ममता की हार से हिला टीएमसी का किला, पार्टी में बढ़ी अंदरूनी जंग
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ममता की हार से हिला टीएमसी का किला, पार्टी में बढ़ी अंदरूनी जंग

बंगाल चुनाव में हार के बाद टीएमसी अंदरूनी कलह, घटती राजनीतिक पकड़ और 2029 में अस्तित्व बचाने की बड़ी चुनौती से जूझ रही है।


4 मई को हुए पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनाव 2026 (West Bengal Assembly Elections 2026) के नतीजों ने तृणमूल कांग्रेस (All India Trinamool Congress) को गहरे राजनीतिक संकट में डाल दिया है। यह सिर्फ पार्टी की हार भर नहीं है, बल्कि अब उसके भविष्य, उसकी एकजुटता और राष्ट्रीय राजनीति में उसकी प्रासंगिकता पर भी सवाल उठने लगे हैं। सबसे बड़ा झटका पार्टी सुप्रीमो ममता बनर्जी (Mamata Banerjee) को लगा, जो मुख्यमंत्री की कुर्सी भी गंवा बैठीं।अब सवाल यह है कि क्या टीएमसी इस मुश्किल दौर से निकल पाएगी और दिल्ली की राजनीति में अपनी पकड़ बनाए रख सकेगी?

ममता की हार ने बदल दिया पूरा समीकरण

2011 में वामपंथी किले को ध्वस्त कर सत्ता में आने के बाद ममता बनर्जी बंगाल की राजनीति का सबसे बड़ा चेहरा बन गई थीं। उनके सामने बाकी सभी दल काफी पीछे नजर आते थे। लेकिन इस बार हालात बदल चुके हैं।ममता बनर्जी खुद अपने पूर्व सहयोगी और अब बड़े प्रतिद्वंद्वी Suvendu Adhikari से चुनाव हार गईं। सुवेंदु अब बंगाल के मुख्यमंत्री बन चुके हैं। सबसे बड़ी चिंता यह है कि ममता अब न विधानसभा में हैं और न ही संसद में। ऐसे में पार्टी के सामने नेतृत्व और दिशा को लेकर बड़ा सवाल खड़ा हो गया है।

संसद में अभी भी मजबूत है टीएमसी

हालांकि राज्य में हार के बावजूद टीएमसी की संसद में मौजूदगी अभी भी मजबूत मानी जा रही है। पार्टी के पास फिलहाल लोकसभा में 28 सांसद और राज्यसभा में 13 सांसद हैं। यानी बंगाल से संसद की कुल 58 सीटों में से 41 सीटों पर टीएमसी का कब्जा है।

एक क्षेत्रीय पार्टी के लिए यह संख्या काफी अहम मानी जाती है। बंगाल से लोकसभा में 42 सांसद जाते हैं, जो उत्तर प्रदेश और महाराष्ट्र के बाद देश में तीसरी सबसे बड़ी संख्या है। इसी वजह से 2014 के बाद से टीएमसी राष्ट्रीय राजनीति में मजबूत प्रभाव बनाए रखने में सफल रही।

विधानसभा जीत और लोकसभा प्रदर्शन का रहा सीधा संबंध

टीएमसी का लोकसभा प्रदर्शन हमेशा विधानसभा चुनावों से जुड़ा रहा है।

2011 में विधानसभा जीत के बाद पार्टी ने 2014 लोकसभा चुनाव में 34 सीटें जीतीं।

2016 की जीत के बाद 2019 में 22 सीटें मिलीं।

2021 की बड़ी जीत के बाद 2024 में पार्टी ने 29 सीटें हासिल कीं।

लेकिन 2026 की हार ने 2029 के लिए खतरे की घंटी बजा दी है। अब बंगाल और केंद्र — दोनों जगह भाजपा की सरकार है। ऐसे में टीएमसी के लिए वापसी आसान नहीं होगी।

सांसदों को एक्टिव रहने का निर्देश

चुनाव नतीजों के बाद ममता बनर्जी लगातार पार्टी नेताओं और सांसदों के साथ बैठकें कर रही हैं। उन्होंने सांसदों से कहा है कि वे अपने क्षेत्रों और जमीनी कार्यकर्ताओं से लगातार जुड़े रहें और संसद के भीतर भाजपा सरकार के खिलाफ मजबूत लड़ाई लड़ें।हालांकि इसे लागू करना आसान नहीं माना जा रहा। टीएमसी के कई सांसद फिल्म और मनोरंजन जगत से जुड़े सेलिब्रिटी चेहरे हैं। सत्ता में रहते हुए यह रणनीति कारगर रही, लेकिन बदले राजनीतिक माहौल में इसकी सीमाएं अब सामने आने लगी हैं।

पार्टी के भीतर बढ़ती कलह

हार के बाद टीएमसी में अंदरूनी मतभेद भी खुलकर सामने आने लगे हैं।लोकसभा में पार्टी की चीफ व्हिप रहीं Kakoli Ghosh Dastidar को हटाकर Kalyan Banerjee को जिम्मेदारी दी गई। इसके बाद काकोली ने सोशल मीडिया पर नाराजगी जाहिर करते हुए कहा कि चार दशक की वफादारी का उन्हें यही इनाम मिला।वहीं कल्याण बनर्जी ने चुनावी हार के लिए राजनीतिक रणनीतिकार संस्था I-PAC को जिम्मेदार ठहराया और कहा कि उसने पार्टी के अभियान को नुकसान पहुंचाया।

पूर्व मंत्री Krishnendu Narayan Choudhury ने तो सीधे Abhishek Banerjee पर सवाल उठा दिए। उनका आरोप है कि अभिषेक की कॉरपोरेट शैली ने पार्टी के जमीनी ढांचे को कमजोर किया।

महुआ और सायोनी ने किया बचाव

कई विवादों के बीच Saayoni Ghosh और Mahua Moitra जैसे नेताओं ने पार्टी नेतृत्व का खुलकर समर्थन किया।सायोनी घोष ने दावा किया कि 2026 का चुनाव “छीन लिया गया” और ममता को जबरन हराया गया। उन्होंने भरोसा जताया कि टीएमसी 2029 और 2031 में वापसी करेगी। वहीं महुआ मोइत्रा ने कहा कि पार्टी ने बेहद मुश्किल परिस्थितियों में चुनाव लड़ा।हालांकि पार्टी के भीतर पुराने विवाद और नेताओं के बीच टकराव अब भी चिंता का विषय बने हुए हैं।

राज्यसभा में भी बढ़ सकती है मुश्किल

टीएमसी के सामने एक बड़ी चुनौती राज्यसभा को लेकर भी है। राज्यसभा सांसदों का चुनाव विधायक करते हैं और विधानसभा में पार्टी की संख्या 215 से घटकर 80 रह गई है। ऐसे में आने वाले वर्षों में टीएमसी राज्यसभा में भी कई सीटें गंवा सकती है।

क्या टीएमसी लेफ्ट जैसी स्थिति में पहुंच जाएगी?

एक समय Communist Party of India (Marxist) और वामपंथी दल राष्ट्रीय राजनीति में किंगमेकर माने जाते थे। 2004 में केंद्र की यूपीए सरकार उनके समर्थन पर निर्भर थी। लेकिन दो दशकों में वाम दल हाशिये पर पहुंच गए।टीएमसी नहीं चाहेगी कि उसका भी वही हाल हो।

2029 होगी असली परीक्षा

अब 2029 का लोकसभा चुनाव टीएमसी के लिए सबसे बड़ी परीक्षा माना जा रहा है। 71 साल की उम्र में भी ममता बनर्जी सक्रिय हैं, जबकि अभिषेक बनर्जी लंबे समय से संगठन की कमान संभाल रहे हैं।भारतीय राजनीति में वापसी असंभव नहीं मानी जाती। टीएमसी भी वापसी कर सकती है। लेकिन मई 2026 तक की तस्वीर यही कहती है कि पार्टी का मजबूत किला दरक चुका है और उसे जल्द अपनी रणनीति और संगठन दोनों को संभालना होगा।यह हार सिर्फ अस्थायी झटका है या टीएमसी के पतन की शुरुआत — इसका जवाब आने वाला समय देगा।

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