
33 साल में 16 साल महिलाओं का राज, कैसे बदला दिल्ली की सत्ता का चेहरा
दिल्ली देश का एकमात्र ऐसा राज्य है, जहां 33 साल की अवधि में आधे से अधिक समय तक अलग-अलग दलों की महिला मुख्यमंत्रियों ने शासन किया है। मौजूदा समय में बीजेपी की रेखा गुप्ता के हाथ में कमान है।
देश के अलग अलग राज्यों में अलग अलग समय पर महिलाएं सीएम रही हैं। हालांकि दिल्ली का मामला थोड़ा अलग है। पिछले 33 साल में दिल्ली की सत्ता पर मदन लाल खुराना, साहिब सिंह वर्मा और अरविंद केजरीवाल काबिज रहे। लेकिन इन 33 सालों में 16 साल चार महीने महिलाओं के नाम रहा। 1998 में पहली बार सुषमा स्वराज के तौर पर दिल्ली को महिला सीएम मिली हालांकि उनका कार्यकाल कम समय के लिए रहा। सुषमा स्वराज के बाद दिल्ली की सत्ता शीला दीक्षित के हाथों में आई और वो पूरे 15 साल तक दमखम के साथ सत्ता पर काबिज रहीं। शीला के बाद करीब सात से आठ महीने के लिए सूबे की कमान आतिशी ने संभाली। लेकिन 2025 में आम आदमी पार्टी की सत्ता से विदाई हुई और बीजेपी की रेखा गुप्ता काबिज हैं।
सुषमा स्वराज, दिल्ली की पहली महिला सीएम
शीला दीक्षित को जब मिला मौका
शीला दीक्षित के बाद आतिशी और फिर रेखा गुप्ता
शीला दीक्षित का कार्यकाल
दिल्ली की राजनीति में सबसे प्रभावशाली महिला चेहरा शीला दीक्षित रही हैं, जिन्होंने 1998 से 2013 तक लगातार तीन कार्यकाल पूरे किए। यह न सिर्फ दिल्ली बल्कि पूरे देश में किसी महिला मुख्यमंत्री के सबसे सफल और लंबे कार्यकालों में से एक माना जाता है। शीला दीक्षित के शासन में दिल्ली ने बड़े पैमाने पर शहरी बदलाव देखे। फ्लाईओवर, सड़कों का विस्तार और सार्वजनिक परिवहन में सुधार हुआ। दिल्ली मेट्रो का विस्तार इसी दौर में तेज हुआ, जिसने दिल्ली की लाइफलाइन को पूरी तरह बदल दिया। दिल्ली में CNG आधारित पब्लिक ट्रांसपोर्ट लागू करने का बड़ा फैसला भी इसी दौर में लिया गया। इससे प्रदूषण को कुछ हद तक नियंत्रित करने में मदद मिली। हालांकि महिला सुरक्षा का मुद्दा पूरी तरह हल नहीं हुआ, लेकिन महिला हेल्पलाइन, महिला पुलिस थानों और जागरूकता अभियानों की शुरुआत इसी समय हुई। महिलाओं की सार्वजनिक जीवन में भागीदारी बढ़ी।गरीब और मध्यम वर्ग के लिए बिजली-पानी की योजनाएं और सामाजिक सुरक्षा कार्यक्रम लागू किए गए, जिससे शहरी गरीबों को राहत मिली।
क्या महिला नेतृत्व से नीति में फर्क पड़ा?
क्या महिला मुख्यमंत्री होने से नीतियों में जेंडर-संवेदनशीलता बढ़ी? इस सवाल का जवाब शीला दीक्षित के दौर में मंत्री रहीं कृष्णा तीरथ कुछ यूं देती हैं। कृष्णा तीरथ कहती हैं, ''इसमें दो मत नहीं कि शीला जी के दौर में जितना काम हुआ वो बीते दिनों की बात है। 15 साल के शासन में शीला दीक्षित ने शहर के विकास को पंख दिए तो शोषित, वंचित, दलित, आर्थिक असामना को दूर करने की कोशिश की। यहीं नहीं महिला सशक्तिकरण को आप मेरे मंत्री और विधानसभा अध्यक्ष बनने से समझ सकते हैं।''
कृष्णा तीरथ कहती हैं, '' अगर आप सियासत को एक किनारे रखें तो अभी तक जितने दलों ने शासन किया है उन्होंने महिलाओं को मौका दिया है। आप यह कह सकते हैं कि उन्हीं महिलाओं को मौका मिला जो पहले से साधन संपन्न थीं। इस हकीकत से इनकार नहीं किया जा सकता। लेकिन व्यवस्था में बदलाव की शुरुआत तो कहीं न कहीं से शुरू होती है। पार्टी के स्तर पर आप अपने विरोधी दलों की मुखालफत कर सकते हैं। लेकिन शीला जी के अलावा भी जिन लोगों को मौका मिला उन्होंने कुछ बेहतर करने की कोशिश की। दिल्ली या दूसरे प्रदेशों में सियासी समझ रखने वाली महिलाओं को लगा कि उन्हें भी अवसर मिल सकता है। हालांकि यह भी सच है कि महिलाओं की सक्रिय भागीदारी के लिए बहुत कुछ करना बाकी है।
महिला आरक्षण और दिल्ली का संदर्भ
महिला आरक्षण विधेयक पर जारी बहस के बीच दिल्ली एक दिलचस्प केस स्टडी बनती है। यहां अब तक एक ही प्रमुख महिला मुख्यमंत्री (शीला दीक्षित) रही हैं। दिल्ली विधानसभा में महिलाओं की संख्या आमतौर पर 10-15% के बीच रही है, जो यह दिखाता है कि सिर्फ एक मजबूत महिला नेता होने से व्यापक प्रतिनिधित्व अपने आप नहीं बढ़ता। दिल्ली की राजनीति में महिलाओं के सामने कई तरह की चुनौतियां हैं। राजनीतिक दल अभी भी महिलाओं को सीमित टिकट देते हैं। राजनीति में प्रवेश के लिए महिलाओं को अधिक सामाजिक और पारिवारिक बाधाओं का सामना करना पड़ता है। चुनावी राजनीति में संसाधन और सुरक्षा दोनों ही महत्वपूर्ण हैं, जहां महिलाएं पीछे रह जाती हैं।
इन चारों नेताओं की तुलना से एक दिलचस्प तस्वीर उभरती है। सुषमा स्वराज ने जहां महिला नेतृत्व को राष्ट्रीय स्तर पर विश्वसनीयता दी, वहीं शीला दीक्षित ने सरकारी व्यवस्था को नीति केंद्रित और नतीजों को हासिल करने वाला बनाया। आतिशी ने शीला दीक्षित के जमाने की व्यवस्था को आगे बढ़ाने की कोशिश की। हालांकि उनका चयन तब हुआ जब उनकी पार्टी दिल्ली शराब स्कैम, मोहल्ला क्लिनिक में भ्रष्टाचार के साथ दिल्ली के विकास को बाधा लगाने जैसे आरोपों का सामना कर रही थीं। दूसरी ओर, रेखा गुप्ता जमीनी स्तर पर संगठन और स्थानीय मुद्दों के जरिए महिला नेतृत्व की एक अलग शैली पेश करती है।
इस विषय पर दिल्ली की राजनीति पर करीब से नजर रखने वाले वरिष्ठ पत्रकार सुशील सिंह कहते हैं, '' देखिए, महिला आरक्षण हो या कोई योजना, वो सब सुनने और देखने में अच्छे लगते हैं। आप लोकसभा और विधानसभाओं में एससी-एसटी, ओबीसी आरक्षण को देखिए, उस समाज में उन चेहरों या परिवारों को फायदा मिला है जो पहले से आर्थिक तौर पर संपन्न रहे हैं। कहने का अर्थ यह है कि कोई भी योजना या व्यवस्था अंतिम छोर तक पहुंचे उसके लिए जरूरी है कि नीयत साफ हो। लेकिन कड़वी सच्चाई यह है कि कोई भी सियासी दल या नेता इस तरह की कोशिशों से अपने को दूर रखता है, उसके लिए अपने हित ही सर्वोपरि होते हैं।''
दिल्ली की सियासत में महिलाओं की भागीदारी पर सुशील सिंह कहते हैं, ''आप चाहे सुषमा स्वराज को लें, शीला दीक्षित की बात करें, आतिशी की बात करें या रेखा गुप्ता की इन चारों महिलाओं का समृद्ध बैकग्राउंड रहा है। सामान्य पृष्ठभूमि से आने वाली महिलाओं के सामने दुश्वारियां हैं। लेकिन किसी भी व्यवस्था को सीधे तौर पर खारिज नहीं किया जा सकता।'' सियासत का आधार संविधान है, कहने का अर्थ यह है कि सामाजिक या आर्थिक विषमता का मूल मंत्र विधायिका, कार्यपालिका और न्यायपालिका में छिपी है।
सुशील सिंह कहते हैं, सबसे बड़ी बात यह है कि सभी सियासी दल महिलाओं को सशक्त होते हुए देखना चाहते हैं। लेकिन पार्टी के अंदर व्यापक बदलाव की कोशिश नहीं करते। इसके लिए कोई खास दल दोषी नहीं है। पुरुष प्रधान राजनीतिक दलों को ना सिर्फ सोचना होगा बल्कि महिला आरक्षण और उनकी शक्ति का सम्मान भी करना होगा तभी बदलाव मुमकिन है।''
अगर महिला आरक्षण संशोधित रूप में लागू होता है तो दिल्ली जैसे शहरी क्षेत्र में इसका प्रभाव ज्यादा स्पष्ट हो सकता है। विधानसभा में महिलाओं की संख्या बढ़ेगी, नीति निर्माण में महिलाओं के मुद्दों को ज्यादा जगह मिलेगी, स्थानीय स्तर पर महिला नेतृत्व मजबूत होगा। लेकिन यह भी ध्यान देने वाली बात है कि सिर्फ आरक्षण पर्याप्त नहीं है। राजनीतिक प्रशिक्षण, संसाधनों तक पहुंच और सामाजिक समर्थन भी जरूरी है।

