
आदिवासी आरक्षण और धर्मांतरण पर नया विवाद, पूर्वोत्तर में बढ़ी बेचैनी
असम में UCC बिल से पहले JSM ने धर्मांतरण करने वाले आदिवासियों से ST दर्जा हटाने की मांग तेज कर दी है, जिस पर राजनीतिक विवाद बढ़ गया है।
असम में समान नागरिक संहिता (UCC) लागू करने को लेकर राजनीतिक और सामाजिक बहस तेज होती जा रही है। इसी बीच RSS समर्थित जनजाति सुरक्षा मंच (JSM) ने एक बार फिर मांग उठाई है कि ईसाई या इस्लाम धर्म अपनाने वाले आदिवासियों से अनुसूचित जनजाति (ST) का दर्जा वापस लिया जाए। यह विवादास्पद मांग ऐसे समय सामने आई है जब असम सरकार 26 मई 2026 को विधानसभा में UCC विधेयक पेश करने की तैयारी कर रही है। वहीं पड़ोसी राज्य अरुणाचल प्रदेश भी स्वदेशी आस्थाओं और पारंपरिक मान्यताओं की रक्षा के उद्देश्य से अरुणाचल प्रदेश फ्रीडम ऑफ रिलिजन एक्ट (APFRA), 1978 को लागू करने की दिशा में आगे बढ़ रहा है।
आदिवासी सांस्कृतिक लामबंदी
इसी पृष्ठभूमि में जनजाति सुरक्षा मंच ने 24 मई को नई दिल्ली के लाल किला मैदान में “दिल्ली चलो” कार्यक्रम आयोजित करने की घोषणा की है। “ट्राइबल कल्चरल कॉन्क्लेव 2026” नामक यह आयोजन आदिवासी स्वतंत्रता सेनानी और जननायक बिरसा मुंडा की 150वीं जयंती के अवसर पर किया जा रहा है।
संगठन के अनुसार, इस सम्मेलन में देशभर की 500 से अधिक जनजातीय समुदायों के 1.5 लाख से ज्यादा लोगों के शामिल होने की उम्मीद है। JSM के पूर्वोत्तर संयोजक बिनुद कुम्बांग ने कहा कि यह राष्ट्रीय राजधानी में आयोजित होने वाली सबसे बड़ी आदिवासी सांस्कृतिक लामबंदियों में से एक होगी।
उन्होंने बताया कि देशभर से लोग अपने खर्च पर दिल्ली पहुंचेंगे और पारंपरिक आदिवासी पोशाक, रीति-रिवाज और सांस्कृतिक परंपराओं को प्रदर्शित करते हुए सांस्कृतिक जुलूस में हिस्सा लेंगे। कुम्बांग ने कहा, “पहली बार देशभर के आदिवासी समुदाय इतने बड़े स्तर पर धर्म, संस्कृति और परंपरा से जुड़े मुद्दों पर दिल्ली में एकत्र हो रहे हैं।”
उन्होंने बताया कि यह सांस्कृतिक जुलूस दिल्ली के पांच अलग-अलग स्थानों से शुरू होगा, जो आदिवासी विविधता का प्रतीक होगा, और बाद में लाल किला मैदान में विशाल जनसभा में बदल जाएगा।कुम्बांग ने यह भी कहा कि केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह ने मुख्य अतिथि के रूप में कार्यक्रम में शामिल होने का निमंत्रण स्वीकार कर लिया है।
धर्मांतरण रोकने की मांग
इस सम्मेलन में उठाई जाने वाली प्रमुख मांगों में से एक यह होगी कि ईसाई या इस्लाम धर्म अपनाने वाले आदिवासियों को अनुसूचित जनजाति सूची से हटाया जाए। संगठन का तर्क है कि जो लोग अपने “मूल आदिवासी धर्म” को छोड़कर अन्य धर्म अपनाते हैं और पारंपरिक आदिवासी रीति-रिवाज, अनुष्ठान तथा सांस्कृतिक परंपराओं का पालन नहीं करते, उन्हें ST वर्ग के लिए निर्धारित संवैधानिक संरक्षण और आरक्षण का लाभ नहीं मिलना चाहिए।
JSM नेताओं का कहना है कि यह मांग आदिवासी पहचान, भाषा, संस्कृति और पारंपरिक आस्थाओं की रक्षा से जुड़ी हुई है। संगठन ने आदिवासी समुदायों में “अवैध और अनैतिक धर्मांतरण” को रोकने के लिए केंद्र सरकार से कड़े कानून की भी मांग की है।
JSM की मांग संविधान के अनुच्छेद 342A में संशोधन से जुड़ी है, जिसके तहत राष्ट्रपति अनुसूचित जनजातियों की सूची अधिसूचित करते हैं और संसद उसमें बदलाव कर सकती है।
संगठन चाहता है कि यदि कोई आदिवासी ईसाई या इस्लाम धर्म अपनाता है तो उसका ST दर्जा स्वतः समाप्त हो जाए। JSM नेताओं का दावा है कि धर्मांतरित आदिवासी एक तरफ आरक्षण और सरकारी योजनाओं का लाभ लेते हैं, वहीं दूसरी ओर धार्मिक अल्पसंख्यकों के लिए उपलब्ध सुविधाओं का भी फायदा उठाते हैं। उनका कहना है कि इससे गैर-धर्मांतरित आदिवासी समुदायों के साथ असंतुलन और अन्याय पैदा होता है।संगठन का यह भी कहना है कि बड़े पैमाने पर धर्मांतरण के कारण कई आदिवासी समुदाय धीरे-धीरे अपनी पारंपरिक भाषा, संस्कृति और अनुष्ठानों से दूर होते जा रहे हैं।
पूर्वोत्तर में पुराना मुद्दा
यह मुद्दा असम और पूर्वोत्तर भारत में नया नहीं है। 26 मार्च 2023 को JSM ने गुवाहाटी में “चलो दिसपुर” रैली आयोजित की थी, जिसमें असम और पूर्वोत्तर की आदिवासी संस्कृति और पहचान की रक्षा की मांग उठाई गई थी।
संगठन ने दावा किया था कि इस रैली में बोडो, राभा, मिशिंग, डिमासा, तिवा, कार्बी, चाय जनजाति और सोनोवाल कछारी समेत विभिन्न समुदायों के एक लाख से अधिक लोग शामिल हुए थे।उस रैली में भी संगठन ने आरोप लगाया था कि आदिवासी समुदाय “अनैतिक धर्मांतरण” का शिकार हो रहे हैं और पारंपरिक संस्कृति तथा रीति-रिवाजों की रक्षा के लिए कानूनी सुरक्षा की मांग की थी।
मांग का विरोध तेज
हालांकि धर्मांतरित आदिवासियों को ST सूची से हटाने की मांग का कानूनी विशेषज्ञों, चर्च संगठनों और नागरिक समाज के कई वर्गों ने कड़ा विरोध किया है।गुवाहाटी हाई कोर्ट के वरिष्ठ अधिवक्ता और पूर्व सांसद राम प्रसाद शर्मा ने इस मांग को खारिज करते हुए कहा कि अनुसूचित जनजाति का दर्जा धर्म के आधार पर नहीं दिया जाता।
उन्होंने कहा, “ST दर्जा धर्म के आधार पर नहीं मिलता। इसलिए धर्मांतरण करने वाले आदिवासियों को सूची से हटाने का सवाल ही नहीं उठता। यह पूरी तरह बेतुकी मांग है।”
वहीं, नॉर्थईस्ट कैथोलिक रिसर्च फोरम (NECARF) के संपादक जॉन एस. शिल्शी ने कहा कि JSM का तर्क इस धारणा पर आधारित है कि धर्मांतरण होते ही व्यक्ति अपनी आदिवासी पहचान से कट जाता है।उन्होंने कहा कि पूर्वोत्तर के कई ईसाई आदिवासी समुदाय आज भी अपनी पारंपरिक संस्कृति, भाषाओं और सामाजिक रीति-रिवाजों को संरक्षित किए हुए हैं।
ईसाई धर्म पर आरोपों का जवाब
शिल्शी ने आदिवासी समुदायों को धर्मांतरण का “आसान शिकार” बताने वाली सोच की भी आलोचना की। उनका कहना था कि इस तरह की बातें आदिवासियों की समझ और स्वतंत्र निर्णय क्षमता पर सवाल खड़े करती हैं।ईसाई धर्म पर विदेशी प्रभाव बढ़ाने के आरोपों को खारिज करते हुए उन्होंने कहा कि पूर्वोत्तर के चर्च अब पूरी तरह स्थानीय समुदायों और नेताओं द्वारा संचालित किए जाते हैं।उन्होंने कहा कि चर्चों ने आदिवासी भाषाओं और परंपराओं को बचाने में बड़ी भूमिका निभाई है, क्योंकि धार्मिक ग्रंथ, भजन और शिक्षाएं स्थानीय आदिवासी भाषाओं में उपलब्ध कराई गई हैं।शिल्शी ने यह भी कहा कि ईसाई धर्म क्षेत्र की शासन व्यवस्था या सामाजिक स्थिरता के लिए कोई खतरा नहीं है।
उन्होंने यह भी बताया कि हाल के वर्षों में पूर्वोत्तर के कई ईसाई मतदाताओं ने सड़क, कनेक्टिविटी और सुरक्षा व्यवस्था में सुधार के कारण बीजेपी का समर्थन किया है। उनके अनुसार, उग्रवाद, बम धमाकों और हिंसक घटनाओं में कमी आने से क्षेत्र में स्थिरता बढ़ी है।
संवेदनशील राजनीतिक माहौल में बहस
धार्मिक पहचान, आदिवासी अधिकार और आरक्षण लाभों को लेकर यह नई बहस ऐसे समय सामने आई है जब असम सरकार 26 मई को विधानसभा में UCC विधेयक पेश करने जा रही है। खास बात यह है कि दिल्ली में प्रस्तावित JSM सम्मेलन इसके दो दिन पहले आयोजित होगा।कार्यक्रम में केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह की मुख्य अतिथि के रूप में मौजूदगी को लेकर भी राजनीतिक हलकों में सवाल उठ रहे हैं। कुछ आलोचकों का मानना है कि इससे यह संदेश जा सकता है कि बीजेपी नेतृत्व अप्रत्यक्ष रूप से JSM की मांगों का समर्थन कर रहा है।विरोधियों का कहना है कि ऐसे घटनाक्रम आदिवासी समुदायों के बीच अविश्वास और सामाजिक विभाजन को और गहरा कर सकते हैं।

