17 साल के छात्र ने खोली CBSE की पोल! OSM टेंडर में बड़े खेल का दावा
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17 साल के छात्र ने खोली CBSE की पोल! OSM टेंडर में बड़े खेल का दावा

झारखंड के 17 साल के छात्र ने आरोप लगाया कि CBSE ने OSM ठेका देने के लिए टेंडर नियमों में बदलाव कर Coempt EduTeck को फायदा पहुंचाया।


केंद्रीय माध्यमिक शिक्षा बोर्ड (CBSE) की ऑन-स्क्रीन मार्किंग (OSM) प्रणाली को लेकर चल रहा विवाद अब एक नए और गंभीर मोड़ पर पहुंच गया है। झारखंड के 17 वर्षीय छात्र सार्थक सिद्धांत की जांच में आरोप लगाया गया है कि CBSE ने हैदराबाद स्थित कंपनी कोएम्प्ट एडुटेक (Coempt EduTeck) को OSM का ठेका देने के लिए टेंडर नियमों में ढील दी और सुरक्षा मानकों को कमजोर किया।

खुद को "ऑन-स्क्रीन मार्किंग प्रणाली से प्रभावित 17 लाख छात्रों में से एक" बताने वाले सार्थक सिद्धांत ने अपने उत्तर पुस्तिकाओं की धुंधली और अधूरी स्कैन कॉपियां मिलने के बाद इस मामले की पड़ताल शुरू की। अपने परिणामों से असंतुष्ट सार्थक ने सार्वजनिक खरीद पोर्टल पर उपलब्ध CBSE के आधिकारिक टेंडर दस्तावेजों का गहन अध्ययन किया और टेंडर के तीन अलग-अलग संस्करणों में हुए बदलावों का विश्लेषण किया।

इसके बाद उन्होंने अपनी वेबसाइट sarthaksidhant.com/coempt पर "How CBSE rewrote rules to favour Coempt EduTeck" शीर्षक से अपनी रिपोर्ट प्रकाशित की।

ऑनलाइन चर्चा का केंद्र बना मामला

सार्थक की रिपोर्ट सोशल मीडिया और इंटरनेट पर तेजी से वायरल हो गई। इसके बाद बहस का केंद्र केवल धुंधली डिजिटल उत्तर पुस्तिकाएं, गायब पन्ने और मूल्यांकन संबंधी त्रुटियां नहीं रहीं, बल्कि अब यह मामला पारदर्शिता, संस्थागत ईमानदारी और करोड़ों रुपये के ठेके के आवंटन में संभावित मिलीभगत जैसे गंभीर सवालों तक पहुंच गया है।

सार्थक के मुख्य आरोप

झारखंड के इस छात्र का आरोप है कि CBSE ने तीन अलग-अलग टेंडर चरणों में पात्रता मानदंडों और तकनीकी आवश्यकताओं में क्रमशः बदलाव कर अंततः कोएम्प्ट एडुटेक को लाभ पहुंचाया।सार्थक ने अपने ब्लॉग में लिखा, "यह कहानी इस बात की है कि कैसे एक बड़ी सार्वजनिक संस्था ने अपने ही नियम बदलकर छात्रों के भविष्य के साथ खिलवाड़ किया।"उनके अनुसार टेंडर प्रक्रिया में कुल 15 प्रकार की विसंगतियां पाई गईं।

तीन प्रमुख विसंगतियां

सार्थक का सबसे बड़ा आरोप यह है कि OSM परियोजना के लिए तकनीकी और पात्रता मानकों को हर नए टेंडर के साथ कम किया गया, जिससे यह कोएम्प्ट एडुटेक की प्रोफाइल के अनुरूप बनता गया।पहला आरोप यह है कि पुराने टेंडर में खराब प्रदर्शन (Poor Performance) से जुड़ी तीन महत्वपूर्ण शर्तों को पूरी तरह हटा दिया गया। पहले टेंडर में "पहले कभी ब्लैकलिस्टेड" होने की शर्त थी, जिसे बाद में बदलकर "वर्तमान में ब्लैकलिस्टेड" कर दिया गया। सार्थक ने सवाल उठाया कि यदि कोई कंपनी पहले ब्लैकलिस्ट हो चुकी हो, तो क्या उसे इतनी महत्वपूर्ण परियोजना के लिए योग्य माना जाना चाहिए?

दूसरा आरोप राजस्व (Revenue) संबंधी पात्रता मानदंड पर है। टेंडर में न्यूनतम 50 करोड़ रुपये के वार्षिक राजस्व की शर्त रखी गई थी। सार्थक का दावा है कि विजेता कंपनी इस सीमा को केवल 1.7 प्रतिशत के मामूली अंतर से ही पूरा कर पाई।

तीसरा आरोप यह है कि परियोजना संबंधी अनुभव की शर्तों में ऐसे बदलाव किए गए जिससे बड़ी और स्थापित आईटी कंपनियों को नुकसान हुआ। सार्थक का कहना है कि ऐसा प्रतीत होता है कि उद्योग की बड़ी कंपनी टाटा कंसल्टेंसी सर्विसेज (TCS) को प्राथमिकता नहीं दी गई, जबकि कोएम्प्ट को लाभ पहुंचाने वाले बदलाव किए गए।

कोएम्प्ट एडुटेक पर भी उठे सवाल

सार्थक की रिपोर्ट का बड़ा हिस्सा कोएम्प्ट एडुटेक के अतीत पर केंद्रित है। रिपोर्ट में दावा किया गया है कि कोएम्प्ट एडुटेक पहले ग्लोबअरेना टेक्नोलॉजीज (Globarena Technologies) के नाम से जानी जाती थी।गौरतलब है कि 2019 में तेलंगाना इंटरमीडिएट परीक्षा परिणाम विवाद के दौरान इसी कंपनी का नाम सामने आया था। उस समय सॉफ्टवेयर और मूल्यांकन संबंधी गंभीर तकनीकी खामियों के कारण हजारों छात्रों के परिणाम प्रभावित हुए थे और राज्यभर में भारी विरोध प्रदर्शन हुए थे।सार्थक का आरोप है कि तेलंगाना विवाद के बाद कंपनी ने अपना नाम बदलकर कोएम्प्ट एडुटेक कर लिया और बाद में CBSE ने अपनी टेंडर शर्तों में क्रमिक बदलाव कर कंपनी को पात्र बनाने का रास्ता तैयार किया।

अन्य महत्वपूर्ण आरोप

रिपोर्ट में यह भी कहा गया है कि CMMI प्रमाणन की अनिवार्यता को लेवल-5 से घटाकर लेवल-3 कर दिया गया। सेवानिवृत्त CBSE अधिकारियों को नियुक्त करने पर लागू दो वर्ष की "कूलिंग-ऑफ" अवधि को घटाकर एक वर्ष कर दिया गया। पांच लाख छात्रों वाले प्रोजेक्ट का अनुभव रखने की शर्त को अधिक लचीले अनुभव मानदंडों से बदल दिया गया। डेटा सेंटर के स्वामित्व की अनिवार्यता हटाकर थर्ड-पार्टी क्लाउड इंफ्रास्ट्रक्चर की अनुमति दी गई। स्कैनिंग त्रुटियों और गुणवत्ता संबंधी दंड प्रावधानों को कमजोर किया गया। अधिकतम 0.5 प्रतिशत त्रुटि दर की सीमा हटा दी गई।साइबर सुरक्षा और पेनिट्रेशन टेस्टिंग जैसी कुछ तकनीकी आवश्यकताओं में भी बदलाव या कटौती की गई।

तीन चरणों में हुई टेंडर प्रक्रिया

सार्थक के अनुसार OSM परियोजना की खरीद प्रक्रिया 2025 में तीन चरणों में पूरी हुई।

पहला चरण (फरवरी 2025)

पहला टेंडर जारी किया गया, लेकिन बाद में सरकारी ई-मार्केटप्लेस (GeM) पोर्टल से गायब हो गया और उसका कोई सार्वजनिक रिकॉर्ड उपलब्ध नहीं रहा।

दूसरा चरण (मई 2025)

दूसरे टेंडर में TCS और कोएम्प्ट समेत चार बड़ी कंपनियों ने भाग लिया। हालांकि तकनीकी मूल्यांकन में सभी कंपनियां असफल घोषित कर दी गईं और पूरी प्रक्रिया रद्द कर दी गई।

तीसरा चरण (अगस्त 2025)

इसके बाद संशोधित शर्तों के साथ तीसरा टेंडर जारी किया गया। इसी चरण में कोएम्प्ट एडुटेक सफल बोलीदाता बनकर सामने आई।

राजनीतिक रंग भी चढ़ा

यह विवाद अब राजनीतिक स्तर तक पहुंच चुका है। विपक्ष के नेता Rahul Gandhi और Arvind Kejriwal समेत कई प्रमुख नेताओं ने इस मामले को उठाते हुए सरकार से टेंडर प्रक्रिया की निष्पक्षता पर जवाब मांगा है।

CBSE का पक्ष

CBSE ने सभी आरोपों को खारिज करते हुए कहा है कि पूरी प्रक्रिया सरकारी नियमों के अनुसार और पूरी पारदर्शिता के साथ संचालित की गई।बोर्ड के वरिष्ठ अधिकारियों का कहना है कि अनुबंध गुणवत्ता और लागत आधारित चयन (QCBS) प्रणाली के तहत सबसे कम बोली लगाने वाली योग्य कंपनी को दिया गया।

CBSE के अनुसार टेंडर की विभिन्न शर्तों में किए गए बदलाव जल्दबाजी में नहीं, बल्कि पिछली प्रक्रियाओं में आई कमियों को दूर करने और बेहतर परिणाम सुनिश्चित करने के उद्देश्य से किए गए थे। एक अन्य अधिकारी ने कहा कि जिस कंपनी को ठेका दिया गया, वह किसी भी सरकारी एजेंसी द्वारा ब्लैकलिस्ट नहीं थी और बोली प्रक्रिया के दौरान उसके खिलाफ कोई औपचारिक आपत्ति दर्ज नहीं कराई गई थी।

विवाद का व्यापक असर

लगातार बढ़ते जनाक्रोश और राजनीतिक दबाव के बीच यह विवाद अब केवल छात्रों के अंकों और मूल्यांकन त्रुटियों तक सीमित नहीं रह गया है। यह मामला अब सार्वजनिक खरीद प्रक्रियाओं की पारदर्शिता, संस्थागत जवाबदेही और देश की सबसे महत्वपूर्ण शैक्षणिक संस्थाओं में से एक CBSE पर छात्रों के भरोसे से जुड़ी बड़ी बहस में बदल चुका है।

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