
ममता के गढ़ में जीत से मुख्यमंत्री पद तक, शुभेंदु अधिकारी का बड़ा उभार
शुभेंदु अधिकारी को पश्चिम बंगाल बीजेपी के विधायकों ने अपना नेता चुना। इन सबके बीच अधिकारी ने सरकार बनाने का दावा भी पेश कर दिया है और शनिवार को सीएम पद की शपथ लेंगे।
करीब 19 साल पहले शुभेंदु अधिकारी ने ममता बनर्जी के साथ मिलकर पश्चिम बंगाल में वाम मोर्चा की 34 साल पुरानी सत्ता को खत्म करने वाले आंदोलन को मजबूत किया था। अब वही शुभेंदु अधिकारी पश्चिम बंगाल में ममता बनर्जी के शासन का अंत कर बीजेपी की पहली सरकार बनाने जा रहे हैं।
चार दिन पहले पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनाव में ऐतिहासिक जीत दर्ज करने के बाद बीजेपी ने शुक्रवार (8 मई) को शुभेंदु अधिकारी को विधायक दल का नेता चुन लिया। इसके साथ ही उनके मुख्यमंत्री बनने का रास्ता साफ हो गया। शनिवार (9 मई) सुबह 11 बजे कोलकाता के ब्रिगेड परेड ग्राउंड में वे अपने मंत्रिमंडल के साथ शपथ लेंगे।
यह तारीख बंगाल के लिए खास मानी जा रही है, क्योंकि इसी दिन गुरुदेव रवींद्रनाथ टैगोर की 165वीं जयंती भी है। बीजेपी इस शपथ ग्रहण समारोह को राजनीतिक और प्रतीकात्मक दोनों रूपों में ऐतिहासिक बनाने की तैयारी में है।
ब्रिगेड परेड ग्राउंड में होगा भव्य शपथ ग्रहण
कोलकाता के प्रतिष्ठित ब्रिगेड परेड ग्राउंड में आयोजित होने वाले इस समारोह में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी, केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह और बीजेपी शासित राज्यों के कई मुख्यमंत्री शामिल हो सकते हैं।बंगाल जैसे राज्य में, जहां लंबे समय तक बीजेपी अपनी राजनीतिक जमीन मजबूत करने के लिए संघर्ष करती रही, वहां पहली बार सरकार बनाना पार्टी के लिए बेहद अहम माना जा रहा है।
शुभेंदु अधिकारी का शानदार चुनावी रिकॉर्ड
शुभेंदु अधिकारी का विधानसभा चुनावों में प्रदर्शन लगातार मजबूत रहा है।
2006 में उन्होंने कांथी दक्षिण सीट से टीएमसी उम्मीदवार के रूप में CPI प्रत्याशी को 8,580 वोटों से हराया।
2016 में नंदीग्राम से टीएमसी उम्मीदवार रहते हुए 81,230 वोटों से जीत दर्ज की।
2021 में बीजेपी उम्मीदवार के रूप में नंदीग्राम सीट पर ममता बनर्जी को 1,956 वोटों से हराकर राष्ट्रीय सुर्खियों में आए।
2026 में फिर नंदीग्राम से बीजेपी उम्मीदवार के तौर पर करीब 9,665 वोटों से जीत हासिल की।
इसी चुनाव में भवानीपुर सीट पर ममता बनर्जी को 15 हजार से ज्यादा वोटों से हराकर सबसे बड़ी राजनीतिक जीत दर्ज की।
ममता के करीबी से बीजेपी के सबसे बड़े चेहरे तक
शुभेंदु अधिकारी कभी ममता बनर्जी के सबसे भरोसेमंद नेताओं में गिने जाते थे। लेकिन दिसंबर 2020 में उन्होंने टीएमसी छोड़ बीजेपी का दामन थाम लिया।उनके बीजेपी में आने से पार्टी को सिर्फ एक बड़ा नेता ही नहीं मिला, बल्कि टीएमसी के अंदर वर्षों से तैयार किया गया मजबूत संगठनात्मक नेटवर्क भी बीजेपी के साथ आ गया।
राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि बंगाल में बीजेपी के तेजी से उभार के पीछे शुभेंदु अधिकारी की संगठन क्षमता और बूथ स्तर तक मजबूत पकड़ की बड़ी भूमिका रही।
नंदीग्राम आंदोलन ने दिलाई पहचान
शुभेंदु अधिकारी को सबसे बड़ी राजनीतिक पहचान 2007 के नंदीग्राम भूमि अधिग्रहण विरोधी आंदोलन से मिली।तत्कालीन वाम मोर्चा सरकार द्वारा प्रस्तावित केमिकल हब के खिलाफ हुए आंदोलन ने बंगाल की राजनीति की दिशा बदल दी थी। इसी आंदोलन ने टीएमसी को विपक्ष से सत्ता तक पहुंचाने की मजबूत जमीन तैयार की।शुभेंदु अधिकारी आंदोलन के प्रमुख आयोजकों में शामिल थे। उन्होंने गांव-गांव जाकर लोगों को संगठित किया और आंदोलन को जन समर्थन में बदल दिया।
बीजेपी में बढ़ता गया कद
बीजेपी में शामिल होने के कुछ ही महीनों बाद शुभेंदु अधिकारी ने 2021 के विधानसभा चुनाव में नंदीग्राम सीट से ममता बनर्जी को हराया।हालांकि उस चुनाव में बीजेपी सत्ता तक नहीं पहुंच सकी, लेकिन शुभेंदु अधिकारी पार्टी के सबसे बड़े बंगाली चेहरे बनकर उभरे।इसके बाद उन्होंने भ्रष्टाचार, राजनीतिक हिंसा और प्रशासनिक मुद्दों को लेकर ममता सरकार के खिलाफ लगातार आक्रामक अभियान चलाया।
2026 तक आते-आते वे बीजेपी के निर्विवाद राज्यस्तरीय शक्ति केंद्र बन चुके थे। भवानीपुर में ममता बनर्जी को हराने के बाद उनका राजनीतिक कद और भी बड़ा हो गया।
संगठन क्षमता बनी सबसे बड़ी ताकत
पूर्वी मेदिनीपुर और आसपास के क्षेत्रों में शुभेंदु अधिकारी की संगठन क्षमता की अक्सर चर्चा होती रही है।पार्टी कार्यकर्ताओं का कहना है कि उन्हें बूथ स्तर तक के आंकड़े, स्थानीय नेताओं के नाम और क्षेत्रीय समस्याओं की गहरी जानकारी रहती है।इसी वजह से टीएमसी छोड़ने के बाद भी उन्होंने अपने प्रभाव को बरकरार रखा और बीजेपी को जमीनी स्तर पर मजबूत किया।
आलोचनाएं भी कम नहीं
हालांकि, शुभेंदु अधिकारी के आलोचक उन पर बंगाल की राजनीति में धार्मिक ध्रुवीकरण बढ़ाने का आरोप लगाते रहे हैं।चुनावी अभियान के दौरान उनके भाषणों में हिंदू एकजुटता, सीमा पार घुसपैठ, नागरिकता और अल्पसंख्यक तुष्टिकरण जैसे मुद्दे प्रमुख रहे।राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि बीजेपी को इस चुनाव में हिंदू वोटों के ध्रुवीकरण का बड़ा फायदा मिला।
दिलचस्प बात यह है कि टीएमसी में रहते हुए शुभेंदु अधिकारी बीजेपी की हिंदुत्व राजनीति के आलोचक माने जाते थे। बीजेपी में आने के बाद उनकी राजनीतिक लाइन पूरी तरह बदल गई।
अब सबसे बड़ी चुनौती
मुख्यमंत्री बनने के बाद शुभेंदु अधिकारी के सामने सबसे बड़ी चुनौती बंगाल के सभी समुदायों को साथ लेकर चलने की होगी।बीजेपी लंबे समय से “सोनार बांग्ला” बनाने का वादा करती रही है। अब इस वादे को जमीन पर उतारने की जिम्मेदारी शुभेंदु अधिकारी के कंधों पर होगी।विधायक दल का नेता चुने जाने के बाद उन्होंने कहा कि उनकी सरकार “सबका साथ, सबका विकास” के सिद्धांत पर काम करेगी।अब देखने वाली बात होगी कि बंगाल की बदली हुई राजनीति में शुभेंदु अधिकारी अपने इस वादे को कितना सफलतापूर्वक निभा पाते हैं।

