बंगाल में शिंदे मॉडल की आहट? रितब्रत बनर्जी ने बढ़ाई ममता की मुश्किलें
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बंगाल में 'शिंदे मॉडल' की आहट? रितब्रत बनर्जी ने बढ़ाई ममता की मुश्किलें

टीएमसी से निष्कासित रितब्रत बनर्जी को 58 बागी विधायकों का समर्थन मिला है। वे बंगाल की राजनीति में ममता बनर्जी के लिए नई चुनौती बनकर उभरे हैं।


पश्चिम बंगाल की राजनीति में इन दिनों एक नाम तेजी से चर्चा में है—रितब्रत बनर्जी। कई लोग उन्हें अब “बंगाल का एकनाथ शिंदे” कहने लगे हैं। यह तुलना महाराष्ट्र के उस राजनीतिक घटनाक्रम से की जा रही है, जिसमें एकनाथ शिंदे ने शिवसेना में बड़ी बगावत कर पार्टी को विभाजित कर दिया था और उद्धव ठाकरे को हाशिये पर धकेल दिया था।

टीएमसी में उथल-पुथल के केंद्र में रितब्रत

47 वर्षीय रितब्रत बनर्जी ने हाल ही में पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनाव में उलूबेरिया पूर्व विधानसभा क्षेत्र से पहली बार जीत हासिल की। लेकिन चुनावी जीत से अधिक वे तृणमूल कांग्रेस (टीएमसी) के भीतर पैदा हुए राजनीतिक संकट के कारण सुर्खियों में हैं।स्थिति इतनी बदल गई कि पार्टी से निष्कासित किए जाने के बावजूद वे विधानसभा में विपक्ष के नेता (Leader of Opposition) के रूप में उभरकर सामने आए। बताया जा रहा है कि टीएमसी के टिकट पर जीतकर आए 80 विधायकों में से 58 विधायकों का समर्थन उन्हें प्राप्त है।

निष्कासन के बाद बढ़ा कद

रितब्रत बनर्जी और एक अन्य विधायक संदीपन साहा को हाल ही में “पार्टी-विरोधी गतिविधियों” के आरोप में टीएमसी से निष्कासित कर दिया गया था। इसके बावजूद 2 जून को 58 बागी विधायकों ने उन्हें विधानसभा में अपना नेता चुन लिया।इस फैसले के जरिए उन्होंने सोवंदेब चट्टोपाध्याय को नकार दिया, जिन्हें चुनाव परिणाम आने के बाद ममता बनर्जी की पार्टी ने विपक्ष के नेता पद के लिए चुना था।

रितब्रत और संदीपन ने विधानसभा अध्यक्ष रथींद्र बोस को पत्र लिखकर आरोप लगाया था कि सोवंदेब चट्टोपाध्याय को विपक्ष का नेता बनाने संबंधी टीएमसी के पत्र में 14 विधायकों के हस्ताक्षर फर्जी थे। इस दावे की पुष्टि मुख्यमंत्री सुवेंदु अधिकारी ने भी की।

“हम ही असली विपक्ष हैं”

एक प्रेस कॉन्फ्रेंस में रितब्रत बनर्जी ने दावा किया कि उनकी टीम ही विधानसभा में “वास्तविक और मुख्य विपक्ष” है। उन्होंने यह भी कहा कि वे ममता बनर्जी को विधायक दल का मुख्य सलाहकार बनने की सलाह देंगे।हालांकि उन्होंने स्पष्ट किया कि उनके नेतृत्व वाले इस नए टीएमसी गुट का ममता बनर्जी के भतीजे अभिषेक बनर्जी से कोई संबंध नहीं है। अभिषेक को चुनावी पराजय के लिए व्यापक रूप से जिम्मेदार माना जा रहा है।राजनीतिक गलियारों में यह भी चर्चा है कि आने वाले दिनों में और अधिक असंतुष्ट विधायक रितब्रत के खेमे में शामिल हो सकते हैं।

क्या टीएमसी का चुनाव चिह्न भी छिन सकता है?

राजनीतिक विश्लेषक अब यह देखने के लिए उत्सुक हैं कि क्या रितब्रत बनर्जी और उनके समर्थक केवल संगठन तक सीमित रहेंगे या फिर महाराष्ट्र की तरह टीएमसी के ‘घास-फूल’ चुनाव चिह्न पर भी दावा ठोकेंगे।महाराष्ट्र में एकनाथ शिंदे ने शिवसेना पर नियंत्रण स्थापित किया था, जबकि दिवंगत अजित पवार ने अपने चाचा शरद पवार से राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी (एनसीपी) की कमान छीन ली थी। ऐसे में बंगाल में भी वैसी ही स्थिति बनने की अटकलें लगाई जा रही हैं।

कौन हैं रितब्रत बनर्जी?

रितब्रत बनर्जी का जन्म और पालन-पोषण कोलकाता में हुआ। राजनीतिक जीवन की शुरुआत उन्होंने वामपंथी छात्र राजनीति से की थी।1990 के दशक के उत्तरार्ध में वे कोलकाता के आशुतोष कॉलेज छात्रसंघ के महासचिव बने। बाद में वे भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी (मार्क्सवादी) [सीपीआई(एम)] से संबद्ध स्टूडेंट्स फेडरेशन ऑफ इंडिया (एसएफआई) के अखिल भारतीय महासचिव बने और 2008 से 2016 तक इस पद पर रहे।

35 वर्ष की आयु में राज्यसभा सदस्य

वर्ष 2014 में मात्र 35 वर्ष की उम्र में उन्हें सीपीआई(एम) ने राज्यसभा भेजा। उन्हें पश्चिम बंगाल के पूर्व मुख्यमंत्री Buddhadeb Bhattacharjee और सीपीआई(एम) के पूर्व महासचिव Sitaram Yechury का करीबी माना जाता था।लेकिन 2017 में कथित पार्टी-विरोधी गतिविधियों के आरोप में सीपीआई(एम) ने उन्हें निष्कासित कर दिया।

विवादों से भी रहा नाता

रितब्रत को उनके आलीशान जीवनशैली के कारण आलोचनाओं का सामना करना पड़ा। कई लोगों का मानना था कि उनका जीवन-स्तर साम्यवादी सादगी के आदर्शों से मेल नहीं खाता। उन पर सोशल मीडिया के अनुचित उपयोग के आरोप भी लगे थे और पार्टी के भीतर उनके खिलाफ शिकायतें दर्ज की गई थीं।

टीएमसी में प्रवेश और नई राजनीतिक उड़ान

सीपीआई(एम) से निकाले जाने के बाद कुछ वर्षों तक स्वतंत्र राजनीतिक भूमिका निभाने के पश्चात रितब्रत बनर्जी 2020 में टीएमसी में शामिल हो गए। 2024 में उन्हें दूसरी बार राज्यसभा भेजा गया। इस वर्ष उनका कार्यकाल समाप्त हुआ और उन्होंने विधानसभा चुनाव लड़ा, जिसमें वे विजयी रहे।सूत्रों के अनुसार, यदि टीएमसी चुनाव जीत जाती तो उन्हें मंत्रिमंडल में महत्वपूर्ण जिम्मेदारी भी मिल सकती थी।2020 से 2026 के बीच वे टीएमसी से संबद्ध श्रमिक संगठन इंडियन नेशनल तृणमूल ट्रेड यूनियन कांग्रेस (आईएनटीटीयूसी) के प्रदेश अध्यक्ष भी रहे।

पुराने आरोप और गिरफ्तारी

रितब्रत पर उनके कई पूर्व वामपंथी सहयोगियों ने आरोप लगाए थे कि 2013 में ममता बनर्जी के पहले कार्यकाल के दौरान, जब दिल्ली में तत्कालीन राज्य वित्त मंत्री अमित मित्रा पर हमला हुआ था, उसके बाद बंगाल में वामपंथी कार्यकर्ताओं और समर्थकों पर हुई हिंसा में उनकी भूमिका रही।इस मामले में उन्हें दिल्ली पुलिस ने गिरफ्तार भी किया था।

रितब्रत बनर्जी का राजनीतिक सफर छात्र राजनीति से लेकर राज्यसभा और अब बंगाल की सत्ता-समीकरणों के केंद्र तक पहुंच चुका है। सीपीआई(एम) से निष्कासन, टीएमसी में उभार, और अब पार्टी के भीतर विद्रोह का नेतृत्व—इन सबने उन्हें पश्चिम बंगाल की राजनीति का एक बेहद महत्वपूर्ण चेहरा बना दिया है। आने वाले समय में यह देखना दिलचस्प होगा कि क्या वे वास्तव में बंगाल की राजनीति में वही भूमिका निभाते हैं, जो महाराष्ट्र में एकनाथ शिंदे ने निभाई थी।

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