
DMK से दूरी TVK से नजदीकी, क्या सत्ता की जल्दबाजी में फंस गई कांग्रेस?
कांग्रेस द्वारा DMK के साथ चुनाव लड़ने के बावजूद विजय की तमिलगा वेत्री कड़गम (TVK) सरकार को समर्थन देने के फैसले ने INDIA गठबंधन के भीतर असहजता बढ़ा दी है...
2026 तमिलनाडु विधानसभा चुनाव परिणामों के बाद राज्य में तेजी से बदले राजनीतिक घटनाक्रम ने विपक्षी खेमे में नई हलचल पैदा कर दी है। कांग्रेस द्वारा DMK के साथ चुनाव लड़ने के बावजूद विजय की तमिलगा वेत्री कड़गम (TVK) सरकार को समर्थन देने के फैसले ने INDIA गठबंधन के भीतर असहजता बढ़ा दी है।
इस मुद्दे पर The Federal के राजनीतिक संपादक पुनीत निकोलस यादव ने कांग्रेस-DMK संबंधों में आई दरार, अखिलेश यादव की प्रतिक्रिया, INDIA गठबंधन के भविष्य और उत्तर प्रदेश की राजनीति पर इसके प्रभाव को लेकर विस्तार से बातचीत की।
कांग्रेस का DMK से TVK की ओर तेजी से बढ़ना कैसे देखा जाना चाहिए?
पुनीत निकोलस यादव ने कहा कि इस पूरे घटनाक्रम के दो पहलू हैं। चुनाव से पहले ही कांग्रेस के भीतर एक धड़ा, खासतौर पर राहुल गांधी के करीबी माने जाने वाले कुछ दूसरे पंक्ति के नेता, यह मानते थे कि कांग्रेस को चुनाव से पहले ही DMK से अलग होकर TVK के साथ गठबंधन कर लेना चाहिए था।
वहीं कांग्रेस के वरिष्ठ नेताओं का एक दूसरा समूह ऐसा था जो DMK के साथ लंबे समय से चले आ रहे गठबंधन को जारी रखने के पक्ष में था।
लेकिन चुनाव परिणाम आने के बाद हालात तेजी से बदल गए। DMK सत्ता से बाहर हो गई और विजय की TVK ने शानदार शुरुआत करते हुए सबको चौंका दिया। हालांकि कांग्रेस खुद केवल पांच सीटें ही जीत सकी, लेकिन TVK के सबसे बड़ी पार्टी बनने के बावजूद बहुमत से दूर रहने के कारण कांग्रेस ने सरकार गठन में समर्थन देने के संकेत तेजी से देने शुरू कर दिए।
उन्होंने कहा कि यह जरूर कहा जा सकता है कि कांग्रेस ने DMK के साथ विश्वासघात किया, पाला बदल लिया और अवसरवादी रवैया अपनाया। इसमें कुछ सच्चाई भी है।
हालांकि उनके मुताबिक DMK और INDIA गठबंधन के अन्य सहयोगियों को यह भी सोचना होगा कि विकल्प क्या था। क्या वे ऐसी स्थिति चाहते थे जिसमें भाजपा नेतृत्व वाले NDA को मौका मिल जाता? या फिर AIADMK और DMK के साथ आने की चर्चाओं के जरिए केवल विजय के नेतृत्व वाली सरकार को रोकने की कोशिश होती?
उन्होंने सवाल उठाया कि तमिलनाडु जैसे राज्य में क्या ऐसा राजनीतिक या सामाजिक रूप से उचित माना जाता? और क्या इससे TVK तथा विजय के पक्ष में मिले जनादेश को कमजोर नहीं किया जाता?
चुनाव प्रचार के दौरान ही दिखने लगी थी दूरी
उन्होंने कहा कि चुनाव प्रचार के दौरान भी कांग्रेस ने TVK को लेकर बेहद सावधानी बरती थी। कांग्रेस ने भाजपा और AIADMK पर भाजपा के साथ जाने को लेकर हमला किया, लेकिन विजय पर कभी खुलकर आक्रामक रुख नहीं अपनाया।
उनके मुताबिक, इसी से DMK को संकेत मिल जाना चाहिए था कि अगर चुनाव परिणाम उम्मीद के अनुसार नहीं आते, तो कांग्रेस TVK से दोबारा संपर्क स्थापित करेगी। आखिरकार वही हुआ।
उन्होंने यह भी कहा कि पूरे चुनाव प्रचार के दौरान कांग्रेस और DMK के अभियान में तालमेल की कमी साफ नजर आई। राहुल गांधी ने प्रचार के दौरान एमके स्टालिन के साथ मंच साझा करने से भी परहेज किया।
पिछले चुनावों की तरह दोनों नेताओं के बीच भाईचारे का सार्वजनिक प्रदर्शन इस बार देखने को नहीं मिला। प्रचार के दौरान ही मतभेद दिखाई देने लगे थे, जो अब कांग्रेस के पक्ष बदलने के साथ औपचारिक रूप से सामने आ गए हैं।
कांग्रेस अब TVK का समर्थन कैसे उचित ठहरा सकती है?
इस सवाल पर पुनीत यादव ने कहा कि कांग्रेस और TVK के लिए तमिलनाडु की जनता को समझाना बहुत कठिन नहीं होगा।
उन्होंने कहा कि चुनाव प्रचार के दौरान ही यह स्पष्ट हो गया था कि कांग्रेस के भीतर एक बड़ा वर्ग चुनाव से पहले ही TVK के साथ गठबंधन चाहता था।
इसके अलावा CPI और CPM समेत वे सभी दल, जिन्होंने अब विजय को समर्थन दिया है, यह तर्क दे रहे हैं कि वे तमिलनाडु में भाजपा या किसी सांप्रदायिक शक्ति को सत्ता में आने से रोकना चाहते थे।
इन दलों का यह भी कहना है कि TVK और उनके दल धर्मनिरपेक्षता के साझा सिद्धांत पर विश्वास करते हैं।
कांग्रेस द्वारा TVK को दिए गए समर्थन पत्र में भी साफ लिखा गया है कि यह समर्थन इस शर्त पर है कि TVK किसी सांप्रदायिक ताकत या संविधान को कमजोर करने वाली शक्तियों के साथ गठबंधन नहीं करेगी।
उन्होंने कहा कि विजय की जीत का पैमाना भी यहां अहम है। एक राजनीतिक नए चेहरे का DMK और AIADMK जैसी मजबूत पार्टियों के खिलाफ 108 सीटें जीतना यह दिखाता है कि तमिलनाडु की जनता TVK की सरकार चाहती थी।
इसी वजह से कांग्रेस, CPI, CPM और VCK जैसी पार्टियां यह कहकर अपने समर्थन को सही ठहरा सकती हैं कि वे जनता के जनादेश का सम्मान कर रही हैं।
असली विवाद समर्थन नहीं बल्कि उसका तरीका है
उन्होंने कहा कि कांग्रेस यह भी कह सकती है कि वह DMK गठबंधन का हिस्सा जरूर थी, लेकिन DMK सरकार का हिस्सा नहीं थी। इसलिए सत्ता विरोधी लहर सीधे कांग्रेस के खिलाफ नहीं थी।
हालांकि उनके मुताबिक बड़ा सवाल यह नहीं है कि कांग्रेस ने TVK को समर्थन दिया बल्कि यह है कि उसने किस तरीके से समर्थन दिया।
DMK अब भी 30 प्रतिशत से अधिक वोट शेयर रखती है। ऐसे में उन DMK समर्थकों को यह समझाना कांग्रेस के लिए चुनौतीपूर्ण होगा कि उसने अपने सहयोगी दल के साथ ऐसा व्यवहार क्यों किया।
क्या कांग्रेस पर विश्वासघात का आरोप उचित है?
इस सवाल के जवाब में पुनीत यादव ने कहा कि भारतीय राजनीति में गठबंधन बनने और टूटने के दौरान ऐसे आरोप स्वाभाविक हैं।
उन्होंने याद दिलाया कि यह पहली बार नहीं है, जब कांग्रेस और DMK अलग हुए हैं। 2014 लोकसभा चुनाव से पहले खुद DMK ने प्रेस कॉन्फ्रेंस कर कांग्रेस से संबंध तोड़ने का ऐलान किया था।
उन्होंने यह भी कहा कि पश्चिम बंगाल में तृणमूल कांग्रेस हमेशा यह कहती रही है कि INDIA गठबंधन केवल राष्ट्रीय स्तर पर है, राज्य राजनीति में नहीं।
इसके अलावा VCK, CPI और CPM जैसे दल, जो पहले DMK के साथ थे, अब वे भी TVK के समर्थन में चले गए हैं।
इसलिए असली मुद्दा गठबंधन बदलना नहीं, बल्कि उसका तरीका है।
कांग्रेस जल्दबाजी में सत्ता की भूखी दिखी
उन्होंने कहा कि कांग्रेस राजनीतिक रूप से इस झटके को थोड़ा नरम बना सकती थी। वह CPI, CPM और VCK की तरह कुछ दिनों बाद समर्थन की घोषणा कर सकती थी।
कांग्रेस किसी वरिष्ठ नेता जैसे दिग्विजय सिंह, बीके हरिप्रसाद, भूपिंदर सिंह हुड्डा या अशोक गहलोत को स्टालिन से बातचीत के लिए भेज सकती थी। यहां तक कि पी चिदंबरम को भी यह जिम्मेदारी दी जा सकती थी, क्योंकि उनके स्टालिन से अच्छे संबंध हैं।
उन्होंने कहा कि कांग्रेस शुरुआत में बाहर से समर्थन देने की बात भी कर सकती थी, जिससे वह नैतिक बढ़त बनाए रखती और यह संदेश देती कि वह केवल जनादेश का सम्मान कर रही है।
लेकिन कांग्रेस ने तुरंत समर्थन की घोषणा कर दी और सत्ता साझेदारी को लेकर उत्सुक दिखाई दी। यही फर्क कांग्रेस और वाम दलों के रवैये में नजर आया।
क्या INDIA गठबंधन के अंत की शुरुआत है यह?
उन्होंने कहा कि कांग्रेस ने जिस तरीके से इस पूरे मामले को संभाला, उससे कई सहयोगी दलों और खुद कांग्रेस के भीतर भी असहजता पैदा हुई है।
अखिलेश यादव की X पोस्ट इसका स्पष्ट संकेत थी। उन्होंने ममता बनर्जी और एमके स्टालिन के साथ अपनी तस्वीरें साझा करते हुए अप्रत्यक्ष रूप से कहा कि कुछ नेता कठिन समय में अपने सहयोगियों का साथ नहीं छोड़ते।
पुनीत यादव ने कहा कि कांग्रेस सीट बंटवारे के दौरान राष्ट्रीय पार्टी होने के आधार पर अधिक सीटें मांगती है, लेकिन बाद में उन्हें जीत में बदलने में संघर्ष करती है।
हालांकि अखिलेश यादव ने सीधे कांग्रेस का नाम नहीं लिया। लेकिन उनका संदेश स्पष्ट था।
उन्होंने कहा कि यह असहजता काफी समय से बढ़ रही थी। पश्चिम बंगाल चुनाव प्रचार के दौरान राहुल गांधी ने सार्वजनिक रूप से ममता बनर्जी की आलोचना की थी, जिसे भाजपा ने भी जोर-शोर से उठाया था।
उनके मुताबिक, यदि ऐसा बयान अधीर रंजन चौधरी जैसे किसी राज्य स्तरीय नेता ने दिया होता, तो उसे स्थानीय राजनीति मानकर नजरअंदाज किया जा सकता था। लेकिन जब राहुल गांधी खुद ऐसा कहते हैं, तो सहयोगी दल उसे गंभीरता से लेते हैं।
उन्होंने कहा कि विपक्षी गठबंधन में कांग्रेस की स्थिति मजबूरी के कारण मजबूत बनी हुई है, क्योंकि उसके पास लगभग 99 सांसद हैं। लेकिन इसका मतलब यह नहीं कि वह सहयोगियों के साथ उपेक्षापूर्ण व्यवहार करे।
उन्होंने कहा कि बिहार में RJD, बंगाल में TMC और अब तमिलनाडु में DMK समेत कई सहयोगी दलों को कांग्रेस से शिकायत रही है।
हालांकि इस चुनाव चक्र में कांग्रेस के लिए राहत की बात केवल केरल रही, जहां वह जीतने में सफल रही, जबकि ममता बनर्जी और स्टालिन हार गए।
इसके अलावा कांग्रेस असम में भी कमजोर प्रदर्शन करती नजर आई। ऐसे में इस पूरे घटनाक्रम ने INDIA गठबंधन की छवि को नुकसान पहुंचाया है।
लेकिन कई अन्य राज्यों में कांग्रेस अब चुनावी स्तर पर उतना योगदान नहीं दे पा रही है।
कई राज्यों में सहयोगी दलों के बिना कांग्रेस लगभग राजनीतिक रूप से अस्तित्वहीन हो चुकी है।
तमिलनाडु में जब कांग्रेस ने 2014 लोकसभा चुनाव अकेले लड़ा था, तब वह एक भी सीट जीतने में सफल नहीं हो पाई थी।
इसी तरह उत्तर प्रदेश में प्रियंका गांधी के नेतृत्व में 2022 विधानसभा चुनाव अकेले लड़ने पर कांग्रेस को 403 सदस्यीय विधानसभा में केवल दो सीटें मिली थीं।
ऐसे में स्वाभाविक रूप से सहयोगी दल कांग्रेस को चुनावी बोझ या कमजोर कड़ी के रूप में देखने लगते हैं।
अगले चुनाव से पहले उत्तर प्रदेश की राजनीति पर इसका क्या असर पड़ सकता है?
पुनीत निकोलस यादव के मुताबिक, उत्तर प्रदेश भारत का सबसे महत्वपूर्ण राजनीतिक राज्य बना हुआ है, क्योंकि यहां 80 लोकसभा सीटें हैं और राष्ट्रीय राजनीति पर इसका गहरा प्रभाव पड़ता है।
उन्होंने कहा कि कांग्रेस का उत्तर प्रदेश में पिछले कई दशकों से लगातार पतन हुआ है और अब उसका राजनीतिक अस्तित्व मुख्य रूप से गठबंधनों के सहारे टिका हुआ है।
राज्य में प्रासंगिक बने रहने के लिए कांग्रेस को समाजवादी पार्टी जैसे मजबूत सहयोगी की जरूरत है।
यदि समाजवादी पार्टी के साथ उसके संबंध खराब होते हैं तो उत्तर प्रदेश में कांग्रेस का भविष्य बेहद कठिन हो सकता है।
उन्होंने याद दिलाया कि 2022 विधानसभा चुनाव में प्रियंका गांधी के पूरे अभियान का नेतृत्व करने के बावजूद कांग्रेस केवल दो सीटें जीत सकी थी।
हालांकि 2024 लोकसभा चुनाव में समाजवादी पार्टी के साथ गठबंधन ने दोनों दलों को बड़ा लाभ पहुंचाया और वे मिलकर 80 में से 43 सीटें जीतने में सफल रहे।
कांग्रेस को उम्मीद है कि यही राजनीतिक गति विधानसभा चुनाव तक भी जारी रहेगी।
लेकिन तमिलनाडु का हालिया घटनाक्रम अब इस समीकरण को जटिल बना रहा है।
उन्होंने कहा कि कांग्रेस को अभी भी संगठनात्मक रूप से मजबूत या चुनावी तौर पर बेहद सक्षम पार्टी के रूप में नहीं देखा जाता। अब उसके सामने यह खतरा भी पैदा हो गया है कि उसे अविश्वसनीय और अवसरवादी सहयोगी के रूप में देखा जाए।
ऐसे में जब उत्तर प्रदेश में सीट बंटवारे की बातचीत शुरू होगी तो अखिलेश यादव काफी सख्त रुख अपना सकते हैं।
कांग्रेस को अपनी पसंद के मुताबिक सीटों की संख्या हासिल करने में भी कठिनाई हो सकती है और गठबंधन की एकजुटता बनाए रखना भी चुनौतीपूर्ण हो सकता है।
उन्होंने कहा कि इसलिए यह समय केवल कांग्रेस के लिए ही नहीं बल्कि पूरे INDIA गठबंधन के लिए चुनौतीपूर्ण साबित हो सकता है।
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