
फिर छूट गई कुर्सी, केरल कांग्रेस में रमेश चेन्निथला को बड़ा झटका
वी डी सतीशन को केरल कांग्रेस का चेहरा बनाए जाने से रमेश चेन्निथला फिर किनारे दिखे। लेकिन उन्होंने विरोध के बजाय संयम का रास्ता चुना।
कांग्रेस में केरल नेतृत्व को लेकर हुए ताजा घटनाक्रम ने रमेश चेन्निथला के राजनीतिक जीवन के एक पुराने पैटर्न को फिर से सामने ला दिया है — निजी महत्वाकांक्षा और संगठनात्मक अनुशासन के बीच का तनाव। “2021 में जब कई कारणों से हम चुनाव हार गए थे, तब मैं विपक्ष का नेता था और ज्यादातर विधायकों का समर्थन मेरे साथ था। लेकिन पार्टी ने नेतृत्व परिवर्तन के तहत वी डी सतीशन को विपक्ष का नेता नियुक्त करने का फैसला किया। उस फैसले से पहले मुझसे न तो सलाह ली गई और न ही मुझे भरोसे में लिया गया। इससे मुझे निराशा जरूर हुई, लेकिन मैंने इसे मुद्दा नहीं बनाया, यहां तक कि कोई शिकायत भी नहीं की।”
2026 विधानसभा चुनाव से पहले दिया गया चेन्निथला का यह बयान अब सिर्फ पुरानी याद नहीं, बल्कि आगे होने वाली घटनाओं की भूमिका जैसा लगने लगा है।पांच साल बाद, कांग्रेस हाईकमान ने वी डी सतीशन को कांग्रेस विधायक दल (CLP) का नेता और मुख्यमंत्री पद का चेहरा घोषित कर दिया है। एक बार फिर चेन्निथला खुद को ऐसे फैसले के सामने पा रहे हैं, जिसमें उन्हें दरकिनार कर दिया गया।फिर भी, असहमति जताने का उनका तरीका वही पुराना है। कोई खुला विद्रोह नहीं। वे विधायक दल की बैठक में शामिल नहीं हुए, लेकिन समर्थन का पत्र भेज दिया। यानी विरोध भी दर्ज कराया और संगठन से दूरी भी नहीं बनाई।
शुक्रवार को उन्होंने अपनी चुप्पी तोड़ी और कहा कि मंत्रिमंडल का गठन करना मुख्यमंत्री का विशेषाधिकार होता है।उन्होंने कहा, “कैबिनेट में किसे शामिल करना है, यह मुख्यमंत्री तय करेंगे।”इसे इस संकेत के तौर पर देखा जा रहा है कि वे सतीशन की कैबिनेट में शामिल होने के लिए तैयार हैं।
चेन्निथला ने कहा, “मैं हाईकमान के फैसले का स्वागत करता हूं। मुझे विश्वास है कि वी डी सतीशन को कांग्रेस-यूडीएफ कार्यकर्ताओं का पूरा समर्थन मिलेगा। मैं उन्हें शुभकामनाएं देता हूं।”लेकिन एक बार फिर यह स्थिति उनके लिए “होंठों तक आया प्याला छलक जाने” जैसी बन गई है।
करुणाकरण की राजनीति में गढ़े गए नेता
चेन्निथला की राजनीतिक यात्रा के करुणाकरण की विरासत से गहराई से जुड़ी रही है। वे करुणाकरण के करीबी नेताओं में उभरे और संगठन में उनकी मजबूत पकड़ का फायदा मिला।उन दिनों करुणाकरण के करीब होना सिर्फ राजनीतिक ताकत नहीं, बल्कि एक पहचान भी थी। इसी समर्थन ने चेन्निथला को केरल के सबसे युवा मंत्रियों में शामिल होने का मौका दिया और उन्हें संगठन में मजबूत आधार वाला नेता बना दिया।
बाद में उन्होंने करुणाकरण से दूरी बनाई और सुधारवादी खेमे में सक्रिय भूमिका निभाई। यह उनके राजनीतिक विकास का अहम दौर था। इससे यह भी साबित हुआ कि वे गुटबाजी के बीच खुद को बचाकर आगे बढ़ने की क्षमता रखते हैं। यही कौशल आगे कई बार उनके काम आया।
राजीव गांधी के दौर में राष्ट्रीय पहचान
राष्ट्रीय स्तर पर भी चेन्निथला का उभार कम महत्वपूर्ण नहीं था। 1980 के दशक के अंत में वे कांग्रेस के युवा चेहरों में गिने जाते थे और राजीव गांधी के पसंदीदा नेताओं में शामिल थे।वे और ममता बनर्जी उस दौर में यूथ कांग्रेस के सबसे चर्चित चेहरों में थे। खास बात यह थी कि दोनों वामपंथी प्रभाव वाले राज्यों से आते थे।
यह उनके लिए राष्ट्रीय पहचान बनाने का दौर था। लेकिन संगठनात्मक राजनीति पर उनकी पकड़, जो उनकी ताकत थी, वही बाद में उनकी सीमाएं भी बन गईं, क्योंकि कांग्रेस की राजनीति उनके आसपास काफी बदल चुकी थी।
गृह मंत्री रहते हुए विवाद
2013 से 2016 के बीच ओमन चांडी सरकार में गृह मंत्री के रूप में चेन्निथला को सिर्फ प्रशासनिक चुनौतियों ही नहीं, बल्कि प्रभावशाली सामुदायिक संगठनों के साथ रिश्तों को भी संभालना पड़ा।एनएसएस और उसके तत्कालीन महासचिव जी सुकुमारन नायर के साथ उनके संबंध राजनीतिक तनाव का कारण बने।
2011 में सुकुमारन नायर ने चेन्निथला को यूडीएफ सरकार में अहम पद देने की खुलकर वकालत की थी। उनका तर्क था कि सिर्फ एक सीट के बहुमत वाली सरकार उन्हें बाहर रखकर नहीं चल सकती।हालांकि शुरुआती दौर में चेन्निथला ने मंत्री बनने से खुद को पीछे रखा, जिससे एनएसएस नेतृत्व नाराज हो गया और रिश्तों में खटास आ गई।बाद में वे गृह मंत्री बने, लेकिन उस प्रकरण की कड़वाहट बनी रही।
गृह मंत्री के तौर पर उनके कामकाज पर विरोधियों ने कुछ मुद्दों पर “संघ परिवार समर्थक” होने के आरोप भी लगाए। हालांकि समर्थकों ने इसे महज राजनीतिक आरोप बताया।
विपक्ष के सबसे व्यवस्थित आलोचक
चेन्निथला का सबसे प्रमुख राजनीतिक दौर तब आया जब वे पिनराई विजयन सरकार के पहले कार्यकाल में विपक्ष के नेता बने।उन्होंने स्प्रिंकलर डेटा विवाद और शराब नीति जैसे मुद्दों पर लगातार अभियान चलाए और सरकार के सबसे व्यवस्थित आलोचक के रूप में खुद को स्थापित किया।उनकी राजनीति का तरीका टकराव से ज्यादा संस्थागत प्रक्रिया और लगातार दबाव बनाने पर आधारित था। कुछ समय तक यह रणनीति सफल भी रही।2018 की बाढ़ के दौरान उन्होंने विजयन के साथ मिलकर काम किया और राजनीतिक परिपक्वता दिखाई।लेकिन 2021 चुनाव के करीब आते-आते उनकी वह धार कमजोर पड़ने लगी। मुद्दों पर आधारित विपक्षी राजनीति को वे मजबूत चुनावी नैरेटिव में नहीं बदल पाए।
सोशल मीडिया के दौर में उनकी शैली पुरानी लगने लगी। जो चीज पहले उनकी “लगन” मानी जाती थी, वही बाद में मजाक का विषय बनने लगी।कोविड काल में उनकी टीम ने एक वीडियो जारी किया था, जिसमें वे खाड़ी देश में रहने वाले “उस्मान” नामक एनआरआई से फोन पर बात कर रहे थे और प्रवासी मलयालियों का हालचाल पूछ रहे थे। बाद में पता चला कि उस्मान कांग्रेस कार्यकर्ता थे।विपक्ष ने इसे मुद्दा बना लिया और सोशल मीडिया पर उनका खूब मजाक उड़ाया गया। यह सिर्फ संचार की विफलता नहीं थी, बल्कि समय और प्रस्तुति की भी चूक थी।
हार जिसने सब बदल दिया
2021 की चुनावी हार ने उनकी राजनीति की दिशा बदल दी। पार्टी ने नेतृत्व परिवर्तन करते हुए वी डी सतीशन को विपक्ष का नेता बना दिया, जबकि अधिकांश विधायक चेन्निथला के साथ थे।लेकिन अपनी पुरानी शैली के मुताबिक उन्होंने सार्वजनिक बगावत नहीं की। न कोई खुला विरोध, न कोई समानांतर शक्ति केंद्र।उनकी प्रतिक्रिया बेहद संयमित रही, लेकिन भीतर की नाराजगी बाद के बयानों में साफ झलकती रही।
पुराने कांग्रेस कल्चर का आखिरी चेहरा?
आने वाले वर्षों में जब वी डी सतीशन और के सी वेणुगोपाल से जुड़े गुटों के बीच तनाव खुलकर सामने आने लगा, तब चेन्निथला ने खुद को एक अलग और शांत भूमिका में रखा।कई मायनों में वे केरल कांग्रेस की उस पुरानी राजनीतिक संस्कृति के आखिरी बड़े प्रतीक बन गए, जहां सार्वजनिक टकराव की बजाय अंदरूनी बातचीत को महत्व दिया जाता था।हालांकि इसी संयम के लिए उनकी आलोचना भी होती रही। आज की राजनीति में जहां तेज बयानबाजी और आक्रामक छवि को ज्यादा महत्व मिलता है, वहां उनकी शैली कमजोर और धीमी नजर आती है।
दरकिनार, लेकिन अब भी टूटे नहीं
आज कांग्रेस ऐसे नेतृत्व को तरजीह देती दिखती है जो तेज संचार, स्पष्ट राजनीतिक आक्रामकता और केंद्रीकृत फैसलों के अनुरूप हो।इस माहौल में वी डी सतीशन पार्टी की पसंद बनकर उभरे हैं। उन्हें मौजूदा राजनीतिक दौर के हिसाब से ज्यादा उपयुक्त माना जा रहा है।चेन्निथला के लिए यह कोई अचानक आया झटका नहीं है। यह उसी लंबे सिलसिले का हिस्सा है जिसमें उन्हें अक्सर स्वीकार तो किया गया, लेकिन चुना नहीं गया।
अब सवाल यह नहीं है कि वे नाराज हैं या नहीं — वह साफ दिखता है। असली सवाल यह है कि क्या इस बार वे दशकों से बनाए संयम की सीमा पार करेंगे, या फिर पहले की तरह इस झटके को भी चुपचाप स्वीकार कर संगठन के भीतर बने रहेंगे।

