मेकेदातु बांध पर तमिलनाडु का बड़ा फैसला, विजय सरकार ने खोला मोर्चा
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मेकेदातु बांध पर तमिलनाडु का बड़ा फैसला, विजय सरकार ने खोला मोर्चा

तमिलनाडु विधानसभा ने मेकेदातु परियोजना के खिलाफ सर्वसम्मति से प्रस्ताव पारित कर केंद्र से कर्नाटक के बांध प्रोजेक्ट को मंजूरी न देने की मांग की।


तमिलनाडु विधानसभा ने शुक्रवार को कावेरी नदी पर कर्नाटक की प्रस्तावित मेकेदातु बैलेंसिंग रिजर्वायर-कम-ड्रिंकिंग वॉटर प्रोजेक्ट के खिलाफ सर्वसम्मति से एक प्रस्ताव पारित किया। मुख्यमंत्री C Joseph Vijay द्वारा पेश किए गए इस प्रस्ताव को कांग्रेस, डीएमके, सीपीआई, सीपीएम, एमडीएमके, पीएमके समेत सभी दलों का समर्थन मिला।

विधानसभा ने इस परियोजना को 2007 के कावेरी जल विवाद न्यायाधिकरण (CWDT) के फैसले और 2018 के सुप्रीम कोर्ट के आदेश का सीधा उल्लंघन बताया।

विजय सरकार ने परियोजना का किया कड़ा विरोध

प्रस्ताव पेश करते हुए मुख्यमंत्री विजय ने कहा कि मेकेदातु परियोजना न्यायाधिकरण और सुप्रीम कोर्ट के निर्देशों की अनदेखी करती है। उन्होंने आरोप लगाया कि इस परियोजना के लिए न तो कावेरी बेसिन के अन्य राज्यों की सहमति ली गई है और न ही केंद्र सरकार की आवश्यक मंजूरियां प्राप्त की गई हैं।विधानसभा ने केंद्र सरकार से अपील की कि वह इस परियोजना को किसी भी प्रकार की तकनीकी, पर्यावरणीय या अन्य मंजूरी न दे।

इसके साथ ही सदन ने मांग की कि कावेरी बेसिन में कोई भी नई परियोजना तब तक मंजूर न की जाए, जब तक संबंधित राज्यों की सहमति और केंद्र की अनुमति न मिल जाए। विधानसभा ने केंद्रीय जल आयोग (CWC) से भी कर्नाटक की विस्तृत परियोजना रिपोर्ट (DPR) पर विचार न करने का आग्रह किया।

तमिलनाडु के नेताओं ने जताई चिंता

कांग्रेस नेता और मंत्री राजेश कुमार ने प्रस्ताव का समर्थन करते हुए कहा कि यह बांध केवल अवैध ही नहीं, बल्कि तमिलनाडु के अधिकारों को छीनने वाला कदम है। उन्होंने कहा कि इससे डेल्टा क्षेत्र के किसानों और पेयजल आपूर्ति पर गंभीर असर पड़ सकता है।डीएमके सहयोगी और कोंगु मक्कल देशिया काची के विधायक नित्यानंदम ने कहा कि गठबंधन राजनीति से ऊपर तमिलनाडु के हितों को प्राथमिकता दी जानी चाहिए।वहीं उदयनीधि स्टालिन ने केंद्र सरकार पर दबाव बनाने के लिए सभी सांसदों को एकजुट होकर प्रयास करने की अपील की।

पीएमके की सौम्या अंबुमणि और अन्य नेताओं ने दावा किया कि कावेरी से पानी की आपूर्ति पहले ही घट रही है, जिसका असर राज्य के 28 जिलों और लगभग 5.5 करोड़ लोगों पर पड़ रहा है।कुछ नेताओं ने तो यहां तक कहा कि यदि यह परियोजना आगे बढ़ती है तो तमिलनाडु का बड़ा हिस्सा "रेगिस्तान" में बदल सकता है।

संघीय ढांचे में बढ़ा टकराव

यह प्रस्ताव भारत के संघीय ढांचे में एक नए टकराव को जन्म देता है। पानी भले ही राज्य सूची का विषय हो, लेकिन अंतरराज्यीय नदियां और बड़े जल परियोजनाएं केंद्र सरकार तथा कावेरी जल प्रबंधन प्राधिकरण (CWMA) और केंद्रीय जल आयोग जैसी संस्थाओं के अधिकार क्षेत्र में आती हैं।तमिलनाडु लंबे समय से आरोप लगाता रहा है कि कावेरी विवाद के मामलों में केंद्र सरकार का झुकाव कर्नाटक की ओर रहा है। वहीं कर्नाटक लगातार केंद्र से परियोजना को मंजूरी दिलाने की कोशिश कर रहा है।दोनों राज्यों ने कानूनी और राजनीतिक लड़ाई जारी रखने का संकेत दिया है, जिससे दशकों पुराना कावेरी विवाद एक बार फिर तेज होता दिख रहा है।

दशकों पुराना है कावेरी जल विवाद

कावेरी जल बंटवारे का मुद्दा तमिलनाडु और कर्नाटक के बीच कई दशकों से विवाद का कारण रहा है। विशेष रूप से तमिलनाडु के डेल्टा जिले सिंचाई और पेयजल के लिए कावेरी पर काफी हद तक निर्भर हैं।2007 में कावेरी जल विवाद न्यायाधिकरण और 2018 में सुप्रीम कोर्ट ने दोनों राज्यों के लिए जल आवंटन तय किया था। साथ ही कावेरी बेसिन को जल-अभाव वाला क्षेत्र घोषित करते हुए कहा गया था कि किसी भी नई परियोजना के लिए सभी संबंधित राज्यों की सहमति और केंद्र सरकार की मंजूरी आवश्यक होगी।

कर्नाटक का क्या तर्क है?

कर्नाटक का कहना है कि कनकपुरा के पास प्रस्तावित मेकेदातु परियोजना मुख्य रूप से बेंगलुरु की पेयजल जरूरतों को पूरा करने और सीमित जलविद्युत उत्पादन के लिए है।कर्नाटक सरकार का दावा है कि इस परियोजना से तमिलनाडु के हिस्से का पानी कम नहीं होगा, बल्कि जल प्रवाह को बेहतर ढंग से नियंत्रित करने में मदद मिलेगी।

मुख्यमंत्री डीके शिवकुमार ने हाल ही में कहा कि मेकेदातु परियोजना दक्षिण भारत के लिए बेहद महत्वपूर्ण है। उन्होंने यह भी कहा कि उनकी सरकार तमिलनाडु से बातचीत के लिए तैयार है और जल आवंटन के अनुसार 177 टीएमसी पानी उपलब्ध कराने के लिए प्रतिबद्ध है।

शिवकुमार ने जोर देकर कहा कि इस जलाशय का उपयोग सिंचाई के लिए नहीं किया जाएगा, बल्कि केवल बेंगलुरु की पेयजल जरूरतों को पूरा करने के लिए किया जाएगा। उन्होंने तमिलनाडु पर इस मुद्दे का राजनीतिकरण करने का भी आरोप लगाया।

अभी क्या स्थिति है?

मई 2026 में सुप्रीम कोर्ट ने तमिलनाडु की पुनर्विचार याचिका को यह कहते हुए खारिज कर दिया था कि मामला अभी प्रारंभिक चरण में है, क्योंकि परियोजना फिलहाल डीपीआर स्तर पर है और केंद्र सरकार की समीक्षा के अधीन है।हालांकि, तमिलनाडु विधानसभा के ताजा प्रस्ताव ने साफ कर दिया है कि विजय सरकार मेकेदातु परियोजना का हर स्तर पर विरोध करेगी। इससे कावेरी जल विवाद का एक नया अध्याय शुरू होता दिख रहा है, जिसका असर आने वाले समय में दोनों राज्यों की राजनीति और जल प्रबंधन पर पड़ सकता है।

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