
तमिलनाडु की नई गठबंधन सरकार 'कच्ची डोर' पर क्यों टिकी है?
राजनीति विज्ञान में उन सरकारों के बीच एक उपयोगी अंतर है, जो सत्ता जीतती हैं और वे सरकारें जो वास्तव में सत्ता का प्रयोग कर पाती हैं।
विजय के नेतृत्व वाला नया प्रशासन उन वैचारिक सहयोगियों को प्रबंधित करने के लिए आवश्यक संगठनात्मक बुनियादी ढांचे की कमी से जूझ रहा है, जो उनके लिए "परिवर्तित समर्थक" नहीं बल्कि केवल "सहयात्री" मात्र हैं।
राजनीति विज्ञान में उन सरकारों के बीच एक उपयोगी अंतर है, जो सत्ता जीतती हैं और वे सरकारें जो वास्तव में सत्ता का प्रयोग कर पाती हैं। तमिलनाडु का नया प्रशासन, जिसने दिनों तक चले परदे के पीछे के समझौतों और गणितीय बेचैनी के बाद मुख्यमंत्री सी. जोसेफ विजय के नेतृत्व में शपथ ली है, उसने सत्ता हासिल करने वाला पहला काम तो पूरा कर लिया है। लेकिन सत्ता के प्रभावी संचालन को लेकर वह अभी भी बेहद अनिश्चित दिखाई देता है।
शपाथ ग्रहण समारोह ने एक तरह के 'समापन' (closure) का संकेत तो दिया। लेकिन यह उसके नीचे छिपी संरचनात्मक कमजोरी को छिपा नहीं सका। यह एक ऐसा गठबंधन है जिसे वैचारिक दृढ़ता के बजाय रणनीतिक आवश्यकता के चलते तैयार किया गया है और जिसका नेतृत्व एक ऐसा राजनीतिक नवागंतुक कर रहा है, जो एक स्थापित अधिनायक (hegemon) की तरह शासन करने का प्रयास कर रहा है।
ध्रुवीकृत बहुलवाद (Polarised pluralism)
राजनीति वैज्ञानिकों ने लंबे समय से जियोवानी सार्टोरी के "ध्रुवीकृत बहुलवाद" के सिद्धांत के बीच अंतर किया है, जहां गठबंधन सहयोगियों के बीच वैचारिक दूरी केंद्रापसारक (centrifugal) दबाव पैदा करती है। इसके विपरीत, अधिक सफल गठबंधन वे होते हैं, जो वास्तविक कार्यक्रम संबंधी समानता पर बने होते हैं। तमिलनाडु की यह नई व्यवस्था 'ध्रुवीकृत' श्रेणी के अधिक निकट है।
वामपंथी दल और वीसीके (VCK) अपने साथ एक संगठित और वैचारिक रूप से सचेत आधार लेकर आते हैं, जो जवाबदेही की मांग करता है। इस नई सरकार के लिए उनका समर्थन, उनके अपने स्वीकारोक्ति के अनुसार, केवल रणनीतिक है। वे विजय की विचारधारा में परिवर्तित नहीं हुए हैं; वे केवल अस्थायी सहयात्री हैं। और जैसा कि गठबंधन सिद्धांत लगातार प्रदर्शित करता है, शासन में कठिन चुनाव करने की नौबत आते ही ऐसे अस्थायी सहयात्री सबसे अस्थिर आंतरिक कारक बन जाते हैं।
निश्चित रूप से कांग्रेस से इस तरह के घर्षण (friction) की संभावना कम है। उसका शुरुआती और उत्साहपूर्ण समर्थन, साथ ही मंत्री पद की आकांक्षा, यह संकेत देती है कि इस व्यवस्था में उसकी हिस्सेदारी वैचारिक न होकर केवल लेन-देन (transactional) वाली है। अंततः शासन के लिए बड़ी चुनौती वैचारिक सहयोगी ही पेश करते हैं, न कि लेन-देन करने वाले साथी।
वैचारिक मतभेद (Ideological fault lines)
ये वैचारिक मतभेद मामूली नहीं हैं। कम्युनिस्ट पार्टियां अपनी राजनीतिक वैधता श्रम अधिकारों, संघवाद और कॉरपोरेट-संचालित आर्थिक नीति के प्रतिरोध जैसे अडिग रुख से प्राप्त करती हैं। वहीं वीसीके की पूरी राजनीतिक पहचान दलित दावे, जाति-विरोधी लामबंदी और अल्पसंख्यक अधिकारों पर टिकी है। ये ऐसे मुद्दे हैं, जिन्हें राजनीतिक कीमत चुकाए बिना गठबंधन प्रबंधन के नाम पर गौण नहीं किया जा सकता।
यह गठबंधन के भीतर एक केंद्रीय विरोधाभास पैदा करता है, समर्थन देने वाले दलों को एक साथ सरकार को टिकाए भी रखना है और खुद को उससे अलग भी दिखाना है। वे पूरी तरह सरकार में विलीन होना बर्दाश्त नहीं कर सकते। क्योंकि उनका मतदाता आधार उनसे प्रतिरोध की अपेक्षा करता है।
वर्तमान क्षण में जो दिखाई दे रहा है, वह है- बिना संगठन के करिश्मा, बिना पार्टी की गहराई के लोकप्रियता और बिना सामंजस्य के गठबंधन। यह राजनीतिक शक्ति का एक गुणात्मक रूप से भिन्न और कहीं अधिक खतरनाक स्वरूप है।
साथ ही, ये दल अभी खुले तौर पर सरकार से अलग भी नहीं हो सकते। इसका परिणाम एक निरंतर चलने वाला 'बैलेंसिंग एक्ट' (संतुलन बनाने की कोशिश) है, जो एक विशेष प्रकार की धीमी अस्थिरता पैदा करता है। यह कोई नाटकीय पतन नहीं, बल्कि एक पुराना और लगातार चलने वाला घर्षण है। इसके संकेत पहले दिन से ही दिखने लगे थे। जब शपथ ग्रहण समारोह के दौरान कथित तौर पर राज्य गीत 'तमिल ताई वाज्तु' (ThamilThai Vazhthu) को किनारे किया गया तो वामपंथी दलों ने तुरंत नाराजगी व्यक्त की। यह एक प्रतीकात्मक विवाद लग सकता था लेकिन राजनीतिक संदर्भ में यह बहुत महत्वपूर्ण था।
हर बड़ा नीतिगत निर्णय विवाद का संभावित स्थल बन जाता है। हर समझौता 'विश्वासघात' के प्रमाण के रूप में देखा जाता है। समय के साथ, ऐसा घर्षण और जटिल होता जाता है।
नेतृत्व की शैली (Leadership style)
इस समस्या को नेतृत्व की शैली और अधिक गंभीर बना रही है। तमिलनाडु के नए मुख्यमंत्री का उदय जन-दृश्यता, व्यक्तित्व प्रदर्शन और मीडिया युग की जनता की भावनात्मक वफादारी पर आधारित राजनीतिक लामबंदी के मॉडल के माध्यम से हुआ है।
यह समकालीन लोकतंत्रों में एक पहचानने योग्य घटना है। नेतृत्व की एक ऐसी शैली जहां अधिकार संस्थागत पद या पार्टी संगठन से नहीं बल्कि जनसमूह के साथ सीधे भावनात्मक जुड़ाव से प्राप्त होता है। ऐसे नेता चुनाव जीतने में बेहद प्रभावी हो सकते हैं। लेकिन वे गठबंधन सरकार चलाने के लिए कम उपयुक्त होते हैं। क्योंकि गठबंधन शासन के लिए धैर्य, परामर्श, प्रतिस्पर्धी अहंकार के समायोजन और वैचारिक चिंताओं के सावधानीपूर्वक प्रबंधन जैसे विपरीत गुणों की आवश्यकता होती है।
तमिलनाडु ने बदलाव (disruption) के लिए मतदान किया था। लेकिन उसे शायद कुछ अधिक जटिल मिल रहा है। राज्य का राजनीतिक इतिहास जटिलता की एक और परत जोड़ता है। तमिलनाडु दशकों तक अन्नादुरई, करुणानिधि, एमजीआर और जयललिता जैसे नेताओं द्वारा आकार दिया गया था, जिनका करिश्मा उनके गहरे संगठनात्मक बुनियादी ढांचे से अविभाज्य था। उनका अधिकार अनुशासित कैडरों, संस्थागत नेटवर्क और दशकों की संचित राजनीतिक पूंजी पर टिका था।
वर्तमान में जो उपलब्ध है, वह है-संगठन के बिना करिश्मा, पार्टी की गहराई के बिना लोकप्रियता और सामंजस्य के बिना गठबंधन।
अस्तित्व बनाम शासन (Survival vs governance)
अंततः प्रश्न अस्तित्व और शासन के बीच के अंतर का है। एक फ्लोर टेस्ट नंबरों की पुष्टि तो कर सकता है। लेकिन वह अंतर्विरोधों को हल नहीं कर सकता। और यही वैचारिक, संरचनात्मक और स्वभावगत अंतर्विरोध यह तय करेंगे कि यह सरकार एक परिवर्तनकारी प्रशासन बनती है या संस्थागत गहराई के बिना करिश्माई राजनीति की सीमाओं का एक चेतावनी भरा उदाहरण।
तमिलनाडु ने बदलाव के लिए वोट दिया था। लेकिन उसे जो मिल रहा है, वह खुद से ही लगातार बातचीत करती, व्यक्तित्व की राजनीति और गठबंधन के गणित के बीच फंसी और अपने नेतृत्व की महत्वाकांक्षाओं व अपने सहयोगियों की चिंताओं के बीच झूलती हुई एक सरकार है।
सवाल यह नहीं है कि सरकार फ्लोर टेस्ट में टिकेगी या नहीं। सबसे अधिक संभावना है कि वह टिक जाएगी। अधिक महत्वपूर्ण प्रश्न यह है कि क्या यह राज्य पर शासन करने से पहले खुद को अनुशासित और प्रबंधित कर पाएगी?
(The Federal स्पेक्ट्रम के सभी पक्षों के विचार और राय प्रस्तुत करने का प्रयास करता है। लेख में दी गई जानकारी और विचार लेखक के हैं और जरूरी नहीं कि वे द फेडरल के विचारों को प्रतिबिंबित करें।)

