सुष्मिता देव का टीएमसी पर तंज- जो दल तोड़ते थे, वही दे रहे नैतिकता का ज्ञान
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सुष्मिता देव का टीएमसी पर तंज- जो दल तोड़ते थे, वही दे रहे नैतिकता का ज्ञान

TMC छोड़ने के साथ सुष्मिता देव ने राज्यसभा सदस्यता भी छोड़ी। उन्होंने दलबदल की नैतिकता, पार्टी के अंदरूनी संकट और कानून में सुधार की जरूरत पर खुलकर अपनी राय रखी।


तृणमूल कांग्रेस (TMC) के 20 लोकसभा सांसदों के पार्टी छोड़कर नवगठित नेशनलिस्ट सिटिजंस पार्टी ऑफ इंडिया (NCPI) में शामिल होने के बाद राजनीतिक हलकों में दलबदल और उसकी नैतिकता को लेकर बहस तेज हो गई है। इस बीच, पूर्व TMC नेता सुष्मिता देव का कदम अलग चर्चा का विषय बना हुआ है। उन्होंने न केवल पार्टी छोड़ी, बल्कि राज्यसभा की सदस्यता से भी इस्तीफा दे दिया और किसी अन्य राजनीतिक दल में शामिल नहीं हुईं।

AI With Sanket कार्यक्रम में सुष्मिता देव ने कहा कि चुनाव परिणाम आने के बाद वह निराश जरूर थीं, लेकिन उसी वजह से उन्होंने पार्टी छोड़ने का फैसला नहीं किया। उनके अनुसार, असली चिंता उन्हें चुनाव के बाद जमीनी स्तर पर पार्टी कार्यकर्ताओं की प्रतिक्रिया और संगठन में तेजी से उभरते संकट को देखकर हुई।

उन्होंने बताया कि वह तथ्य-खोज समिति की सदस्य के रूप में पश्चिम बंगाल के कई जिलों में गईं और वहां पार्टी कार्यकर्ताओं से बातचीत की। इसी दौरान उन्हें महसूस हुआ कि पार्टी गंभीर आंतरिक संकट से गुजर रही है।

सुष्मिता देव ने कहा कि उनकी राजनीति का केंद्र असम रहा है और वे बंगाल की नेता नहीं हैं। वे TMC की राष्ट्रीय विस्तार योजना का हिस्सा थीं। लेकिन INDIA गठबंधन की बैठक और उसके बाद के घटनाक्रमों ने उन्हें संकेत दे दिया कि अब पार्टी का पूरा ध्यान बंगाल में संगठन को पुनर्जीवित करने पर रहेगा। ऐसे में उन्हें अपने राजनीतिक भविष्य का कोई स्पष्ट रोडमैप नहीं दिखा।उन्होंने कहा कि इसी कारण उन्होंने सम्मानजनक रास्ता चुनते हुए न केवल पार्टी से इस्तीफा दिया, बल्कि राज्यसभा सीट भी छोड़ दी, क्योंकि वह सीट उन्हें TMC ने दी थी।

दलबदल करने वाले सांसदों पर क्या बोलीं?

सुष्मिता देव ने कहा कि उनके कई पूर्व सहयोगियों ने पार्टी छोड़ दी, लेकिन अपने पद नहीं छोड़े। हालांकि उन्होंने उनके फैसले पर सीधा हमला करने से बचते हुए कहा कि कोई भी राजनेता बिना किसी गंभीर कारण के इतना बड़ा राजनीतिक जोखिम नहीं उठाता।उनके मुताबिक, आज भले ही लोग इन नेताओं की आलोचना कर रहे हों, लेकिन यह भी सच है कि उन्होंने अपने राजनीतिक भविष्य को दांव पर लगाया है। समय बताएगा कि उनका फैसला सही था या नहीं।

पार्टी नेतृत्व और भविष्य को लेकर असंतोष

उन्होंने संकेत दिया कि चुनावी हार के बाद पार्टी सांसदों और नेताओं को उम्मीद थी कि संगठन के भीतर खुली चर्चा होगी और सभी को अपनी बात रखने का अवसर मिलेगा। लेकिन ऐसा नहीं हुआ।सुष्मिता देव के अनुसार, पार्टी के भीतर यह चिंता भी थी कि भविष्य में नेतृत्व किसके हाथ में होगा और पार्टी की उत्तराधिकार योजना क्या है। उनका मानना है कि कई नेताओं की नाराजगी के पीछे यह भी एक बड़ा कारण हो सकता है।

नैतिकता पर सवालों का जवाब

जब उनसे पूछा गया कि उन्होंने भी 2021 में कांग्रेस छोड़कर TMC का दामन थामा था, तो उन्होंने कहा कि उस समय उनके पास कोई निर्वाचित पद नहीं था। उन्होंने दावा किया कि आज वे साफ मन से कह सकती हैं कि उन्होंने न केवल पार्टी छोड़ी, बल्कि वह पद भी छोड़ दिया जो पार्टी ने उन्हें दिया था।

TMC पर लगाए पुराने आरोपों की याद दिलाई

सुष्मिता देव ने कहा कि जो नेता आज दलबदल पर नैतिकता की बातें कर रहे हैं, उन्हें पहले यह भी याद करना चाहिए कि अतीत में TMC ने गोवा, त्रिपुरा और मेघालय जैसे राज्यों में अन्य दलों के नेताओं और विधायकों को अपने साथ जोड़ने की कोशिश की थी।उनका तर्क था कि जब दूसरे दलों से नेताओं को TMC में शामिल कराया जा रहा था, तब ऐसे कदमों को राजनीतिक रणनीति कहा जाता था, लेकिन आज वही लोग नैतिकता का पाठ पढ़ा रहे हैं।

दलबदल विरोधी कानून में बदलाव की वकालत

सुष्मिता देव ने दलबदल विरोधी कानून पर भी अपनी राय रखी। उनका मानना है कि संसद में हर मुद्दे पर व्हिप लागू नहीं होना चाहिए। उनके अनुसार, केवल विश्वास मत और धन विधेयक जैसे मामलों में पार्टी लाइन का पालन अनिवार्य होना चाहिए, जबकि अन्य मुद्दों पर सांसदों को अपने विवेक से मतदान करने की स्वतंत्रता मिलनी चाहिए।उन्होंने कहा कि कई महत्वपूर्ण कानूनों पर सांसदों को अपनी अंतरात्मा और क्षेत्रीय हितों के आधार पर फैसला लेने का अधिकार होना चाहिए।

अंतिम फैसला जनता और कानून के हाथ में

20 बागी सांसदों को लेकर सुष्मिता देव ने कहा कि अभी उनके फैसले पर अंतिम नैतिक निर्णय देना जल्दबाजी होगी। संभव है कि वे भविष्य में अपने कदम के पीछे के कारण विस्तार से बताएं और यह भी साबित करने की कोशिश करें कि उन्होंने अपने क्षेत्र के हित में फैसला लिया।उन्होंने कहा कि ऐसे मामलों में अदालत, विधानसभा अध्यक्ष और अंततः जनता ही अंतिम फैसला करती है। राजनीति बेहद गतिशील है और किसी भी नेता के फैसले का मूल्यांकन समय के साथ ही किया जा सकता है।

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