
टीएमसी में सियासी संग्राम, बागी विधायकों के कदम से नेतृत्व पर सवाल
पश्चिम बंगाल में टीएमसी के 58 विधायकों के बागी रुख ने ममता बनर्जी की मुश्किलें बढ़ा दी हैं। पार्टी के भीतर नेतृत्व और नियंत्रण को लेकर बड़ा संकट खड़ा हो गया है।
पश्चिम बंगाल में सत्ता में आने के बाद अपने सबसे बड़े चुनावी झटके का सामना करने के महज एक महीने बाद तृणमूल कांग्रेस (टीएमसी) अब एक ऐसे राजनीतिक संकट से जूझ रही है, जो चुनावी हार से भी कहीं अधिक गंभीर माना जा रहा है। बुधवार को पार्टी के 80 विधायकों में से 58 के समर्थन का दावा करने वाले असंतुष्ट विधायकों ने विधानसभा अध्यक्ष रथींद्र बोस से निष्कासित नेता ऋतब्रत बनर्जी को विधायक दल का नेता मान्यता दिला दी। इस घटनाक्रम ने मुख्यमंत्री ममता बनर्जी की पार्टी के विधायकों पर पकड़ को गंभीर चुनौती दे दी है।
ममता बनर्जी के सामने अब तक की सबसे बड़ी चुनौती
1998 में टीएमसी की स्थापना करने वाली ममता बनर्जी के लिए यह घटनाक्रम उनके राजनीतिक जीवन की सबसे बड़ी चुनौतियों में से एक माना जा रहा है। कुछ ही सप्ताह पहले तक वे पार्टी की निर्विवाद नेता थीं, हालांकि विधानसभा चुनाव में भाजपा के हाथों करारी हार और भवानीपुर सीट पर शुभेंदु अधिकारी से अपनी व्यक्तिगत हार ने पार्टी को गहरा झटका दिया था।जो संकट चुनावी हार से शुरू हुआ था, वह अब पार्टी के अस्तित्व पर सवाल खड़ा करने वाले संकट में बदलता दिखाई दे रहा है।
215 से घटकर 80 विधायक रह गए
2021 में टीएमसी के पास विधानसभा में 215 विधायक थे। हालिया चुनाव में यह संख्या घटकर 80 रह गई। अब पार्टी के भीतर उठी बगावत ने हालात और गंभीर कर दिए हैं। माना जा रहा है कि ममता बनर्जी के नियंत्रण में अब बहुत कम विधायक बच सकते हैं।यह बगावत अचानक नहीं हुई। चुनावी हार के बाद से नेतृत्व, उत्तराधिकार और संगठन पर नियंत्रण को लेकर पार्टी के भीतर असंतोष लगातार बढ़ रहा था। महज 13 दिनों के भीतर यह असंतोष टीएमसी के 28 साल के इतिहास की सबसे बड़ी टूट में बदल गया।
दिल्ली की एक मुलाकात से शुरू हुई कहानी
राजनीतिक घटनाक्रम की शुरुआत 22 मई को दिल्ली के बंग भवन में हुई एक कथित "संयोगवश मुलाकात" से मानी जा रही है। यहां बागी विधायक ऋतब्रत बनर्जी की मुलाकात भाजपा नेता शुभेंदु अधिकारी से हुई।इसके बाद घटनाएं तेजी से बदलीं। ऋतब्रत ने सार्वजनिक रूप से शुभेंदु अधिकारी द्वारा विपक्षी विधायकों और सांसदों को प्रशासनिक समीक्षा बैठकों में आमंत्रित करने के फैसले का स्वागत किया। इससे राजनीतिक हलकों में हलचल मच गई।
अभिषेक बनर्जी की बढ़ती भूमिका से नाराजगी
विश्लेषकों के अनुसार, चुनावी हार के बाद टीएमसी के भीतर असंतोष का एक बड़ा कारण सांसद अभिषेक बनर्जी का बढ़ता प्रभाव भी रहा।6 मई को नव-निर्वाचित विधायकों की बैठक में ममता बनर्जी ने अभिषेक की खुलकर प्रशंसा की थी। इसके बाद कुछ विधायकों के बीच यह धारणा मजबूत हुई कि पार्टी का नियंत्रण एक ही परिवार के इर्द-गिर्द सिमटता जा रहा है।
पहली बार सार्वजनिक रूप से उठे विरोध के स्वर
19 मई को पार्टी के भीतर विरोध खुलकर सामने आया। एक बैठक के दौरान ऋतब्रत बनर्जी और एंटली विधायक संदीपन साहा ने सवाल उठाया कि फलता के टीएमसी नेता जहांगीर खान को पार्टी से निष्कासित क्यों नहीं किया गया, जबकि उन्होंने पुनर्मतदान से खुद को अलग कर लिया था।चूंकि जहांगीर खान को अभिषेक बनर्जी का करीबी माना जाता था, इसलिए इसे अभिषेक पर अप्रत्यक्ष हमला माना गया।
जालसाजी के आरोपों ने बढ़ाया विवाद
25 मई को एक नया विवाद सामने आया जब आरोप लगे कि विधायक दल के नेतृत्व से जुड़े दस्तावेजों पर कुछ विधायकों के हस्ताक्षर जाली बनाए गए हैं।27 मई को ऋतब्रत बनर्जी और संदीपन साहा ने विधानसभा अध्यक्ष से शिकायत कर जालसाजी का आरोप लगाया। इसके बाद विधानसभा सचिवालय ने पुलिस से संपर्क किया और मामला सीआईडी जांच तक पहुंच गया।
नेतृत्व की पकड़ होती गई कमजोर
30 मई को अभिषेक बनर्जी पर सोनारपुर दौरे के दौरान भीड़ द्वारा हमला किया गया। पार्टी के कई नेताओं ने माना कि संगठन के कुछ हिस्सों की कमजोर प्रतिक्रिया नेतृत्व और जमीनी प्रतिनिधियों के बीच बढ़ती दूरी का संकेत थी। 31 मई को ममता बनर्जी द्वारा कालीघाट स्थित आवास पर बुलाई गई विधायकों की बैठक में अपेक्षा से कम उपस्थिति दर्ज हुई। इससे नेतृत्व की कमजोर होती पकड़ स्पष्ट दिखाई देने लगी।
निष्कासन का फैसला पड़ा भारी
1 जून को शुभेंदु अधिकारी ने खुलासा किया कि ऋतब्रत और संदीपन की शिकायतों के आधार पर सीआईडी जांच शुरू हो चुकी है। इसके कुछ ही घंटों बाद टीएमसी ने दोनों नेताओं को पार्टी से निष्कासित कर दिया।हालांकि, इस कदम से संकट कम होने के बजाय और गहरा गया। बागी गुट को लगातार अधिक समर्थन मिलने लगा।
58 विधायकों ने बदला समीकरण
बुधवार को 58 विधायकों के समूह ने विधानसभा अध्यक्ष को पत्र सौंपकर ऋतब्रत बनर्जी को विधायक दल का नेता चुने जाने की जानकारी दी। साथ ही नई नेतृत्व टीम के गठन का भी प्रस्ताव रखा गया।इस कदम के बाद टीएमसी के भीतर शक्ति संतुलन पूरी तरह बदल गया है।
राजनीतिक अस्तित्व की लड़ाई
राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि ममता बनर्जी अब अपने सार्वजनिक जीवन के सबसे कठिन दौर से गुजर रही हैं। उन्होंने पहले भी चुनावी हार, केंद्रीय एजेंसियों की जांच और संगठनात्मक विद्रोहों का सामना किया है, लेकिन मौजूदा संकट सीधे उनकी राजनीतिक सत्ता और संगठनात्मक नियंत्रण को चुनौती दे रहा है।राजनीतिक विश्लेषक शुभमोय मैत्रा का कहना है कि चुनावी हार के बाद पार्टी का टूटना अप्रत्याशित नहीं था।
उनके अनुसार, "टीएमसी का मूल उद्देश्य राज्य से वाम मोर्चा को सत्ता से हटाना था, जो 2011 में पूरा हो गया। इसके बाद पार्टी के पास कोई स्पष्ट वैचारिक आधार या दीर्घकालिक विकास दृष्टि नहीं बची। ऐसे में विधायकों के लिए व्यक्तिगत हित ही प्रमुख रह गए।"
पार्टी बचाने की कोशिश में ममता
स्थिति को संभालने के लिए टीएमसी ने कई प्रमुख संगठनात्मक समितियों और प्रकोष्ठों को भंग कर दिया है। इसे पार्टी में औपचारिक विभाजन रोकने की अंतिम कोशिश के रूप में देखा जा रहा है।ममता बनर्जी ने भाजपा पर धनबल, गिरफ्तारी और धमकियों के जरिए पार्टी में फूट डालने का आरोप लगाया है। हाल ही में एक विरोध प्रदर्शन के दौरान उन्होंने कहा कि बंगाल में विपक्षी राजनीति को कमजोर करने के लिए टीएमसी को तोड़ने की साजिश रची जा रही है।
क्या वापसी कर पाएंगी ममता?
विश्लेषकों का मानना है कि 70 वर्ष की उम्र पार कर चुकीं ममता बनर्जी के लिए पहले जैसी ऊर्जा के साथ वापसी करना आसान नहीं होगा। हालांकि, उनके लंबे राजनीतिक संघर्ष और जुझारूपन को देखते हुए उन्हें पूरी तरह खारिज करना भी जल्दबाजी होगी।अब सबसे बड़ा सवाल यह है कि क्या ममता बनर्जी एक बार फिर इस संकट को अवसर में बदल पाएंगी। यदि वे खुद को राजनीतिक षड्यंत्र का शिकार साबित करने में सफल रहीं, तो जमीनी कार्यकर्ताओं का समर्थन बनाए रख सकती हैं। लेकिन यदि ऐसा नहीं हुआ, तो यह संकट बंगाल में एक बड़े राजनीतिक साम्राज्य के पतन की शुरुआत साबित हो सकता है।

