रेवंत रेड्डी का ड्रीम प्रोजेक्ट घिरा सवालों में,किसान संगठनों का विरोध तेज
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रेवंत रेड्डी का ड्रीम प्रोजेक्ट घिरा सवालों में,किसान संगठनों का विरोध तेज

तेलंगाना की भारत फ्यूचर सिटी परियोजना पर जमीन अधिग्रहण, किसानों के विस्थापन, रोजगार और पर्यावरणीय प्रभाव को लेकर सवाल उठ रहे हैं।


तेलंगाना सरकार की महत्वाकांक्षी “भारत फ्यूचर सिटी” परियोजना को लेकर तैयारियां तेज हो गई हैं। मुख्यमंत्री रेवंत रेड्डी 2 जून, तेलंगाना स्थापना दिवस के मौके पर इस परियोजना का उद्घाटन करने वाले हैं। हालांकि, परियोजना के शुरू होने से पहले ही इसे लेकर कई गंभीर सवाल उठने लगे हैं। सबसे बड़ा सवाल यह है कि क्या यह प्रोजेक्ट वास्तव में आर्थिक विकास और रोजगार पैदा करेगा, या फिर यह केवल राजनीतिक ब्रांडिंग और रियल एस्टेट हितों को बढ़ावा देने वाला कदम साबित होगा, जिसकी कीमत किसानों और ग्रामीण समुदायों को चुकानी पड़ेगी।

परियोजना को लेकर बढ़ा राजनीतिक और सामाजिक विवाद

हाल के दिनों में कांग्रेस और विपक्षी भारत राष्ट्र समिति (BRS) के बीच “भारत फ्यूचर सिटी” को लेकर तीखी राजनीतिक बयानबाजी देखने को मिली है। बीआरएस ने सत्ता में आने पर इस परियोजना को रद्द करने की चेतावनी दी, जबकि कांग्रेस ने इसका जवाब देते हुए परियोजना को तेलंगाना के भविष्य के विकास का आधार बताया।

हालांकि, किसान संगठन “रायथु स्वराज्य वेदिका” (RSV) के नेता कन्नेगंती रवि का कहना है कि इस मुद्दे को केवल राजनीतिक आरोप-प्रत्यारोप तक सीमित नहीं रखा जाना चाहिए। उनके मुताबिक तेलंगाना और आंध्र प्रदेश में लगातार ऐसी “ड्रीम प्रोजेक्ट” राजनीति होती रही है, जिनकी योजना शीर्ष स्तर पर बनाई जाती है लेकिन जनता से पर्याप्त चर्चा नहीं की जाती।

रवि ने कहा कि “भारत फ्यूचर सिटी” भी एक ऐसा ही प्रोजेक्ट है, जिसे लोगों की वास्तविक जरूरतों के बजाय बड़े स्तर पर शहरी विस्तार और रियल एस्टेट विकास को ध्यान में रखकर तैयार किया गया है।

30 हजार एकड़ में बनेगी नई स्मार्ट सिटी

सरकार के मुताबिक यह परियोजना भारत की पहली “नेट-जीरो ग्रीनफील्ड स्मार्ट सिटी” होगी। यह करीब 30 हजार एकड़ क्षेत्र में श्रीशैलम और नागार्जुनसागर हाईवे के बीच, हैदराबाद और राजीव गांधी अंतरराष्ट्रीय एयरपोर्ट के पास विकसित की जाएगी।लेकिन रवि ने सवाल उठाया कि जब हैदराबाद, सिकंदराबाद और साइबराबाद जैसे मौजूदा शहरी क्षेत्रों में अब भी काफी खाली जगह और बुनियादी ढांचा मौजूद है, तो फिर नई सिटी बसाने की जरूरत क्यों है?

उनका कहना है कि उद्योगों और निवेश के लिए पहले से मौजूद शहरी क्षेत्रों को विकसित किया जा सकता है, बजाय इसके कि उपजाऊ कृषि भूमि को रियल एस्टेट में बदला जाए।

किसानों के विस्थापन और जमीन अधिग्रहण पर चिंता

रवि ने चेतावनी दी कि परियोजना के लिए प्रस्तावित 30 हजार एकड़ जमीन का दायरा आगे और बढ़ सकता है, जिससे कृषि पर निर्भर गांवों को गंभीर खतरा पैदा होगा।उन्होंने आरोप लगाया कि प्रभावित गांवों को अब तक पुनर्वास, मुआवजा, रोजगार और पर्यावरणीय सुरक्षा से जुड़ी स्पष्ट जानकारी नहीं दी गई है।

रवि ने सरकार की भूमि उपयोग नीति पर भी सवाल उठाते हुए कहा कि तेलंगाना में कृषि, जंगल, शहरी विस्तार, उद्योग और सार्वजनिक उपयोग की जमीनों के लिए कोई व्यापक नीति ढांचा नहीं है। ऐसे में सरकार निजी कंपनियों को बड़ी मात्रा में जमीन कैसे सौंप सकती है?उन्होंने अमेजन और रिलायंस जैसी कंपनियों का उदाहरण देते हुए कहा कि बड़े कॉर्पोरेट हितों को प्राथमिकता दी जा रही है।

सरकार के समर्थन में क्या बोले विशेषज्ञ?

सार्वजनिक नीति विशेषज्ञ मोहन राव ने हालांकि परियोजना का बचाव किया। उन्होंने कहा कि हर मुख्यमंत्री अपनी विकास संबंधी विरासत छोड़ना चाहता है।उन्होंने भारत फ्यूचर सिटी की तुलना पूर्व मुख्यमंत्री वाईएस राजशेखर रेड्डी की “आरोग्यश्री” योजना और एन. चंद्रबाबू नायडू की “हाइटेक सिटी” जैसी परियोजनाओं से की।राव के मुताबिक मुख्यमंत्री रेवंत रेड्डी भी इस परियोजना के जरिए तेलंगाना के लिए नया आर्थिक विकास केंद्र तैयार करना चाहते हैं।

उन्होंने कहा कि तेजी से बढ़ते शहरीकरण के कारण इस तरह की परियोजनाएं जरूरी हो गई हैं। उनके अनुसार तेलंगाना की लगभग 38 प्रतिशत आबादी अब शहरी क्षेत्रों में रहती है और हैदराबाद अपने विस्तार की सीमा तक पहुंच चुका है।

रोजगार और औद्योगिक निवेश पर जोर

मोहन राव का कहना है कि बेरोजगारी से निपटने के लिए औद्योगिकीकरण बेहद जरूरी है, क्योंकि केवल सरकारें पर्याप्त नौकरियां पैदा नहीं कर सकतीं।उन्होंने कहा कि विदेशी निवेश आकर्षित करने के लिए विश्वस्तरीय और एकीकृत इंफ्रास्ट्रक्चर की जरूरत होती है और यही इस परियोजना का मुख्य उद्देश्य है।

राव ने दावा किया कि इस प्रोजेक्ट में कार्यस्थल, स्कूल, अस्पताल और आवास को एकीकृत तरीके से विकसित करने की योजना है, जो हैदराबाद के बिखरे हुए शहरी ढांचे से अलग होगी।उनके मुताबिक अगर यह मॉडल सही तरीके से लागू किया गया तो तेलंगाना औद्योगिक निवेश आकर्षित करने में दूसरे राज्यों से आगे निकल सकता है।

रोजगार और पर्यावरण को लेकर उठे सवाल

कन्नेगंती रवि ने सवाल उठाया कि क्या विस्थापित किसानों, मजदूरों, गांव के युवाओं और महिलाओं को रोजगार की गारंटी मिलेगी?उन्होंने यह भी पूछा कि क्या प्रस्तावित उद्योग सरकार के “नेट-जीरो” लक्ष्य के अनुरूप होंगे या फिर प्रदूषण, जल संकट और ड्रेनेज जैसी नई समस्याएं पैदा करेंगे।रवि ने चेतावनी दी कि इस परियोजना से 54 गांवों के हजारों किसान परिवारों की आजीविका प्रभावित हो सकती है।

उन्होंने मुआवजा राशि पर भी सवाल उठाए। उनके मुताबिक सरकार जहां 35 लाख रुपये प्रति एकड़ मुआवजा देने की बात कर रही है, वहीं बाजार में जमीन की कीमत करीब 2 करोड़ रुपये प्रति एकड़ तक है। उन्होंने परियोजना से जुड़े सभी दस्तावेज सार्वजनिक करने की मांग की ताकि पारदर्शिता बनी रहे।

पारदर्शिता और जनभागीदारी की जरूरत

मोहन राव ने भी माना कि इस परियोजना पर व्यापक सार्वजनिक चर्चा और पारदर्शिता जरूरी है।उन्होंने कहा कि परियोजना अभी शुरुआती चरण में है और सरकार को सामाजिक संगठनों, विशेषज्ञों और प्रभावित समुदायों के साथ चर्चा करनी चाहिए।

राव ने यह भी माना कि सरकार को किसानों के साथ अन्याय नहीं होने देना चाहिए और उचित मुआवजा सुनिश्चित करना होगा। उन्होंने चेतावनी दी कि अगर लोगों के अधिकारों का उल्लंघन हुआ तो विरोध बढ़ना तय है।

क्या भारत फ्यूचर सिटी बनेगी विकास का मॉडल?

फिलहाल “भारत फ्यूचर सिटी” तेलंगाना सरकार की सबसे महत्वाकांक्षी परियोजनाओं में से एक बन चुकी है। सरकार इसे भविष्य के आर्थिक और औद्योगिक विकास का केंद्र बता रही है, जबकि किसान संगठन और सामाजिक कार्यकर्ता इसे बड़े पैमाने पर भूमि अधिग्रहण और विस्थापन का कारण मान रहे हैं।

अब सबसे बड़ा सवाल यही है कि क्या यह परियोजना वास्तव में समावेशी विकास का मॉडल बनेगी, या फिर यह केवल एक महत्वाकांक्षी राजनीतिक सपना साबित होगी। इसका जवाब आने वाले समय में ही सामने आएगा।

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