विजय वह शख्स जो मौन रहता है, क्या राजनीति में भी खामोशी ताकत है?
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अभिनेता और टीवीके प्रमुख विजय। फाइल फोटो।

'विजय' वह शख्स जो 'मौन' रहता है, क्या राजनीति में भी खामोशी 'ताकत' है?

विजय की एक ऐसी रैली हुई, जिसमें 41 लोग मारे गए, CBI से समन मिला, उनकी 30 साल पुरानी शादी सार्वजनिक रूप से टूटी और उनकी अंतिम फिल्म रिलीज से पहले लीक हो गई...


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तमिलनाडु: एक ऐसा लोकतंत्र जो भाषणों के ओज, प्रेस कॉन्फ्रेंस की गहमागहमी, आधी रात की प्रेस मुलाकातों और टीवी डिबेट की बयानबाजी पर टिका हो, वहां एक व्यक्ति ने अपनी पूरी राजनीतिक पहचान संवाद से सोचे-समझे इनकार (Refusal to engage) पर खड़ी कर दी है। थलपति विजय के नाम पर एक ऐसी रैली हुई, जिसमें 41 लोग मारे गए। उन्हें सीबीआई ने समन भेजा, उनकी 30 साल पुरानी शादी सार्वजनिक रूप से टूट गई और उनकी आखिरी फिल्म रिलीज से पहले ही लीक हो गई। इन सबके बावजूद विजय की प्रतिक्रिया हर बार एक जैसी थी, एक रहस्यमयी और पूर्ण 'खामोशी'। तमिलनाडु की जनता ने उनकी इस चुप्पी का जवाब उन्हें 108 सीटें देकर दिया।

करूर हादसा: जब खामोशी ने जवाबदेही की जगह ले ली

इस सफर की सबसे दर्दनाक शुरुआत 27 सितंबर 2025 को हुई, जब करूर में विजय की पार्टी टीवीके (TVK) की रैली एक भीषण त्रासदी में बदल गई। खबरों के मुताबिक, विजय वहां निर्धारित समय से सात घंटे की देरी से पहुंचे। हजारों लोग सुबह से भीषण गर्मी में खड़े थे। जैसे ही उनका काफिला दिखा, भीड़ अनियंत्रित हो गई। बैरिकेड्स टूट गए और भगदड़ में महिलाओं और बच्चों समेत 41 लोगों की मौत हो गई।

पूरे देश की मीडिया और विपक्षी दलों ने विजय को निशाने पर लिया। सुप्रीम कोर्ट ने सीबीआई जांच के आदेश दिए। विजय ने प्रत्येक परिवार को 20 लाख रुपये के मुआवजे और दो हफ्ते के लिए रैलियां स्थगित करने की घोषणा की। तीन दिन बाद एक वीडियो जारी किया जिसमें दुख और मुख्यमंत्री स्टालिन को चुनौती तो थी। लेकिन कोई सीधा जवाब नहीं था। उन्होंने न प्रेस कॉन्फ्रेंस की, न पत्रकारों का सामना किया। उन्होंने यह कभी नहीं बताया कि चूक कहाँ हुई या उनका काफिला सात घंटे लेट क्यों था। यह पहली बार था जब उनकी चुप्पी ने 'जवाबदेही की कमी' का अहसास कराया।

विवादों का ढेर और अडिग चुप्पी

जनवरी 2026 में उनकी आखिरी फिल्म 'जन नायकन' के रिलीज पर कानूनी संकट मंडराने लगा। जब पोंगल पर फिल्म रिलीज नहीं हो पाई और विजय को सीबीआई मुख्यालय जाना पड़ा, तब भी उन्होंने कैमरों के सामने एक शब्द नहीं बोला। फरवरी के अंत में उनकी पत्नी संगीता सोर्नलिंगम द्वारा तलाक की अर्जी ने सबको चौंका दिया, जिसमें 'बेवफाई और भावनात्मक क्रूरता' जैसे गंभीर आरोप थे। विजय ने केवल एक सार्वजनिक कार्यक्रम में एक वाक्य कहा: "मेरे आसपास की हालिया समस्याओं की चिंता न करें, वे इस लायक नहीं हैं।"

तलाक की अर्जी के बाद जब वे अभिनेत्री तृषा कृष्णन के साथ एक शादी समारोह में दिखे, तो समाज का एक हिस्सा भड़क उठा, लेकिन विजय टस से मस नहीं हुए। 10 अप्रैल को उनकी 300 करोड़ की फिल्म ऑनलाइन लीक हो गई, प्रोड्यूसर तबाह हो गए, लेकिन विजय फिर भी खामोश रहे।

खामोशी का राजनीतिक तर्क: क्यों काम कर गया यह जादू?

विजय की यह चुप्पी कोई इत्तेफाक नहीं बल्कि एक सुनियोजित 'आर्किटेक्चर' है। राजनीति में हर बयान एक लक्ष्य (Target) होता है, जिसे विपक्ष काट-छांट कर पेश कर सकता है। विजय ने चुप रहकर अपने विरोधियों को वह गोला-बारूद ही नहीं दिया, जिससे उनके खिलाफ जवाबी नैरेटिव बनाया जा सके।

तमिलनाडु की जनता दशकों से द्रविड़ दलों (DMK और AIADMK) के बीच के शोर और आपसी आरोपों से थक चुकी थी। इस शोर के बीच विजय की चुप्पी को युवाओं और महिलाओं ने 'गरिमा' (Dignity) के रूप में देखा। परिणाम स्वरूप, वे 108 सीटों के साथ सबसे बड़े दल के रूप में उभरे-1960 के बाद पहली बार किसी गैर-द्रविड़ दल ने ऐसी बढ़त बनाई।

आज का संकट: सत्ता की दहलीज पर मौन की परीक्षा

विजय के सामने आज जो संकट है, वह उनके पिछले सभी संकटों से अलग है। राज्यपाल ने उन्हें सरकार बनाने का न्योता देने से इनकार कर दिया है क्योंकि उनके पास पूर्ण बहुमत नहीं है। अब उनके सामने वे मंझे हुए राजनेता हैं जो बातचीत और सौदेबाजी में माहिर हैं।

दिलचस्प बात यह है कि इस हफ्ते उन्होंने कक्षा 12 के छात्रों को बधाई देते हुए एक ट्वीट किया, जिसमें असफल छात्रों के लिए लिखा था: "வெற்றியின் அருகில்தான் இருக்கிறோம் என்பதை நினைவில் கொள்ளுங்கள்" (याद रखें-हम जीत के करीब हैं)। यहां 'हम' शब्द का प्रयोग उनके 108 निर्वाचन क्षेत्रों और समर्थकों के लिए एक बड़ा राजनीतिक संकेत माना जा रहा है।

सवाल अब भी वही है, जिस खामोशी ने विजय को चुनाव जिताया, क्या वही खामोशी उन्हें सरकार भी दिला पाएगी? यह देखना तमिलनाडु की राजनीति का सबसे दिलचस्प अध्याय होगा।

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