
फिल्म इंडस्ट्री में राजनीतिक दखल पर घमासान, क्या बदलेगा टॉलीवुड का भविष्य?
भाजपा विधायक पापिया अधिकारी के टॉलीवुड पुनर्गठन फैसले के बाद विरोध, हिंसा और राजनीतिक टकराव बढ़ गया है। कला और राजनीति के रिश्ते पर बहस तेज हो गई।
पश्चिम बंगाल की फिल्म नगरी टॉलीवुड (बांग्ला फिल्म और टीवी उद्योग) इन दिनों एक बड़े राजनीतिक विवाद के केंद्र में आ गई है। यह विवाद भाजपा विधायक पापिया अधिकारी द्वारा किए गए बड़े संगठनात्मक फेरबदल के बाद शुरू हुआ। पापिया अधिकारी अप्रैल में हुए विधानसभा चुनाव में दक्षिण कोलकाता की टॉलीगंज सीट से निर्वाचित हुई थीं, जहां टॉलीवुड इंडस्ट्री स्थित है।उनके फैसले के बाद विरोध प्रदर्शन, झड़पें और बंगाल की फिल्म इंडस्ट्री में राजनीति के प्रभाव को लेकर नई बहस छिड़ गई है।
भाजपा की जीत के बाद बदला माहौल
यह विवाद उस विधानसभा चुनाव के बाद सामने आया है जिसमें भाजपा ने बड़ी जीत दर्ज करते हुए तृणमूल कांग्रेस (टीएमसी) के कई मजबूत गढ़ों को ध्वस्त कर दिया। टॉलीवुड भी लंबे समय से टीएमसी के प्रभाव वाले क्षेत्रों में गिना जाता था।आरोप लगाए जाते रहे हैं कि टीएमसी और उसके स्थानीय नेताओं ने फिल्म उद्योग को अपनी जागीर बना लिया था, जहां काम के अवसर और फैसले राजनीतिक निष्ठा के आधार पर तय किए जाते थे। यहां तक कि पार्टी लाइन से अलग विचार रखने वाले कलाकारों और तकनीशियनों को काम से दूर रखने की संस्कृति विकसित होने के आरोप भी लगे।
फेडरेशन पर लगे गंभीर आरोप
टीएमसी समर्थित "फेडरेशन ऑफ सिने टेक्नीशियंस एंड वर्कर्स ऑफ ईस्टर्न इंडिया" (FCTWEI) लंबे समय से टॉलीवुड का सबसे प्रभावशाली संगठन माना जाता रहा है। इसका नेतृत्व स्वरूप बिस्वास कर रहे थे, जो पूर्व टीएमसी मंत्री अरूप बिस्वास के भाई हैं।इसी चुनाव में पापिया अधिकारी ने अरूप बिस्वास को हराया था।हाल ही में स्वरूप बिस्वास को कोलकाता पुलिस ने फिल्म उद्योग में कथित रंगदारी वसूली गिरोह चलाने और एक 42 वर्षीय मेकअप आर्टिस्ट से छेड़छाड़ के आरोप में गिरफ्तार किया, जिसके बाद विवाद और बढ़ गया।
पापिया अधिकारी का बड़ा फैसला
खुद एक वरिष्ठ अभिनेत्री रह चुकीं पापिया अधिकारी ने टॉलीवुड में स्वस्थ कार्य संस्कृति बहाल करने का वादा किया है।3 जून को उन्होंने घोषणा की कि FCTWEI को भंग कर दिया गया है और उसके तहत काम करने वाले 26 गिल्ड अब अस्तित्व में नहीं रहेंगे।उनकी जगह केंद्र सरकार में पंजीकृत "ईस्टर्न इंडिया मोशन पिक्चर्स एंड कल्चरल कॉन्फेडरेशन" पूरे उद्योग को एक छतरी के नीचे लाएगा।पापिया के अनुसार इस बदलाव का उद्देश्य उद्योग में पारदर्शिता, कार्यकुशलता और बेहतर समन्वय स्थापित करना है।
फैसले के बाद भड़का विरोध
हालांकि यह प्रशासनिक घोषणा जल्द ही खुले संघर्ष में बदल गई।घोषणा के अगले दिन टॉलीवुड के प्रमुख केंद्र "टेक्नीशियंस स्टूडियो" में दो गुटों के बीच हिंसक झड़पें हुईं। विरोध प्रदर्शन के दौरान पत्थर, ईंट और अंडे फेंके गए।इस हिंसा में कई लोग घायल हुए, जिनमें एक महिला मेकअप आर्टिस्ट भी शामिल थीं। घटनास्थल पर मौजूद कुछ पत्रकार भी चोटिल हुए।स्थिति को नियंत्रित करने के लिए रीजेंट पार्क पुलिस स्टेशन की पुलिस को हस्तक्षेप करना पड़ा।
विरोध करने वालों की दलील
पापिया अधिकारी के फैसले का विरोध करने वालों का कहना है कि यह पुनर्गठन बिना किसी परामर्श के थोप दिया गया।उनका आरोप है कि फेडरेशन और गिल्डों को भंग करने से पहले न तो कर्मचारियों और न ही सदस्यों से कोई राय ली गई।विरोधियों का दावा है कि मौजूदा ढांचे को खत्म करने से लगभग 10,000 कामगारों और उनके परिवारों पर असर पड़ सकता है।
समर्थकों का जवाब
नई व्यवस्था के समर्थकों ने इन चिंताओं को खारिज करते हुए कहा कि विरोधी चुनाव परिणामों को स्वीकार नहीं कर पा रहे हैं।उनका तर्क है कि उद्योग में सुधार और पारदर्शिता लाने के लिए यह कदम जरूरी था।
राजनीति और सिनेमा का पुराना रिश्ता
इस विवाद ने बंगाल में राजनीति और सिनेमा के रिश्ते पर भी नई बहस छेड़ दी है।वर्षों से टॉलीवुड और टीएमसी के बीच गहरे संबंध रहे हैं। कई अभिनेता और फिल्मी हस्तियां टीएमसी के टिकट पर चुनाव लड़कर सत्ता प्रतिष्ठान का हिस्सा बनीं।इसके साथ ही यह आरोप भी लगते रहे कि राजनीतिक निष्ठा के आधार पर लोगों को काम और प्रभाव मिलता था, जबकि अन्य लोगों को किनारे कर दिया जाता था।
चुनाव के बाद बदला माहौल
विधानसभा चुनाव परिणामों के बाद फिल्म उद्योग से जुड़े कई सेलिब्रिटी नेताओं को जनता के एक वर्ग की आलोचना का सामना करना पड़ा।कुछ पर सत्ता बदलने के बाद राजनीतिक रुख बदलने यानी "यू-टर्न" लेने के आरोप लगे।एक अभिनेता ने तो यहां तक कहा कि उसे अपने नवजात बेटे के लिए समझौता करना पड़ा, जबकि चुनाव के दौरान वह टीएमसी के लिए प्रचार करते दिखाई दिए थे।
कलाकारों की राजनीति में भागीदारी
बंगाल में कलाकारों का राजनीति में आना कोई नई बात नहीं है। टीएमसी से पहले वामपंथी शासन के दौरान भी फिल्मी हस्तियां राजनीति में प्रवेश करती रही हैं।हालांकि, दक्षिण भारत की तरह बंगाली फिल्म उद्योग के कलाकार कभी बड़े राजनीतिक सितारे नहीं बन सके।
असली सवाल: क्या कला राजनीति से अलग हो पाएगी?
फिलहाल विवाद फेडरेशन के नियंत्रण को लेकर है, लेकिन बड़ा सवाल बंगाल के फिल्म उद्योग की रचनात्मक स्वतंत्रता से जुड़ा हुआ है। क्या टॉलीवुड वास्तव में कला और राजनीति को अलग कर पाएगा? जब तक इस सवाल का स्पष्ट जवाब नहीं मिलता, तब तक बंगाल की फिल्म इंडस्ट्री में प्रभाव और नियंत्रण की यह लड़ाई जारी रहने की संभावना है।

