के पूर्व गृह मंत्री पद्मसिंह पाटिल और सात अन्य आरोपियों को वर्ष 2006 में कांग्रेस नेता पवनराजे निंबालकर की हत्या के मामले में बरी किए जाने के बाद राज्य की राजनीति में नई हलचल पैदा हो गई है। इस फैसले ने उन अटकलों पर भी असर डाला है, जिनमें दावा किया जा रहा था कि शिवसेना (उद्धव बालासाहेब ठाकरे) के कई सांसद उपमुख्यमंत्री एकनाथ शिंदे के नेतृत्व वाली शिवसेना में शामिल होने की तैयारी कर रहे हैं।
मुंबई की विशेष सीबीआई अदालत ने शुक्रवार को पद्मसिंह पाटिल समेत सभी आरोपियों को बरी करते हुए कहा कि अभियोजन पक्ष हत्या के पीछे कथित साजिश को साबित करने में विफल रहा है। अदालत ने मामले के मुख्य गवाह और सरकारी गवाह बने पारसमल जैन की गवाही को अविश्वसनीय मानते हुए उसे घटनाक्रम की कड़ी साबित करने के लिए पर्याप्त नहीं माना।
फैसले का राजनीतिक असर
यह फैसला इसलिए भी राजनीतिक रूप से महत्वपूर्ण माना जा रहा है क्योंकि पवनराजे निंबालकर के पुत्र और धाराशिव (उस्मानाबाद) से लोकसभा सांसद ओमप्रकाश राजे निंबालकर उन छह शिवसेना (UBT) सांसदों में शामिल बताए जा रहे हैं, जिनके एकनाथ शिंदे गुट में जाने की चर्चा चल रही थी।
शिवसेना (UBT) के नेताओं, विशेषकर राज्यसभा सांसद संजय राउत ने आरोप लगाया था कि ओमप्रकाश निंबालकर को यह आश्वासन दिया गया था कि उनके पिता की हत्या के मामले में आरोपियों को सजा मिलेगी, जिसके बाद उन्होंने शिंदे गुट में शामिल होने की सहमति दी थी। अदालत का फैसला पहले 16 जून को आना था, लेकिन इसे 20 जून तक टाल दिए जाने से इन अटकलों को और बल मिला था।
अब जब सभी आरोपी बरी हो गए हैं, तो यह सवाल खड़ा हो गया है कि क्या ओमप्रकाश निंबालकर अब भी शिंदे गुट में शामिल होंगे। फैसले से एक दिन पहले उन्होंने अपने समर्थकों से कहा था कि अदालत के निर्णय के बाद ही वे अपने राजनीतिक भविष्य पर फैसला करेंगे।
बगावत की गणित पर संकट
ओमप्रकाश निंबालकर का फैसला शिवसेना (UBT) में संभावित टूट की पूरी गणित को प्रभावित कर सकता है। यदि वे और उद्धव ठाकरे के अन्य करीबी नेता जैसे अरविंद सावंत, राजाभाऊ वाजे और अनिल देसाई पार्टी में बने रहते हैं, तो शिंदे गुट में जाने वाले सांसदों की संख्या संविधान की दसवीं अनुसूची के तहत आवश्यक दो-तिहाई संख्या तक नहीं पहुंच पाएगी।
ऐसी स्थिति में दल-बदल करने वाले सांसदों पर तत्काल अयोग्यता का खतरा मंडरा सकता है, क्योंकि दल-बदल विरोधी कानून के तहत दो-तिहाई समर्थन के बिना पार्टी छोड़ने पर सदस्यता जा सकती है।
राजनीतिक सीमाओं से परे मामला
समय के साथ यह मामला केवल एक हत्या के मुकदमे तक सीमित नहीं रहा, बल्कि महाराष्ट्र की बदलती राजनीतिक तस्वीर का भी हिस्सा बन गया। पद्मसिंह पाटिल कभी अविभाजित राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी (NCP) के वरिष्ठ नेता थे। वे वर्तमान उपमुख्यमंत्री सुनेत्रा पवार के सौतेले भाई हैं, जिनका परिवार अजित पवार गुट की NCP का नेतृत्व करता है और यह गुट भाजपा-नीत महायुति सरकार का हिस्सा है।
पद्मसिंह पाटिल के बेटे रणजितसिंह पाटिल तुलजापुर से भाजपा के दो बार विधायक रह चुके हैं। वहीं उनकी बहू अर्चना पाटिल ने 2024 लोकसभा चुनाव NCP (अजित पवार गुट) के टिकट पर लड़ा था, लेकिन उन्हें ओमप्रकाश राजे निंबालकर ने हरा दिया था।
इस प्रकार, आज पीड़ित और आरोपी पक्ष से जुड़े लोग महाराष्ट्र की दो विरोधी राजनीतिक धारणाओं और गठबंधनों का हिस्सा हैं, जिससे अदालत का यह फैसला कानूनी के साथ-साथ राजनीतिक रूप से भी बेहद अहम हो गया है।
15 साल चली सुनवाई, सभी आरोपी बरी
पद्मसिंह पाटिल और अन्य सात लोगों पर 3 जून 2006 को नवी मुंबई के कलंबोली इलाके में कांग्रेस नेता पवनराजे निंबालकर और उनके ड्राइवर समद काजी की हत्या का आरोप था।सीबीआई के अनुसार, राजनीतिक और कारोबारी प्रतिद्वंद्विता के चलते पद्मसिंह पाटिल ने अपने चचेरे भाई की हत्या की साजिश रची थी और इसके लिए 30 लाख रुपये की सुपारी दी गई थी। जांच एजेंसी का पूरा मामला मुख्य रूप से पारसमल जैन की गवाही पर आधारित था, जो बाद में सरकारी गवाह बन गए थे।
हालांकि, विशेष सीबीआई न्यायाधीश सत्यनारायण नवंदर ने कहा कि अभियोजन पक्ष साजिश साबित करने में असफल रहा और सभी आरोपियों को बरी कर दिया।
वर्ष 2011 में शुरू हुई इस सुनवाई को पूरा होने में लगभग 15 साल लगे। इस दौरान 128 गवाहों के बयान दर्ज किए गए, जिनमें समाजसेवी अन्ना हजारे भी शामिल थे। पारसमल जैन ने दावा किया था कि पद्मसिंह पाटिल ने अन्ना हजारे की हत्या की साजिश भी रची थी, जिसके बाद उनका नाम भी इस मामले में सामने आया था।
फिलहाल, अदालत के इस फैसले ने महाराष्ट्र की राजनीति में नई अनिश्चितता पैदा कर दी है। अब सबकी निगाहें ओमप्रकाश राजे निंबालकर के अगले राजनीतिक कदम पर टिकी हैं, क्योंकि उससे ही तय होगा कि शिवसेना (UBT) में संभावित बगावत की दिशा क्या होगी।

