
ममता की TMC में महासंकट, चौराहे पर खड़ी बंगाल की विपक्षी राजनीति!
बागी गुट का दावा है कि उन्हें टीएमसी के 60 से अधिक विधायकों और पार्टी के 28 लोकसभा सांसदों में से 19 से 20 सांसदों का समर्थन हासिल है। अगर कागजों पर यह आंकड़े सच साबित होते हैं, तो यह बंगाल के इतिहास का सबसे बड़ा विभाजन होगा। लेकिन अभी तक इस दावे के ठोस सबूत सामने नहीं आए हैं।
पश्चिम बंगाल में नई सरकार बने एक महीने से ज्यादा का समय हो चुका है। लोकतांत्रिक परंपरा के हिसाब से इस वक्त नई सरकार के कामकाज और उसकी जवाबदेही पर चर्चा होनी चाहिए थी। लेकिन बंगाल में सुर्खियां आज भी तृणमूल कांग्रेस (TMC) ही बटोर रही है, मगर गलत वजहों से।
ममता बनर्जी की पार्टी इस समय अपने इतिहास के सबसे बड़े आंतरिक संकट से गुजर रही है। टीएमसी के विधायक बागी हो चुके हैं, सांसदों ने विद्रोह का झंडा बुलंद कर दिया है और वरिष्ठ नेता खुलेआम शीर्ष नेतृत्व पर सवाल उठा रहे हैं। यह बगावत किस अंजाम तक पहुंचेगी, यह तो वक्त तय करेगा; लेकिन इस उठापटक ने बंगाल की राजनीति को पूरी तरह अस्थिर कर दिया है।
कल्याण बनर्जी का अल्टीमेटम: "मैं या अभिषेक"
पार्टी के भीतर चल रही इस जंग की कड़वी सच्चाई गुरुवार (11 जून) को तब खुलकर सामने आ गई, जब दो दशकों से ममता बनर्जी के सबसे वफादार सिपहसालार रहे कल्याण बनर्जी ने सीधे अभिषेक बनर्जी पर निशाना साधा। कल्याण बनर्जी ने सार्वजनिक रूप से कहा, "मैं ममता बनर्जी के साथ हूँ। लेकिन अब ममता को यह तय करना होगा कि वह अपने साथ अभिषेक को रखेंगी या मुझे।"
कल्याण बनर्जी का यह बयान कोई मामूली टिप्पणी नहीं है। यह दिखाता है कि पार्टी के भीतर पुरानी पीढ़ी के नेताओं और अभिषेक बनर्जी की नई कॉर्पोरेट शैली के बीच की खाई अब पाटी नहीं जा सकती। बागी नेताओं का आरोप है कि अभिषेक बनर्जी ने पूरी ताकत अपने हाथों में ले ली है, अनुभवी और वरिष्ठ नेताओं को किनारे कर दिया है और जिला स्तर के नेतृत्व को पूरी तरह कमजोर कर दिया है।
क्या वाकई होने वाली है पार्टी में बड़ी टूट?
बागी गुट का दावा है कि उन्हें टीएमसी के 60 से अधिक विधायकों और पार्टी के 28 लोकसभा सांसदों में से 19 से 20 सांसदों का समर्थन हासिल है। अगर कागजों पर यह आंकड़े सच साबित होते हैं, तो यह बंगाल के इतिहास का सबसे बड़ा विभाजन होगा। लेकिन अभी तक इस दावे के ठोस सबूत सामने नहीं आए हैं।
बागी खेमे ने अभी तक लोकसभा अध्यक्ष के सामने ऐसा कोई पत्र पेश नहीं किया है जिस पर इन सभी सांसदों के हस्ताक्षर हों। संसदीय राजनीति में मान्यता दावों से नहीं, बल्कि हस्ताक्षरित दस्तावेजों से मिलती है। इस बीच, कुछ बड़े नामों ने इस बागी गुट से खुद को अलग कर लिया है। आसनसोल के सांसद शत्रुघ्न सिन्हा ने साफ तौर पर कहा कि वह इस मुश्किल वक्त में ममता बनर्जी का साथ छोड़कर कहीं नहीं जाने वाले हैं। उनका मानना है कि हार के बावजूद बंगाल की जमीन पर ममता बनर्जी का जनाधार अभी भी बेहद मजबूत है।
बगावत का कोई वैचारिक आधार नहीं
अगर हम इस पूरी बगावत को गहराई से देखें, तो इसमें सबसे हैरान करने वाली बात इसकी 'वैचारिक शून्यता' (Ideological Emptiness) है। बागी नेता अभिषेक बनर्जी के अहंकार और उनकी कार्यशैली पर तो सवाल उठा रहे हैं, लेकिन उनका अपना कोई नया राजनीतिक एजेंडा या विजन नहीं है।
आज जो नेता टीएमसी के सिस्टम को दोषपूर्ण बता रहे हैं, वे खुद सालों तक उसी सिस्टम के सबसे बड़े लाभार्थी रहे हैं। उन्होंने सालों तक उसी व्यवस्था का बचाव किया जिसे वे आज गलत कह रहे हैं। इसलिए, इस बगावत को किसी विचारधारा की लड़ाई के बजाय 'राजनीतिक अवसरवाद' के रूप में देखा जा रहा है। वैसे भी बंगाल की राजनीति लंबे समय से विचारधारा के बजाय सत्ता की मलाई के इर्द-गिर्द घूमती रही है। खुद टीएमसी ने कभी कांग्रेस और वामपंथियों के नेताओं को तोड़कर अपनी ताकत बढ़ाई थी, और आज वही राजनीति खुद टीएमसी को निगलने की कोशिश कर रही है।
क्या राजनीतिक रूप से अप्रासंगिक हो चुकी है टीएमसी?
चुनाव में मिली करारी हार के बाद ऐसा माहौल बनाया जा रहा है कि टीएमसी अब पूरी तरह खत्म हो चुकी है। लेकिन चुनाव के आंकड़े कुछ और ही कहानी बयां करते हैं। इतनी मजबूत एंटी-इंकंबेंसी, भ्रष्टाचार के संगीन आरोपों और अंदरूनी कलह के बावजूद, बंगाल के हर 10 में से 4 मतदाताओं ने (यानी 40% से अधिक लोगों ने) टीएमसी को वोट दिया है।
यह कम होता हुआ जनाधार भी इतना बड़ा जरूर है कि ममता बनर्जी के पास राजनीतिक रूप से वापसी करने के विकल्प हमेशा खुले रहेंगे। हालांकि, चुनाव के बाद टीएमसी नेताओं पर जनता द्वारा अंडे फेंके जाना, उन्हें जनसभाओं से खदेड़ना और "चोर-चोर" के नारे लगाना यह दिखाता है कि जनता में भारी गुस्सा है। लेकिन जिस तरह से इन घटनाओं पर स्थानीय प्रशासन और नई व्यवस्था चुप्पी साधे हुए है, वह यह भी इशारा करता है कि बंगाल का यह सत्ता परिवर्तन जितना सीधा दिख रहा है, उतना है नहीं। इसके पीछे कई और राजनीतिक ताकतें काम कर रही हैं।
कांग्रेस के साथ विलय की अफवाहें और सच
पार्टी के इस संकट के बीच दिल्ली के सियासी गलियारों में यह चर्चा भी तेज हो गई थी कि टीएमसी खुद का अस्तित्व बचाने के लिए कांग्रेस में विलय कर सकती है। ममता बनर्जी और गांधी परिवार के बीच की नजदीकियों ने इन अफवाहों को हवा दी।
हालांकि, कांग्रेस के वरिष्ठ नेता जयराम रमेश ने इन खबरों को पूरी तरह खारिज करते हुए साफ किया कि टीएमसी के साथ बातचीत सिर्फ 'इंडिया गठबंधन' (INDIA Bloc) के तहत समन्वय बनाने तक सीमित है, न कि संगठनात्मक विलय के लिए। टीएमसी के नेतृत्व ने भी इस तरह के किसी विलय की संभावना से दूरी बनाए रखी है।
बीजेपी के लिए बागियों का 'संकट'
बंगाल की नई बीजेपी सरकार को इस समय विपक्ष के बिखराव का सीधा फायदा मिल रहा है। लेकिन भविष्य की राह इतनी आसान नहीं है। बीजेपी के अंदर ही अब टीएमसी के बागी नेताओं को एंट्री देने को लेकर भारी विरोध शुरू हो गया है।
पूर्व राज्यपाल और बंगाल बीजेपी के कद्दावर नेता तथागत रॉय ने खुलेआम प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और गृह मंत्री अमित शाह से अपील की है कि वे टीएमसी की बागी सांसद सायोनी घोष जैसी विवादित नेताओं को पार्टी में शामिल न करें। इसी तरह, अर्जुन सिंह ने भी 2021 के चुनाव के बाद हुई हिंसा का हवाला देते हुए बागी सांसद पार्थ भौमिक की गिरफ्तारी की मांग कर दी है।
बीजेपी के जमीनी कार्यकर्ता सालों तक जिन टीएमसी नेताओं के खिलाफ भ्रष्टाचार और अत्याचार के आरोप लगाकर लड़ते रहे, आज उन्हीं को गले लगाना पार्टी के लिए आत्मघाती साबित हो सकता है। अल्पकालिक लाभ के लिए बागियों का स्वागत करने से बीजेपी भी उसी राजनीतिक बीमारी का शिकार हो सकती है जिसने टीएमसी को कमजोर किया है।
लेफ्ट और कांग्रेस के पास बड़ा मौका
TMC के कमजोर होने से बंगाल में टीएमसी और बीजेपी के अलावा तीसरे विकल्प के लिए जगह बन गई है। चुनाव प्रचार के दौरान वामपंथियों (Left) की सक्रियता बढ़ी थी, लेकिन वे इसे वोटों में नहीं बदल पाए। कांग्रेस के पास भी आज के समय में बंगाल के भीतर वह संगठनात्मक ढांचा नहीं है जो उसे मुख्य विपक्षी दल बना सके।
इन दोनों दलों के सामने एक अजीब विरोधाभास है। टीएमसी का कमजोर होना इनके लिए फायदेमंद तो है, लेकिन दोनों में से कोई भी दल अकेले उस खाली राजनीतिक जमीन को भरने के काबिल नहीं दिख रहा है। बंगाल में विपक्ष की राजनीति का भविष्य अब इस बात पर निर्भर नहीं करता कि टीएमसी बचेगी या नहीं, बल्कि इस बात पर निर्भर करता है कि लेफ्ट और कांग्रेस खुद को नए सिरे से कितना मजबूत कर पाते हैं।

