
त्रिशूर हादसा: मौत, मातम और उठते सवाल, क्या सुरक्षित हैं ऐसे आयोजन?
केरल के त्रिशूर में पटाखा गोदाम विस्फोट में 14 लोगों की मौत के बाद जांच चल रही है। लेकिन आतिशबाजी की सुरक्षा और नियमों पर बहस तेज हो गई है
केरल के त्रिशूर के पास पटाखों के एक भंडारण केंद्र में हुए भीषण विस्फोट के एक दिन बाद भी इस त्रासदी की भयावहता धीरे-धीरे सामने आ रही है। 22 अप्रैल सुबह 11:30 बजे तक कम से कम 14 लोगों की मौत की आशंका जताई गई है। इनमें से केवल सात शव ही सुरक्षित अवस्था में मिले हैं, जबकि बाकी शव क्षत-विक्षत हालत में पाए गए। अब तक सिर्फ पांच मृतकों की पहचान हो सकी है और शेष की पहचान के लिए डीएनए जांच की आवश्यकता बताई जा रही है, जो विस्फोट की तीव्रता को दर्शाता है।
राहत और बचाव कार्य जारी
मुंडाथिकोडे में हादसे के बाद राहत और बचाव दल देर रात तक मलबे और जले हुए अवशेषों में खोजबीन करते रहे। शुरुआती विस्फोट के बाद लगातार हुए धमाकों ने बचाव कार्य को कठिन बना दिया, जिससे राहत कार्य में देरी हुई। अब भी मौके पर बिखरे मानव अवशेषों को एकत्र कर फॉरेंसिक जांच के लिए भेजा जा रहा है।
घायलों का इलाज जारी
घटना में घायल हुए कई लोग अभी भी अस्पताल में भर्ती हैं। स्वास्थ्य मंत्री Veena George ने बताया कि 13 लोग उपचाराधीन हैं, जिनमें से दो वेंटिलेटर पर हैं और 98 प्रतिशत तक झुलस चुके हैं। दो लोगों को छुट्टी दे दी गई है, जबकि नौ का इलाज जारी है। राज्य सरकार ने सभी आवश्यक चिकित्सा सुविधाएं उपलब्ध कराने का आश्वासन दिया है।
जांच के आदेश और मुआवजा
केरल सरकार ने इस हादसे की न्यायिक जांच के आदेश दिए हैं, साथ ही मजिस्ट्रेट जांच भी जारी है। पीड़ितों और उनके परिवारों के लिए 14 लाख रुपये की आर्थिक सहायता की घोषणा की गई है। इसके साथ ही यह सवाल भी उठ रहे हैं कि सख्त नियमों के बावजूद इतनी बड़ी दुर्घटना कैसे हुई।
त्रिशूर पूरम और पटाखों पर सवाल
यह विस्फोट Thrissur Pooram के आयोजकों में से एक, तिरुवंबाडी देवस्वम से जुड़े एक भंडारण केंद्र में हुआ। यहां 24 अप्रैल और 27 अप्रैल को होने वाले आतिशबाजी कार्यक्रम के लिए भारी मात्रा में विस्फोटक सामग्री रखी गई थी।त्रिशूर पूरम में आतिशबाजी एक प्रमुख आकर्षण होती है, जो हर साल हजारों लोगों को आकर्षित करती है। लेकिन इस हादसे के बाद बड़े आयोजनों में पटाखों पर प्रतिबंध लगाने की मांग तेज हो गई है।
परंपरा बनाम सुरक्षा
कई विशेषज्ञों और बुद्धिजीवियों का मानना है कि यह सिर्फ एक हादसा नहीं, बल्कि सुरक्षा नियमों के पालन में लगातार हो रही चूक का परिणाम है। प्रसिद्ध कवि पी.एन. गोपिकृष्णन ने कहा कि हर हादसे के बाद सुरक्षा पर चर्चा होती है, लेकिन समय के साथ सब कुछ फिर पहले जैसा हो जाता है।
आयोजन पर संशय
हादसे के बाद इस साल त्रिशूर पूरम को सीमित रूप में मनाने की संभावना जताई जा रही है। तिरुवंबाडी देवस्वम के सचिव के. गिरीश कुमार ने कहा कि वे सरकार और जनता के निर्णय का पालन करेंगे और इस समय उत्सव मनाने की स्थिति नहीं है।दूसरी ओर, परमेक्कावु देवस्वम के प्रतिनिधियों ने भी कहा कि अंतिम निर्णय जिला प्रशासन के साथ मिलकर लिया जाएगा और फिलहाल पूरा समुदाय शोक में डूबा हुआ है।
हादसों का लंबा इतिहास
केरल में पटाखों से जुड़े हादसे कोई नई बात नहीं हैं। राज्य आपदा प्रबंधन प्राधिकरण के अनुसार, पिछले दो दशकों में ऐसे सैकड़ों हादसे हो चुके हैं। 2016 का पुत्तिंगल मंदिर हादसा, जिसमें 110 से अधिक लोगों की मौत हुई थी, सबसे भयावह घटनाओं में से एक है।इसके अलावा 1952 में सबरीमाला, 1990 में कोल्लम और 1987 में थलसेरी में भी बड़े हादसे हुए थे। हाल ही में 2024 में कासरगोड में भी एक विस्फोट में कई लोग घायल हुए थे।
क्या होगा आगे?
विशेषज्ञों का मानना है कि इन हादसों के पीछे प्रमुख कारण हैं—विस्फोटकों का गलत भंडारण, सुरक्षा दूरी का अभाव, अप्रशिक्षित श्रमिक और आयोजकों के बीच प्रतिस्पर्धा।एक प्रत्यक्षदर्शी विल्सन ने बताया कि तेज गर्मी के कारण अचानक चिंगारी भड़की और कुछ ही पलों में पूरा क्षेत्र विस्फोटों से भर गया।
बड़ा सवाल
यह हादसा एक बार फिर यह सवाल खड़ा करता है कि क्या पटाखों जैसी परंपराओं को सख्त नियमों के जरिए सुरक्षित बनाया जा सकता है या फिर इसमें मूलभूत बदलाव की जरूरत है।फिलहाल त्रिशूर में ध्यान मृतकों की पहचान, घायलों के इलाज और शोक संतप्त परिवारों की मदद पर केंद्रित है। लेकिन आने वाले समय में यह तय करेगा कि यह हादसा भी एक और भूली हुई त्रासदी बन जाएगा या फिर बदलाव की दिशा में एक अहम मोड़ साबित होगा।

