
60 साल की हुई शिवसेना: बाल ठाकरे की विरासत के तीन चरण और आज का संकट
शिवसेना की स्थापना के 60 साल पूरे। बाल ठाकरे के दौर से लेकर 2022 की शिंदे की बगावत तक, जानें कैसे दो धड़ों में बंटकर वजूद की लड़ाई लड़ रहे हैं 'बाघ'।
Shiv Sena's 60 Years of Journey: मराठी मानुष और कट्टर हिंदुत्व की बुलंद आवाज रही शिवसेना ने शुक्रवार (19 जून 2026) को अपने सफर के 60 साल पूरे कर लिए हैं। कार्टूनिस्ट और प्रखर राजनेता बाल ठाकरे (Balasaheb Thackeray) द्वारा 1966 में स्थापित इस क्षेत्रीय दल का छह दशकों का सफर बेहद उतार-चढ़ाव भरा रहा है। लेकिन अपनी हीरक जयंती (60वीं वर्षगांठ) के मौके पर आज यह पार्टी इतिहास के सबसे बड़े वजूद के संकट से जूझ रही है। 2022 में हुई एक ऐतिहासिक बगावत ने इस मजबूत 'बाघ' को दो धड़ों में बांट दिया। एक तरफ बाल ठाकरे के बेटे उद्धव ठाकरे हैं जो वजूद की लड़ाई लड़ रहे हैं, तो दूसरी तरफ एकनाथ शिंदे हैं जो तीर-कमान के साथ सत्ता में तो हैं लेकिन भाजपा की परछाई में सिमट गए हैं।
बगावतें पहले भी हुईं: जब राज ठाकरे ने छोड़ा था साथ
शिवसेना के लिए बगावत या अंदरूनी कलह कोई नई बात नहीं थी। बालासाहेब के दौर में भी छगन भुजबल, गणेश नाईक और नारायण राणे जैसे बड़े नेता पार्टी छोड़कर गए। लेकिन पार्टी को सबसे बड़ा पारिवारिक और भावनात्मक झटका तब लगा जब बालासाहेब के भतीजे और उनकी शैली की हुबहू नकल माने जाने वाले राज ठाकरे (Raj Thackeray) ने बगावत का बिगुल फूंक दिया।
उत्तराधिकार की जंग में उद्धव ठाकरे को आगे बढ़ाए जाने से नाराज होकर राज ठाकरे ने शिवसेना से नाता तोड़ लिया था। इसके बाद उन्होंने अपनी नई पार्टी 'महाराष्ट्र नवनिर्माण सेना' (MNS) का गठन किया और शिवसेना के 'मराठी मानुष' के कोर वोट बैंक में बड़ी सेंध लगाई थी। हालांकि, राज ठाकरे समेत अतीत के जितने भी नेता अलग हुए, वे पार्टी को दो फाड़ नहीं कर सके। इसके उलट, एकनाथ शिंदे की 2022 की बगावत ने न सिर्फ उद्धव से सत्ता छीनी, बल्कि शिवसेना का नाम और पहचान तक अपने नाम कर ली।
दोनों गुटों के सामने 'कांटों भरा' रास्ता: राजनीतिक विश्लेषकों की राय
सेंटर फॉर डेवलपिंग स्टडीज एंड सोसाइटीज (CSDS) के प्रोफेसर संजय कुमार और राजनीतिक विश्लेषक हेमंत देसाई के मुताबिक, दोनों धड़ों का vote share और प्रासंगिकता राष्ट्रीय स्तर पर कम हुई है और दोनों के सामने अलग-अलग चुनौतियां हैं:
शिवसेना (UBT - उद्धव ठाकरे गुट) का संकट: विधानसभा में 20 विधायकों के साथ यह विपक्ष का सबसे बड़ा दल जरूर है, लेकिन इसके सामने वजूद का संकट है। इसके पास न असली नाम है, न तीर-कमान का सिंबल। 25 साल से जिस बीएमसी (BMC) पर इनका निर्बाध राज था, 2026 के शुरुआती स्थानीय चुनावों में वहां भी भाजपा ने अपना मेयर बना लिया है। इसके अलावा, कट्टर हिंदुत्व का एजेंडा भी भाजपा ने इनसे पूरी तरह छीन लिया है।
शिवसेना (एकनाथ शिंदे गुट) की चुनौती: शिंदे गुट के पास उद्धव से तीन गुना अधिक विधायक हैं, और पार्टी का नाम व सिंबल भी इन्हीं के पास है। लेकिन सत्ता में होने के बावजूद यह दल पूरी तरह भाजपा (BJP) की छाया में जीता हुआ दिख रहा है। विश्लेषकों का मानना है कि धीरे-धीरे शिंदे गुट बिहार की जेडीयू (JDU) की तरह अपनी स्वतंत्र प्रासंगिकता खोने की ओर बढ़ रहा है।
भविष्य की उम्मीद: आदित्य ठाकरे पर दारोमदार
विशेषज्ञों का मानना है कि उद्धव ठाकरे के गुट के लिए एकमात्र उम्मीद की किरण (Silver Lining) यह है कि वे एक नई शुरुआत कर सकते हैं। हालांकि, इसके लिए उद्धव के बेटे और उनके उत्तराधिकारी आदित्य ठाकरे को जमीन पर उतरकर अत्यधिक संघर्ष और कड़ा परिश्रम करना होगा।
60 साल पूरे कर चुकी शिवसेना ने कई राजनीतिक चक्रवातों को झेला है, लेकिन 'ऑपरेशन टाइगर' की आहट और अपने ही गढ़ महाराष्ट्र में भाजपा से पिछड़कर दूसरे नंबर पर आ जाने के बाद, इस 'बाघ' की दहाड़ भविष्य में कितनी बुलंद रहेगी, इस पर सस्पेंस बरकरार है।

