क्या सिद्धारमैया बन सकते हैं कांग्रेस का राष्ट्रीय ओबीसी चेहरा?
x

क्या सिद्धारमैया बन सकते हैं कांग्रेस का राष्ट्रीय ओबीसी चेहरा?

सिद्धारमैया के इस्तीफे के बाद कर्नाटक और राष्ट्रीय राजनीति में उनकी नई भूमिका पर चर्चा तेज हो गई है। उन्हें कांग्रेस का बड़ा ओबीसी चेहरा माना जा रहा है।


कर्नाटक की राजनीति में उस समय हलचल तेज हो गई जब मुख्यमंत्री पद से सिद्धारमैया के इस्तीफे के बाद राज्य के राजनीतिक भविष्य को लेकर अटकलें बढ़ने लगीं। इस बीच लेखक और दलित चिंतक कांचा इलैया शेफर्ड ने कहा कि सिद्धारमैया के पास ऐसा राजनीतिक कद है कि वे राष्ट्रीय स्तर पर एक मजबूत ओबीसी चेहरे के रूप में उभर सकते हैं, जो प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को राजनीतिक चुनौती देने की क्षमता रखते हैं। उन्होंने यह भी कहा कि सिद्धारमैया भविष्य में कांग्रेस के प्रधानमंत्री पद के संभावित चेहरे बन सकते हैं।

यह चर्चा ऐसे समय में हो रही है जब कर्नाटक में कांग्रेस नेतृत्व परिवर्तन को बेहद सावधानी से संभाल रही है। माना जा रहा है कि उपमुख्यमंत्री डीके शिवकुमार जल्द ही राज्य की कमान संभाल सकते हैं। इसके साथ ही अब यह सवाल भी उठने लगा है कि सिद्धारमैया की ‘अहिंदा राजनीति’ और 2028 के कर्नाटक विधानसभा चुनावों के लिए कांग्रेस की चुनावी रणनीति का भविष्य क्या होगा।

‘कैपिटल बीट’ कार्यक्रम में द फेडरल ने कांचा इलैया शेफर्ड, राजनीतिक विश्लेषक प्रीति नागराज और वरिष्ठ पत्रकार डी उमापति से बातचीत की। चर्चा का केंद्र सिद्धारमैया के इस्तीफे के राजनीतिक और सामाजिक प्रभावों तथा कांग्रेस के आगे के रास्ते पर रहा।

सहज नेतृत्व परिवर्तन

पैनल में शामिल अधिकांश विशेषज्ञों का मानना था कि सिद्धारमैया से डीके शिवकुमार तक नेतृत्व परिवर्तन अब तक काफी सहज और शांतिपूर्ण रहा है, हालांकि सिद्धारमैया समर्थकों की भावनात्मक प्रतिक्रियाएं देखने को मिलीं।प्रीति नागराज ने कहा कि जब सिद्धारमैया से पद छोड़ने के लिए कहा गया तो वे शुरुआत में हैरान नजर आए, लेकिन पिछले कुछ हफ्तों से उन्हें इस बदलाव का आभास हो गया था।

उन्होंने सिद्धारमैया को कांग्रेस में “लेटरल एंट्री” वाला नेता बताया। उनका कहना था कि सिद्धारमैया ने दशकों तक कांग्रेस का विरोध किया और बाद में 2006 में ‘अहिंदा’ (अल्पसंख्यक, पिछड़ा वर्ग और दलित) आंदोलन खड़ा करने के बाद पार्टी में शामिल हुए।साथ ही उन्होंने यह भी कहा कि कांग्रेस नेतृत्व को डीके शिवकुमार को भी उचित स्थान देना जरूरी था, क्योंकि वे अपने पूरे राजनीतिक जीवन में पार्टी के प्रति वफादार रहे हैं।

अहिंदा राजनीति पर चिंता

वरिष्ठ पत्रकार डी उमापति ने चेतावनी दी कि यदि कांग्रेस नेतृत्व ने इस बदलाव को सावधानी से नहीं संभाला, तो सिद्धारमैया के हटने के साथ कर्नाटक में ‘अहिंदा राजनीति’ का एक अध्याय समाप्त हो सकता है।उनके अनुसार सिद्धारमैया अब कर्नाटक की राजनीति से आगे निकल चुके हैं और कांग्रेस में उन्हें राष्ट्रीय स्तर पर बड़ी भूमिका मिलनी चाहिए।

हालांकि उन्होंने कांग्रेस के भीतर किसी तत्काल बगावत की संभावना को खारिज किया। उन्होंने कहा कि सिद्धारमैया ने पार्टी हाईकमान के फैसले को स्वीकार कर लिया है और वे नेतृत्व परिवर्तन में सहयोग करेंगे।फिर भी उमापति ने कहा कि भविष्य में अहिंदा राजनीति कितनी मजबूत रहेगी, यह इस बात पर निर्भर करेगा कि नेतृत्व परिवर्तन के बाद कांग्रेस पिछड़े वर्गों में सिद्धारमैया के समर्थन आधार को कितनी मजबूती से बनाए रख पाती है।

कैबिनेट समीकरण

चर्चा में संभावित शिवकुमार कैबिनेट की संरचना पर भी बात हुई।प्रीति नागराज ने कहा कि कांग्रेस 2028 के चुनावों को ध्यान में रखते हुए जातीय और सामाजिक संतुलन साधने की कोशिश करेगी।उनके अनुसार संभावित उपमुख्यमंत्रियों में मुस्लिम, दलित और लिंगायत समुदायों के प्रतिनिधियों को शामिल किया जा सकता है, ताकि वह सामाजिक गठबंधन मजबूत बना रहे जिसने कांग्रेस को सत्ता में वापसी दिलाई।

उन्होंने यह भी संकेत दिया कि सिद्धारमैया के करीबी कुछ मंत्रियों को कैबिनेट में बनाए रखा जा सकता है, जिससे निरंतरता बनी रहे और उनके समर्थकों में असंतोष न फैले।नागराज ने आगे दावा किया कि सिद्धारमैया के पुत्र डॉ. यतींद्र सिद्धारमैया का नाम भी संभावित उपमुख्यमंत्री उम्मीदवार के रूप में चर्चा में है। इसे सिद्धारमैया समर्थकों को संतुष्ट करने की रणनीति के तौर पर देखा जा रहा है।उन्होंने सिद्धारमैया को “कुर्सी से बड़ा नेता” बताया और कहा कि यह बदलाव उन्हें राष्ट्रीय स्तर का नेता बनने का अवसर दे सकता है।

राष्ट्रीय राजनीति में भूमिका

चर्चा के दौरान कांचा इलैया शेफर्ड ने सबसे प्रभावशाली राजनीतिक टिप्पणी की। उन्होंने कहा कि सिद्धारमैया को दिल्ली जाना चाहिए और भविष्य में मल्लिकार्जुन खड़गे के बाद कांग्रेस अध्यक्ष पद संभालना चाहिए।उन्होंने कहा कि सिद्धारमैया की लोकप्रियता केवल कर्नाटक तक सीमित नहीं है, बल्कि पिछड़ा वर्ग राजनीति, धर्मनिरपेक्षता और राम मनोहर लोहिया की समाजवादी परंपराओं से उनके लंबे जुड़ाव के कारण उनका प्रभाव राष्ट्रीय स्तर तक फैला हुआ है।

उन्होंने जातिगत जनगणना की राजनीति को आगे बढ़ाने में सिद्धारमैया की भूमिका का भी उल्लेख किया और उन्हें एक प्रतिबद्ध “मंडलवादी” नेता बताया।शेफर्ड के अनुसार भाजपा का मुकाबला करने के लिए कांग्रेस को एक मजबूत ओबीसी नेता की आवश्यकता है।उन्होंने कहा कि मंडल राजनीति के बाद कांग्रेस ने ओबीसी नेतृत्व को पर्याप्त महत्व नहीं देकर ऐतिहासिक गलती की। उनके मुताबिक सिद्धारमैया की राजनीतिक संवाद क्षमता और जातीय समीकरणों की समझ कांग्रेस को राष्ट्रीय स्तर पर नई दिशा दे सकती है।

प्रधानमंत्री पद की संभावना

चर्चा उस समय और अधिक दिलचस्प हो गई जब कांचा इलैया शेफर्ड ने कहा कि यदि कांग्रेस राष्ट्रीय स्तर पर सत्ता में लौटती है, तो सिद्धारमैया प्रधानमंत्री पद के संभावित चेहरे के रूप में भी उभर सकते हैं।उन्होंने कहा, “सिद्धारमैया प्रधानमंत्री के रूप में काम कर सकते हैं।”शेफर्ड का तर्क था कि वंशवाद की राजनीति को लेकर भाजपा के हमलों का जवाब देने के लिए कांग्रेस को दक्षिण भारत से एक मजबूत ओबीसी नेता की जरूरत है।

उन्होंने सिद्धारमैया को जनाधार वाला सक्षम प्रशासक बताया और कर्नाटक में उनके लंबे प्रशासनिक अनुभव का उल्लेख किया।उन्होंने यह भी कहा कि सिद्धारमैया कर्नाटक के सबसे लंबे समय तक सेवा देने वाले मुख्यमंत्रियों में से एक रहे हैं और अपने राजनीतिक जीवन में 18 राज्य बजट पेश कर चुके हैं।

बड़ा राजनीतिक कैनवास

चर्चा के अंत में पैनल इस निष्कर्ष पर पहुंचा कि सिद्धारमैया का इस्तीफा शायद उनकी राजनीतिक संभावनाओं को सीमित करने के बजाय और विस्तृत कर सकता है।प्रीति नागराज ने कहा कि अब सिद्धारमैया राज्य राजनीति की सीमाओं से बाहर निकल सकते हैं।डी उमापति ने भी इस विचार का समर्थन करते हुए कहा कि कांग्रेस को सिद्धारमैया को केवल कर्नाटक की राजनीति तक सीमित रखकर “व्यर्थ” नहीं करना चाहिए।

एक तरफ जहां डीके शिवकुमार कर्नाटक की कमान संभालने की तैयारी कर रहे हैं, वहीं दूसरी ओर इस चर्चा ने कांग्रेस के भीतर एक बड़े सवाल को सामने ला दिया है—क्या सिद्धारमैया का भविष्य अब बेंगलुरु में नहीं, बल्कि दिल्ली में है, जहां कांग्रेस व्यापक सामाजिक न्याय की राष्ट्रीय राजनीति की तलाश कर रही है।

Read More
Next Story