
हादसा या सोची-समझी साजिश? कोलकाता में 4000 से ज्यादा EVM खाक होने पर उठे गंभीर सवाल!
टीएमसी का सीधा आरोप है कि यह कोई मामूली या अचानक लगा शॉर्ट-सर्किट नहीं है, बल्कि चुनाव परिणामों को प्रभावित करने वाले सबूतों को मिटाने की एक सोची-समझी साजिश हो सकती है।
अलीपुर स्थित एक सरकारी इमारत में लगी भीषण आग में करीब 4,000 इलेक्ट्रॉनिक वोटिंग मशीनें (EVM) जलकर पूरी तरह राख हो गई हैं। जैसे ही यह खबर फैली, पूरे देश के राजनीतिक गलियारों में यह सवाल गूंजने लगा कि आखिर चुनाव खत्म होने के तुरंत बाद, इतनी सख्त सुरक्षा में रखी हजारों ईवीएम अचानक राख के ढेर में कैसे तब्दील हो गईं? विपक्ष अब इस पूरे मामले को सीधे-सीधे चुनावी धांधली और सबूत मिटाने की कोशिश से जोड़कर देख रहा है।
कैसे लगी आग और क्या-क्या हुआ स्वाहा?
यह दर्दनाक और हैरान करने वाला वाकया दक्षिण 24 परगना जिला परिषद (South 24 Parganas Zilla Parishad) की इमारत में पेश आया। शुरुआती जानकारी के मुताबिक, आग पहले इमारत की कुछ निचली मंजिलों पर लगी, लेकिन देखते ही देखते इसने ऊपर की उन मंजिलों को अपनी चपेट में ले लिया जहां चुनाव से जुड़ी मशीनें और सरकारी दस्तावेज बेहद सुरक्षित तरीके से स्टोर करके रखे गए थे।
अधिकारियों ने आधिकारिक तौर पर पुष्टि की है कि इस भयंकर आग में करीब 4,000 कंट्रोल यूनिट (CU), बैलेट यूनिट (BU) और वोटर वेरिफिएबल पेपर ऑडिट ट्रेल (VVPAT) मशीनें पूरी तरह नष्ट हो चुकी हैं। इतनी बड़ी संख्या में चुनावी साजो-सामान का जलना कोई सामान्य बात नहीं है। यह घटना ऐसे संवेदनशील समय पर हुई है जब पहले से ही विपक्षी दल चुनाव प्रक्रिया और ईवीएम की कार्यप्रणाली पर लगातार गंभीर सवाल खड़े कर रहे थे। ऐसे में इस अग्निकांड ने जलती आग में घी डालने का काम किया है।
टीएमसी और कांग्रेस ने खड़े किए तीखे सवाल
इस घटना के सामने आते ही तृणमूल कांग्रेस (TMC) ने सीधे फ्रंट फुट पर आकर मोर्चा संभाल लिया है। टीएमसी ने एक बेहद कड़ा और आक्रामक बयान जारी करते हुए दावा किया है कि इस इमारत में जिन ईवीएम को रखा गया था, वे कसबा, जादवपुर, बेहाला पूर्व, बेहाला पश्चिम, मटियाब्रूज और सातगाछिया जैसी बेहद महत्वपूर्ण विधानसभा सीटों से जुड़ी थीं। टीएमसी का सीधा आरोप है कि यह कोई मामूली या अचानक लगा शॉर्ट-सर्किट नहीं है, बल्कि चुनाव परिणामों को प्रभावित करने वाले सबूतों को मिटाने की एक सोची-समझी साजिश हो सकती है।
दूसरी तरफ, दिल्ली से कांग्रेस के वरिष्ठ नेता पवन खेड़ा ने भी इस मुद्दे पर चुनाव आयोग को कटघरे में खड़ा कर दिया है। पवन खेड़ा ने सोशल मीडिया और मीडिया के जरिए चुनाव आयोग से सीधे जवाब मांगते हुए पूछा कि क्या इन जलाई गई मशीनों का इस्तेमाल हालिया विधानसभा चुनावों में हुआ था? उन्होंने कहा कि जब तक चुनाव आयोग खुद सामने आकर इन नष्ट हुई मशीनों की वास्तविक स्थिति और स्टेटस को साफ नहीं करता, तब तक देश की जनता के मन में यह शक गहराता रहेगा कि यह हादसा था या फिर किसी गहरे राज को दफन करने की संदिग्ध कोशिश।
आग का 'असामान्य पैटर्न' और गहराता रहस्य
हालांकि, अभी तक आधिकारिक तौर पर ऐसा कोई ठोस सबूत सामने नहीं आया है जिससे यह साबित हो सके कि इस अग्निकांड के पीछे किसी तरह की चुनावी धोखाधड़ी या ईवीएम से छेड़छाड़ का हाथ था। लेकिन इस पूरे मामले में जो सबसे रहस्यमयी बात है, वह है आग फैलने का अजीबोगरीब तरीका (Pattern)।
दमकल विभाग के अधिकारियों के मुताबिक, आग की लपटें सबसे पहले इमारत की दूसरी और तीसरी मंजिल पर देखी गईं। लेकिन इसके बाद, आग ने सीधे आठवीं, नौवीं और दसवीं मंजिल को अपनी चपेट में ले लिया, जहाँ पर यह तमाम वीवीआईपी चुनावी मशीनें रखी हुई थीं। हैरान करने वाली बात यह है कि इस दौरान बीच की कई मंजिलें पूरी तरह सुरक्षित रहीं या उन्हें नाममात्र का नुकसान हुआ।
पश्चिम बंगाल के अग्निशमन सेवा मंत्री कौशिक चौधरी ने खुद इस बात को स्वीकार किया है कि आग फैलने का यह तरीका बेहद 'असामान्य' और चौंकाने वाला है। उन्होंने साफ शब्दों में कहा कि यह सामान्य शॉर्ट-सर्किट का मामला नहीं लगता, इसलिए इसमें किसी बाहरी तोड़फोड़ या बड़ी साजिश (Sabotage) की आशंका से बिल्कुल भी इनकार नहीं किया जा सकता।
साजिश या महज लापरवाही? जवाबदेही तय होना ज़रूरी
इस घटना ने अब जवाबदेही और सुरक्षा को लेकर एक बहुत बड़ी राष्ट्रीय बहस को जन्म दे दिया है। राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि अगर आगे चलकर जांच में यह साबित हो जाता है कि यह वाकई एक साजिश थी, तो जांच एजेंसियों को यह ढूंढना होगा कि आखिर इस आग से सीधे तौर पर किस राजनीतिक दल या व्यक्ति को फायदा पहुंचने वाला था? चुनाव के बाद किन सबूतों को छिपाने की कोशिश की जा रही थी?
वहीं, दूसरी तरफ अगर यह मान भी लिया जाए कि यह महज एक हादसा था, तो भी सुरक्षा व्यवस्था पर बहुत बड़े सवाल उठते हैं। कोई सरकारी तंत्र इतना लापरवाह कैसे हो सकता है कि जिस इमारत में लोकतंत्र की सबसे बड़ी पूंजी यानी जनता के वोट दर्ज करने वाली मशीनें रखी हों, वहां आग इतनी आसानी से कई मंजिलों तक फैल जाए और हजारों मशीनों को खाक कर दे?
चुनाव आयोग की चुप्पी और फोरेंसिक जांच पर टिकी निगाहें
इस पूरे हाई-वोल्टेज राजनीतिक ड्रामे के बीच, सबकी नजरें देश के निर्वाचन सदन यानी चुनाव आयोग पर टिकी हुई हैं। हालांकि, विपक्षी दलों द्वारा लगाए जा रहे इन तमाम गंभीर आरोपों पर चुनाव आयोग ने अभी तक सार्वजनिक रूप से कोई प्रतिक्रिया या स्पष्टीकरण जारी नहीं किया है। आयोग की यह चुप्पी विपक्ष के हमलों को और धार दे रही है।
फिलहाल, इस पूरे मामले की कमान फोरेंसिक टीमों (Forensic Teams) ने संभाल ली है। वैज्ञानिक और विशेषज्ञ इस बात की बारीकी से जांच कर रहे हैं कि आग की शुरुआत क्या वाकई किसी इलेक्ट्रिकल फॉल्ट की वजह से हुई, क्या यह प्रशासन की बड़ी लापरवाही का नतीजा थी, या फिर इसके पीछे किसी का जानबूझकर किया गया काला कारनामा था। जब तक इस जांच की अंतिम रिपोर्ट सामने नहीं आ जाती, तब तक 4,000 ईवीएम के खाक होने का यह मामला बंगाल से लेकर दिल्ली तक एक बहुत बड़ा राजनीतिक बारूद बना रहेगा, जो आने वाले दिनों में और जोर से फट सकता है।

