‘ऑपरेशन टाइगर’ से बढ़ी हलचल, क्या शिंदे खेमे में जाएंगे उद्धव के सांसद?
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‘ऑपरेशन टाइगर’ से बढ़ी हलचल, क्या शिंदे खेमे में जाएंगे उद्धव के सांसद?

शिवसेना (यूबीटी) के छह सांसदों के शिंदे गुट में जाने की अटकलों ने महाराष्ट्र की राजनीति में हलचल बढ़ा दी है। इससे उद्धव ठाकरे की चुनौतियां गहरा सकती हैं।


शिवसेना (यूबीटी) के भीतर एक नया राजनीतिक संकट उभरता दिखाई दे रहा है। रिपोर्टों के अनुसार, उद्धव ठाकरे गुट के छह लोकसभा सांसद अलग होकर एक स्वतंत्र समूह बनाने की तैयारी में हैं और उनके महाराष्ट्र के उपमुख्यमंत्री एकनाथ शिंदे के नेतृत्व वाली शिवसेना में शामिल होने की संभावना है।यदि यह कदम वास्तविकता में बदलता है, तो संसद में शिंदे गुट की ताकत काफी बढ़ जाएगी और शिवसेना के 60वें स्थापना दिवस से पहले उद्धव ठाकरे की चुनौतियां और गहरी हो जाएंगी।

इस विषय पर कैपिटल बीट कार्यक्रम में द फेडरल के राजनीतिक संपादक पुनीत निकोलस यादव और वरिष्ठ पत्रकार योगेश पवार ने संभावित बगावत, उसके कारणों और महाराष्ट्र की राजनीति पर उसके प्रभावों पर चर्चा की।


सुनियोजित राजनीतिक कदम?

रिपोर्टों के मुताबिक, बागी सांसद 19 जून को औपचारिक रूप से शिंदे गुट की शिवसेना में विलय कर सकते हैं। दिलचस्प बात यह है कि यही दिन पार्टी के स्थापना दिवस समारोह का भी है।जिन सांसदों के नाम इस संभावित घटनाक्रम से जुड़े बताए जा रहे हैं, उनमें संजय जाधव, बाबूराव कदम वकचौरे, संजय देशमुख, नागेश पाटिल अष्टीकर, ओम राजेनिंबालकर और संजय दीना पाटिल शामिल हैं।

यदि यह विलय होता है, तो लोकसभा में शिंदे गुट की संख्या में उल्लेखनीय वृद्धि होगी और राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन (एनडीए) के भीतर उसकी स्थिति और मजबूत होगी।साथ ही यह सवाल भी उठ रहा है कि क्या उद्धव ठाकरे अपनी पार्टी में आगे होने वाले नुकसान को रोक पाएंगे या महाराष्ट्र में भी वैसा ही राजनीतिक घटनाक्रम देखने को मिलेगा जैसा हाल के वर्षों में देश के अन्य हिस्सों में देखने को मिला है।

अफवाहें बनती दिख रही हैं हकीकत

वरिष्ठ पत्रकार योगेश पवार के अनुसार, 2022 में शिवसेना के विभाजन के बाद से ही नए टूट की अटकलें लगाई जाती रही हैं।उनका कहना है कि लंबे समय से यह चर्चा थी कि उद्धव ठाकरे के और नेता भी उनका साथ छोड़ सकते हैं। हालांकि हाल तक यूबीटी खेमे के नेता इन दावों को खारिज करते रहे, लेकिन अब घटनाक्रम उसी दिशा में बढ़ता दिखाई दे रहा है।

पवार का मानना है कि यह घटनाक्रम एकनाथ शिंदे के उस दावे को और मजबूती दे सकता है कि उनका गुट ही बालासाहेब ठाकरे की राजनीतिक विरासत का वास्तविक प्रतिनिधि है, भले ही सभी लोग इस दावे से सहमत न हों।उन्होंने बताया कि पिछले एक सप्ताह से दल-बदल की चर्चाएं तेज हो गई थीं और संकेत मिल रहे थे कि कोई बड़ा बदलाव होने वाला है।

आखिर अभी क्यों?

जब उनसे पूछा गया कि 2022 के विभाजन के दौरान उद्धव ठाकरे के साथ खड़े रहने वाले सांसद अब पाला क्यों बदल सकते हैं, तो पवार ने कहा कि इसके पीछे कई प्रकार के दबाव हो सकते हैं।उन्होंने दावा किया कि राजनीतिक दबाव और जांच एजेंसियों की कार्रवाई आज भारतीय राजनीति का एक सामान्य हिस्सा बन चुके हैं। कई नेताओं को व्यक्तिगत या वित्तीय मामलों में जांच का सामना करना पड़ता है, जिससे राजनीतिक निष्ठा बदलने के लिए परिस्थितियां बन सकती हैं।

पवार ने यह भी कहा कि सांसदों को यह चिंता हो सकती है कि यदि वे सत्ता पक्ष से बाहर रहते हैं तो अपने निर्वाचन क्षेत्रों के विकास के लिए पर्याप्त संसाधन और फंड नहीं जुटा पाएंगे।उनके अनुसार, क्षेत्रीय विकास, राजनीतिक अस्तित्व और व्यक्तिगत कमजोरियां—ये सभी मिलकर नेताओं के निर्णयों को प्रभावित कर सकती हैं। उन्होंने जोर देकर कहा कि इन घटनाओं को अलग-अलग मामलों के रूप में नहीं, बल्कि व्यापक राजनीतिक प्रवृत्ति के हिस्से के रूप में देखा जाना चाहिए।

‘ऑपरेशन टाइगर’ की चर्चा

बगावत की खबरों के बीच मुंबई के कई हिस्सों में कथित तौर पर ‘ऑपरेशन टाइगर’ लिखे पोस्टर दिखाई दिए।इसके बाद शिवसेना (यूबीटी) ने अपने सांसदों को नई दिल्ली में होने वाली बैठक में शामिल होने के लिए व्हिप जारी किया।रिपोर्टों के अनुसार, पार्टी बैठक में अनुपस्थित रहने वाले सांसदों के खिलाफ अयोग्यता (डिस्क्वालिफिकेशन) की कार्रवाई शुरू कर सकती है।इन घटनाओं ने पार्टी के भीतर तनाव बढ़ा दिया है और संभावित टूट की अटकलों को और बल दिया है।

संसद में संख्या का महत्व

पुनीत निकोलस यादव ने इस संभावित विभाजन के संसदीय प्रभावों पर प्रकाश डाला।उनके अनुसार, इस पूरे घटनाक्रम का सबसे बड़ा महत्व संसद में संख्या बल से जुड़ा है। उनका मानना है कि एनडीए भविष्य में संभावित संवैधानिक और विधायी पहलों को ध्यान में रखते हुए अपनी ताकत बढ़ाने की कोशिश कर रहा है।उन्होंने परिसीमन (Delimitation), संसद के पुनर्गठन और महिला आरक्षण जैसे मुद्दों का उल्लेख करते हुए कहा कि संवैधानिक संशोधनों के लिए दो-तिहाई बहुमत की आवश्यकता होती है।

यदि शिवसेना (यूबीटी) के सांसद एनडीए के साथ आते हैं, तो गठबंधन की संख्या और बढ़ेगी, हालांकि वह तब भी दो-तिहाई बहुमत से दूर रहेगा।इसका व्यापक उद्देश्य अतिरिक्त संसदीय समर्थन जुटाकर राजनीतिक शक्ति का और अधिक केंद्रीकरण करना है।

जनादेश और लोकतंत्र का सवाल

यादव ने कहा कि यह मामला केवल संसदीय गणित तक सीमित नहीं है।उन्होंने तर्क दिया कि कई निर्वाचन क्षेत्रों के मतदाताओं ने एकनाथ शिंदे समर्थित उम्मीदवारों को नकारकर उद्धव ठाकरे गुट के उम्मीदवारों को चुना था।ऐसी स्थिति में चुनाव जीतने के बाद दल बदलना मतदाताओं द्वारा दिए गए जनादेश के साथ विश्वासघात माना जा सकता है।

हालांकि राजनीतिक दल ऐसे कदमों का अपने-अपने तरीके से बचाव करते हैं, लेकिन चुनाव किसी और दल के नाम पर जीतने के बाद पाला बदलना लोकतांत्रिक मूल्यों से जुड़े गंभीर प्रश्न खड़े करता है।यादव के अनुसार, यह प्रवृत्ति इस बात का संकेत भी है कि विपक्षी दल लगातार विघटन और टूट-फूट के प्रति अधिक संवेदनशील होते जा रहे हैं।

उद्धव ठाकरे के सामने कठिन चुनौतियां

दोनों विशेषज्ञों ने माना कि उद्धव ठाकरे के सामने आने वाला समय आसान नहीं है।योगेश पवार का मानना है कि पूर्व मुख्यमंत्री के पास सबसे बेहतर विकल्प जमीनी राजनीति में लौटना और सीधे मतदाताओं से संवाद बढ़ाना है।उन्होंने कहा कि शिवसेना ने ऐतिहासिक रूप से सड़क स्तर के आंदोलनों और जनसंपर्क के जरिए अपनी ताकत बनाई थी। यदि पार्टी राजनीतिक पुनरुत्थान चाहती है, तो उसे उसी शैली को फिर से अपनाना होगा।

पवार का यह भी कहना है कि जनता के एक वर्ग में अभी भी उद्धव ठाकरे के प्रति सहानुभूति मौजूद है, जो उन्हें राजनीतिक विश्वासघात का शिकार मानता है। यदि इस भावनात्मक समर्थन को सही तरीके से संगठित किया जाए तो यह राजनीतिक लाभ में बदल सकता है।

संस्थाओं की भूमिका पर सवाल

चर्चा के दौरान संवैधानिक संस्थाओं की भूमिका पर भी सवाल उठे।पुनीत यादव ने संदेह व्यक्त किया कि केवल अयोग्यता याचिकाएं इस समस्या का समाधान कर पाएंगी। उन्होंने कहा कि अतीत में ऐसे कई मामले वर्षों तक कानूनी और प्रक्रियागत विवादों में उलझे रहे हैं।उनके अनुसार, फैसले आने तक अक्सर राजनीतिक परिस्थितियां बदल जाती हैं और कानूनी उपाय अप्रभावी हो जाते हैं।

योगेश पवार ने भी सवाल उठाया कि क्या संस्थागत हस्तक्षेप वास्तव में कोई सार्थक राहत दे पाएंगे। उनका मानना है कि आज राजनीतिक संघर्षों का फैसला संवैधानिक सुरक्षा उपायों की तुलना में शक्ति संतुलन के आधार पर अधिक हो रहा है।दोनों विशेषज्ञों ने कहा कि विपक्षी दलों को कानूनी उपायों के साथ-साथ जनआंदोलन और जनसंपर्क पर अधिक भरोसा करना पड़ सकता है।

निर्णायक मोड़ पर महाराष्ट्र की राजनीति

यदि छह सांसद औपचारिक रूप से एकनाथ शिंदे के खेमे में शामिल हो जाते हैं, तो यह उद्धव ठाकरे और शिवसेना (यूबीटी) के लिए एक और बड़ा झटका होगा।इससे संसद में एनडीए की स्थिति और मजबूत होगी, वहीं राजनीतिक निष्ठा, दलबदल विरोधी कानून और लोकतांत्रिक संस्थाओं की स्थिति को लेकर नए सवाल खड़े होंगे।उद्धव ठाकरे आगे और टूट-फूट रोक पाएंगे या जनता की सहानुभूति को राजनीतिक समर्थन में बदल पाएंगे, यह अभी स्पष्ट नहीं है। लेकिन इतना तय है कि महाराष्ट्र की राजनीति एक बार फिर उथल-पुथल के दौर में प्रवेश कर रही है, जिसके प्रभाव राज्य की सीमाओं से कहीं आगे तक महसूस किए जा सकते हैं।

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