छापे, बगावत और सियासी घेराबंदी, टीएमसी पर चौतरफा दबाव
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छापे, बगावत और सियासी घेराबंदी, टीएमसी पर चौतरफा दबाव

टीएमसी में बगावत गहराने के बीच ममता और अभिषेक बनर्जी से जुड़े दफ्तरों पर छापे पड़े। बागी सांसदों के दावों से पार्टी के भविष्य पर सवाल खड़े हो गए हैं।


भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) समर्थित बगावत के तृणमूल कांग्रेस (टीएमसी) संसदीय दल के भीतर उभरने के एक दिन बाद, जांच एजेंसियों ने पार्टी प्रमुख ममता बनर्जी और उनके भतीजे अभिषेक बनर्जी से जुड़े कार्यालयों में तलाशी ली। इस कार्रवाई ने उस राजनीतिक संकट को और गहरा कर दिया है, जो क्षेत्रीय पार्टी के भविष्य के लिए गंभीर चुनौती बनता जा रहा है।

राज्य पुलिस के अपराध जांच विभाग (सीआईडी) ने एक साथ ममता बनर्जी के कालीघाट स्थित आवास में मौजूद टीएमसी कार्यालय और कोलकाता की कैमैक्स स्ट्रीट पर अभिषेक बनर्जी से जुड़े एक कार्यालय में छापेमारी की। आधिकारिक तौर पर यह कार्रवाई टीएमसी विधायक दल के नेता के चुनाव से संबंधित प्रस्ताव की मूल प्रति खोजने के लिए की गई।

बगावत के बीच छापेमारी

करीब तीन घंटे तक चली इस तलाशी का परिणाम तत्काल स्पष्ट नहीं हो सका। जांचकर्ताओं के अनुसार, यह कार्रवाई उन आरोपों से जुड़ी है जिनमें कहा गया है कि पश्चिम बंगाल विधानसभा में विपक्ष के नेता की नियुक्ति के लिए प्रस्तुत दस्तावेजों पर टीएमसी विधायकों के हस्ताक्षर जाली बनाए गए थे।

हालांकि मामला विधानसभा से जुड़े विवाद का है, लेकिन जांच का समय विशेष महत्व रखता है। यह कार्रवाई उस समय हुई जब बागी सांसदों ने दावा किया कि उन्हें पार्टी के 28 लोकसभा सांसदों में से 20 का समर्थन प्राप्त है और उन्होंने राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन (एनडीए) के साथ जुड़े एक अलग समूह के रूप में मान्यता की मांग की है। इससे यह धारणा और मजबूत हुई कि भाजपा नेतृत्व वाली सरकार विभिन्न मोर्चों पर टीएमसी पर दबाव बढ़ा रही है।

तलाशी उस समय हुई जब ममता बनर्जी और अभिषेक बनर्जी दोनों नई दिल्ली में मौजूद थे। दोनों सोमवार को इंडिया गठबंधन (INDIA Bloc) की बैठक में शामिल हुए थे। मंगलवार को ममता बनर्जी ने कांग्रेस नेता सोनिया गांधी से भी मुलाकात की, जबकि पश्चिम बंगाल में राजनीतिक उथल-पुथल के बाद विपक्षी दल आपसी समन्वय पर चर्चा कर रहे थे।

टीएमसी के लिए ऊंचे दांव

अब यह संकट केवल टीएमसी पर नियंत्रण का सवाल नहीं रह गया है। इसने पश्चिम बंगाल में विपक्षी राजनीति के भविष्य को लेकर भी गंभीर प्रश्न खड़े कर दिए हैं, क्योंकि पार्टी के कई निर्वाचित प्रतिनिधि सत्तारूढ़ भाजपा के करीब आते दिखाई दे रहे हैं।

घटनाक्रम से संकेत मिल रहे हैं कि 71 वर्षीय ममता बनर्जी केवल अपनी नेतृत्व क्षमता को चुनौती का सामना नहीं कर रहीं, बल्कि उन्हें इस संभावना से भी जूझना पड़ सकता है कि टीएमसी का भी वही हाल हो जो पहले शिवसेना और राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी (एनसीपी) का हुआ था। दोनों मामलों में आंतरिक बगावत के बाद विद्रोही गुटों को आधिकारिक पार्टी के रूप में मान्यता मिली थी और वे चुनाव चिह्न भी अपने पास रखने में सफल रहे थे।

ममता बनर्जी के लिए यह संघर्ष असाधारण महत्व रखता है क्योंकि यह केवल संगठनात्मक नियंत्रण तक सीमित नहीं रह सकता, बल्कि टीएमसी की विशाल वित्तीय संपत्तियों पर भी असर डाल सकता है। चुनाव आयोग को सौंपे गए पार्टी के नवीनतम ऑडिट खातों के अनुसार, टीएमसी के पास 1,018 करोड़ रुपये से अधिक की संपत्ति है और उसका सामान्य कोष 1,014 करोड़ रुपये से अधिक है।

यदि मौजूदा विभाजन और गहराता है और प्रतिद्वंद्वी गुट खुद को असली टीएमसी साबित करने की कोशिश करते हैं, तो पार्टी की वित्तीय संपत्ति, संगठनात्मक ढांचे और चुनाव चिह्न पर भी विवाद खड़ा हो सकता है। कुछ सप्ताह पहले तक जो स्थिति अकल्पनीय लगती थी, वह अब बंगाल के राजनीतिक गलियारों में खुलकर चर्चा का विषय बन चुकी है।

टीएमसी का तेजी से बिखरना

इसका मुख्य कारण सत्ता गंवाने के बाद पार्टी का तेज़ी से कमजोर होना है। वर्षों तक टीएमसी की संगठनात्मक ताकत ममता बनर्जी की लोकप्रियता और राज्य सरकार पर पार्टी के नियंत्रण पर आधारित थी। लेकिन विधानसभा चुनाव में भाजपा की जीत ने इस धारणा को तोड़ दिया।इसके बाद से पार्टी लगातार पार्षदों, नगर निकाय प्रतिनिधियों, विधायकों और अब सांसदों के पलायन का सामना कर रही है। शुरुआत में यह चुनावी हार के बाद की सामान्य राजनीतिक उथल-पुथल लग रही थी, लेकिन अब यह राज्य की प्रमुख विपक्षी पार्टी को कमजोर करने के लिए सुनियोजित संकट जैसी दिखाई देने लगी है।

टीएमसी नेताओं पर लगे भ्रष्टाचार के आरोपों और पार्टी के भीतर लोकतंत्र कमजोर होने की शिकायतों ने बागियों को विद्रोह का राजनीतिक आधार प्रदान किया। हालांकि, दिलचस्प बात यह है कि कई असंतुष्ट नेता स्वयं भी हाल के वर्षों में भ्रष्टाचार जांच या अन्य आरोपों का सामना कर चुके हैं।रितब्रत बनर्जी को विपक्ष का नेता बनाने वाले असंतुष्ट गुट में शामिल बोलपुर के विधायक चंद्रनाथ सिन्हा भी पहले कथित अनियमितताओं के मामलों में केंद्रीय एजेंसियों की जांच के दायरे में आ चुके हैं।

भाजपा के भीतर भी असहजता

इस बीच भाजपा के अंदर भी असंतोष की आवाजें सुनाई देने लगी हैं, क्योंकि पार्टी अब उसी बागी टीएमसी गुट का समर्थन कर रही है जिसके कई नेताओं पर वह पहले भ्रष्टाचार और सत्ता के दुरुपयोग के आरोप लगाती रही है।यह असहजता तब खुलकर सामने आई जब भाजपा मंत्री अर्जुन सिंह ने टीएमसी सांसद पार्थ भौमिक के बागी खेमे में शामिल होने के तुरंत बाद उनकी गिरफ्तारी की मांग कर दी।

कई भाजपा कार्यकर्ताओं को लग रहा है कि दोहरे मापदंड अपनाए जा रहे हैं। जो टीएमसी नेता भाजपा समर्थित गुट में शामिल हो रहे हैं उन्हें “अच्छा” माना जा रहा है, जबकि पार्टी के प्रति वफादार बने रहने वालों को “गलत” बताया जा रहा है। इससे भाजपा के लिए भी एक कठिन स्थिति पैदा हो गई है।

सोमवार को बागी सांसदों ने केंद्रीय मंत्री भूपेंद्र यादव के नई दिल्ली स्थित आवास पर बैठक की, जिससे भाजपा के समर्थन की धारणा और मजबूत हुई।

मंगलवार को वरिष्ठ टीएमसी नेता कल्याण बनर्जी ने प्रेस कॉन्फ्रेंस में आरोप लगाया कि केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह ने पार्टी सांसद यूसुफ पठान से व्यक्तिगत रूप से संपर्क कर उन्हें पक्ष बदलने के लिए मनाने की कोशिश की थी।

भाजपा की रणनीति के दोहरे लाभ

भाजपा की रणनीति राज्य और राष्ट्रीय दोनों स्तरों पर लाभ पहुंचाने वाली मानी जा रही है। पश्चिम बंगाल में यदि टीएमसी कमजोर होती है, तो ममता बनर्जी के लिए राजनीतिक वापसी करना मुश्किल हो जाएगा और भाजपा के लिए सत्ता को और मजबूत करना आसान होगा।

संसद में भी यह समीकरण भाजपा के पक्ष में जाता दिखाई देता है। बागी खेमे का दावा है कि उसे 20 सांसदों का समर्थन प्राप्त है, जो दल-बदल विरोधी कानून से बचने के लिए आवश्यक दो-तिहाई सीमा से अधिक है।

भाजपा के लिए यह बगावत दोहरा फायदा देने वाली साबित हो सकती है। एक ओर यह ममता बनर्जी की पार्टी को कमजोर करती है, वहीं दूसरी ओर एनडीए की संसदीय ताकत बढ़ाती है। यदि 20 टीएमसी सांसद एनडीए का समर्थन करते हैं, तो लोकसभा में सत्तारूढ़ गठबंधन का आंकड़ा 300 सीटों से काफी ऊपर पहुंच जाएगा। इससे भविष्य में विवादास्पद विधेयकों, विशेषकर निर्वाचन क्षेत्रों के परिसीमन (Delimitation) जैसे प्रस्तावों के लिए व्यापक समर्थन जुटाना आसान हो सकता है।

राज्यसभा में भी विद्रोह की आहट

टीएमसी की राज्यसभा इकाई में भी समानांतर बगावत की संभावना दिखाई दे रही है। सुखेंदु शेखर राय के इस्तीफे के बाद उच्च सदन में पार्टी की संख्या घटकर 12 रह गई है।सूत्रों के अनुसार, कम से कम पांच अन्य राज्यसभा सांसद भी बागी खेमे के संपर्क में हैं। यदि यह असंतोष खुलकर सामने आता है, तो टीएमसी के लिए संकट और गंभीर हो सकता है तथा पश्चिम बंगाल की राजनीति में एक नया अध्याय शुरू हो सकता है।

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